रेल हादसे के बाद फंसे 18 लोगों को बाहर निकालकर रिजवान ने पेश की मिसाल

खतौली (उत्तर प्रदेश)। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में शनिवार को हरिद्वार से चलने वाली उत्कल एक्सप्रेस ट्रैन पटरी से उतर गईं, जिसमें तीस लोगों की मौत हुई जबकि दर्जनों घायल घायल हुए हैं। हादसे के बाद स्थानीय लोग बढ़ी संख्या में मदद के लिए घरों से बाहर निकल आए। वहीं रिजवान 18 लोगों की जिंदगी बचाने का जरिया बने और इंसानियत की अनोखी मिसाल कायम की ।

रिजवान और उसके साथी फोटोग्राफर्स उसी जगत कॉलोनी में फोटो स्टुडियो चलाते हैं जहां शनिवार की देर शाम उत्कल एक्सप्रेस के डिब्बे पटरी से उतर गए। जब वे वर्ल्ड फोटोग्राफी डे की तैयारियों के लिए मीटिंग कर रहे थे तभी तेज चिल्लाहट की गहरी आवाज उन्हें सुनाई दी। जब तक वे इस आवाज के बारे में सोच ही रहे थे कि रिजवान को उसके सहयोगियों ने फोन पर बताया कि ट्रेन के कोच पटरी से उतर गए हैं।

इसके बाद जब वे सभी मौके पर पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर आश्चर्यचकित हो गए। ट्रेन के कोच एक-दूसरे में घुसे हुए थे और फंसे यात्री मदद के लिए चिल्ला रहे थे। ट्रेन के दो डिब्बों में से एक पिंटू चौधरी के घर की दीवारों में फंसा हुआ था जबकि एक नजदीकी चाय की दुकान खत्म हो गई और चार ग्राहकों की मौत हो गई थी।

संदीप ने इस भयानक हादसे को विस्तार से बताया और दावा किया कि वे अभी भी बॉगी के नीचे फंसे हुए हैं। उन्होने आगे कहा, हम हर रोज ट्रेनों को देखते हैं लेकिन आज क्या हुआ..मेरे पास बताने के लिए शब्द नहीं हैं। मैं अभी भी सदमे में हूं।

रिजवान ने इस बीच मलबे से कम से कम 18 लोगों को बाहर निकाला। इनमें से कई लोगों के चेहरे भी स्पष्ट नहीं दिख रहे थे।संदीप और रिज़वान इंसानियत को बचाने में लगे थे बिना किसी ज़ात मज़हब के भेद के ,आज हमारा देश भी उस रेल की तरह अम्न और प्यार व सद्भाव की पटरी से उतर गया है तथा साम्प्रदायिकता और नफरत का हादसा इंसानियत को निगल रहा है ।

 

प्रेरणा (झारखंड) टाटा नगर से ट्रेन में चढ़ी थी , ट्रेन हादसे के बाद उसने जान बचाने के लिए रिज़वान का धन्यवाद किया। वहीं बीटेक के एक छात्र ने हादसे को याद करते हुए बताया कि कैसे बहुत तेज धमाके के बाद ट्रेन रुकी। उसके चार साथी यात्री सीट के नीचे फंसे हुए थे। मैं असहाय भगवान से प्रार्थना कर रहा था और मैने उन्हें मरते देखा , और कुछ न करसका ,काश हर इंसान ,इंसान के दर्द को समझ ले तो दुनिया जन्नत नुमा बना जाए ।

आसमा और उनकी बहन उजमा भाग्यशाली रहीं कि सहारनपुर में ट्रेन से उतर गए थे। हालांकि उनकी चाची करिश्मा आगरा में ट्रेन में बैठी थीं, उनका अब तक पता नहीं चल सका है।

परमेंद्र अपनी पत्नी और छोटी बेटी के साथ यमुनानगर से अपने कारखाने से वापस लौट रहे थे, वे अभी घायल हैं। ओड़िशा के परमेंद्र ने कहा, मैने अपने नौकरी के सहयोगियों को बताया है और वे मुझे यमुनानगर ले जाने के लिए आ रहे हैं।

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