किन वजहों से हुए मोदी मजबूत?

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Prof. Ram Puniyani
Prof Ram Puniani

प्रसिद्ध इतिहासविद् रामचंद्र गुहा के ‘Scroll’ में हालिया प्रकाशित लेख “Gandhi Family has helped to consolidate his power” में पिछले दस से ज्यादा सालों में मोदी-भाजपा की ताकत में बढ़ोत्तरी का अत्यंत उथला विश्लेषण किया गया है. 

कांग्रेस में परिवारवाद के बारे में गुहा जो कह रहे हैं उसमें खास दम नहीं है क्योंकि भाजपा सहित अन्य दलों में भी यह उतनी ही तेजी से फल-फूल रहा है. राहुल गांधी द्वारा मुद्दों को निरंतर न उठाने के लिए उनकी आलोचना में कुछ तथ्य हो सकता है लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि राहुल गाँधी ने भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस और उसकी हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति – जो हमारे लोकतंत्र को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं – के खतरों के बारे में देश को लगातार आगाह किया है.

राहुल भले ही राजनीति में अपनी मां के कहने पर कूदे हों लेकिन यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि अब उनकी मां उनका मार्गदर्शन नहीं कर रहीं हैं. वे राष्ट्रीय राजनीति के लगभग सभी किरदारों से संवाद कर चुके हैं. अपनी शानदार भारत जोड़ो यात्राओं के दौरान उन्होंने पूरे देश को अपनी आंखों से देखा और लोगों से मुलाकातें की.

उनकी बहन प्रियंका gandhi संभवतः उनसे बेहतर हिंदी वक्ता हैं लेकिन किसी आंदोलन या पार्टी का नेतृत्व करने की क्षमता का आंकलन सिर्फ इस आधार पर नहीं किया जा सकता. यह हो सकता है कि राहुल कुछ चमचों से घिरे हों. पर निश्चित ही वे फैसले लेते समय अपने दिमाग का इस्तेमाल करते हैं और शायद वे अपने संगठन को मज़बूत करने के लिए गांधी, नेहरू और अंबेडकर के सिद्धातों में आस्था रखने वाली अपेक्षाकृत युवा टीम तैयार कर रहे हैं.

क्या गांधी परिवार के कारण मोदी को देश को अपने शिकंजे में लेने में मदद मिली है? मोदी को सत्ता हासिल करने और आर्थिक एवं विदेश नीति संबंधी असफलाओं के बावजूद सत्ता पर काबिज रहने के लिए जिन कारकों से मदद मिली है, उनकी ओर गुहा को ध्यान देना चाहिए.

मोदी आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक हैं और उन्हें अटलबिहारी वाजपेयी ने तब गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया था जब उनके पास न तो इस पद को संभालने के लिए ज़रूरी अनुभव था और ना ही उन्होंने ऐसी कोई अनोखी योग्यता या क्षमता प्रदर्शित की थी. आरएसएस की हिन्दू राष्ट्रवाद की विचारधारा उनकी रग-रग में प्रवाहित होती है.

गुजरात में गोधरा ट्रेन आगजनी के बहाने किए गए अल्पसंख्यकों के कत्लेआम के ज़रिये से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर उन्होंने गुजरात में अपनी ताकत बढ़ाई. पूरा संघ परिवार मजबूती से उनके पीछे खड़ा रहा. जब अटलबिहारी वाजपेयी ने जुहापुरा शरणार्थी शिविर का दौरा करने के बाद मोदी को राजधर्म का पालन करने की हिदायत दी.

तब मोदी ने अत्यंत रूखे स्वर में जवाब दिया कि वे यही कर रहे हैं. वाजपेयी उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री के पद से हटाना चाहते थे मगर लगभग पूरी भाजपा ने मोदी का साथ दिया और वाजपेयी को गुजरात नरसंहार को नजरअंदाज करने पर मजबूर होना पड़ा.

मोदी ने अत्यंत चालाकी से इशारों-इशारों में मुसलमानों के खिलाफ लगातार टिप्पणियां कीं जिससे आरएसएस की हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति को बढ़ावा मिला. आरएसएस ही वह शक्ति थी जिसने मोदी का केन्द्र की सत्ता पर काबिज होना सुनिश्चित किया. जिन्ना पर की गई टिप्पणियों के चलते लालकृष्ण आडवानी से संघ की नाराजगी से भी मोदी को आरएसएस का आशीर्वाद हासिल करने में मदद मिली.

कटसराज मंदिर का उद्घाटन करने के लिए पाकिस्तान गए आडवानी, जिन्ना की मजार पर भी गए और उन्होंने कहा कि जिन्ना का पाकिस्तान की संविधानसभा में 11 अगस्त 1947 को दिया गया भाषण धर्मनिरपेक्षता को सर्वोत्तम ढंग से परिभाषित करता है. जिन्ना ने उस भाषण में कहा था कि अब जबकि पाकिस्तान बन चुका है, सभी धार्मिक समुदायों को अपने-अपने धर्म का पालन करने की पूरी आजादी है.

2014 के चुनाव मोदी के जीवन में एक मील का पत्थर थे. इन चुनाव के पहले मोदी की छवि चमकाने के लिए सरकारी खर्च पर एपीसीओ नामक संस्था की सेवाएं लीं गईं जिससे वे एक करिश्माई व्यक्ति नज़र आने लगे. रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं के दाम कम करने, हर खाते में 15 लाख रूपये देने और हर साल दो करोड़ रोजगार देने के उनके वायदों का जादुई प्रभाव हुआ, खासकर जन लोकपाल की नियुक्ति के लिए चलाए गए अन्ना-केजरीवाल आंदोलन की पृष्ठभूमि में. इस आंदोलन का उद्देश्य कांग्रेस को बदनाम कर मोदी की सफलता की राह साफ़ करना था.

सत्ता पर काबिज होने के बाद मोदी ने सभी सरकारी एजेंसियों जैसे ईडी, इनकम टैक्स और सीबीआई को अपना पालतू तोता बना लिया और विपक्ष को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. एजेंसियों के दुरूपयोग और बाद में न्यायपालिका के अनुकूल रवैये के साथ-साथ आरएसएस के प्रशिक्षित स्वयंसेवकों और संघ के हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रोपेगेंडा की भी उन्हें मजबूती देने में अहम् भूमिका रही.

सन् 1978 में जनता पार्टी सरकार में आडवानी के सूचना प्रसारण मंत्री बनने के बाद से ही मीडिया का झुकाव आरएसएस की विचारधारा की ओर होने लगा था. गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने कारपोरेट दुनिया को लुभाना शुरू किया. मीडिया ने न केवल मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया बल्कि बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने प्रमुख टीवी चैनलों और मीडिया के अन्य संस्थानों को खरीदने का सिलसिला शुरू कर दिया. मोदी ने सोशल मीडिया और आईटी सेल का भी भरपूर उपयोग किया और मीडिया संस्थान मोदी के चरणों में दण्डवत हो गए.

गोएबेल्स मार्का प्रोपेगेंडा और दमन के ज़रिये मोदी सामूहिक सामाजिक नजरिए को अपने पक्ष में करने में सफल रहे.अपनी कामयाबी दुहराने के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी का सहारा लिया. निर्वाचन आयोग पूरी तरह प्रधानमंत्री के नियंत्रण में आ गया क्योंकि निर्वाचन आयुक्तों का चयन करने वाली समिति में मुख्य न्यायाधीश (या उनके प्रतिनिधि) की जगह एक केबिनेट मंत्री को रखने का प्रावधान कर दिया गया.

निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका के सहयोगी बनने के साथ ही रही सही कसर भी पूरी हो गई. ईव्हीएम के दुरूपयोग का मुद्दा पहले से ही था. मतदान के आंकड़ों का विश्लेषण कर तीस्ता सीतलवाड और पर्कला प्रभाकर ने यह साबित किया है कि 78 लोकसभा सीटें गलत तरीके अपनाकर जीती गईं.

अब एसआईआर के जरिए गैर-भाजपा मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटाए जा रहे हैं और इस तरह नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा रहा है. पश्चिम बंगाल में 91 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटा दिए गए और 27 लाख मतदाताओं के मामलों का ठीक से पुनर्परीक्षण नहीं किया गया. नतीजा हमारे सामने है.

मोदी के सशक्त होने के मूल कारणों को नजरअंदाज करते हुए गुहा केवल राहुल की विदेश यात्राओं, प्रियंका की बेहतर हिन्दी और सोनिया गांधी के अभी भी निर्णायक भूमिका निभाने और राहुल के केवल उनके निर्देशों का चुपचाप पालन करने जैसे छोटे-मोटे मुद्दों को उछाल रहे हैं. इसे घटिया विश्लेषण ही कहा जा सकता है.

मोदी के सत्ता में आने और उस पर काबिज रहने की मुख्य वजहें गांधी परिवार या अन्य विपक्षी दलों की कमजोरी नहीं बल्कि कुछ और हैं. हालांकि यह सच है कि आरएसएस की राजनीति और उसके प्रोपेगेंडा का मुकाबला विपक्ष ने ठीक से नहीं किया है. मंदिर का ध्वंस, जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन, गौमांस और लव जिहाद जैसे भावनात्मक मुद्दों को पूरी दम से मुकाबला नहीं किया गया और इसी वजह से हिन्दू राष्ट्रवादी मोदी मजबूत हुए हैं.

विपक्ष, और खासतौर से गांधी परिवार, को निश्चित ही अपने तौर-तरीकों में बदलाव लाना होगा. लेकिन मोदी के सशक्त होने की मुख्य वजह समाज में आरएसएस की जबरदस्त घुसपैठ है. (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)

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