महिला आरक्षण या सियासी रणनीति? परिसीमन पर घमासान

मुकेश यादव की रिपोर्ट

गुरुवार से शुरू हुए संसद के तीन दिवसीय विशेष सत्र में मोदी सरकार ने परिसीमन (डीलिमिटेशन) विधेयक पेश किया। प्रस्ताव है कि 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़कर लागू किया जाए।

इस मुद्दे पर संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक बयानबाज़ी तेज हो गई है। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने इसे “आगामी चुनावों के लिए बीजेपी की रणनीति” बताया, जबकि शशि थरूर ने इसकी तुलना “डीलिमिटेशन की डिमोनेटाइजेशन” से की।

दक्षिण भारत में इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध देखने को मिल रहा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और उनकी पार्टी डीएमके ने काले झंडे दिखाकर अपना विरोध दर्ज कराया है। वहीं बीआरएस ने भी केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने की घोषणा की है।

विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार की मंशा वास्तव में महिला आरक्षण लागू करने की नहीं है। उनका कहना है कि वे महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़कर सरकार इस मुद्दे को अनावश्यक रूप से जटिल बना रही है।

प्रस्तावित विधेयक के अनुसार लोकसभा की सीटों की संख्या वर्तमान 543 से बढ़ाकर 816 करने का सुझाव दिया गया है।

इसके साथ ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की कुल सीटों में से एक-तिहाई हिस्से को महिलाओं के लिए आरक्षित करने की बात भी शामिल है।

यह महिला आरक्षण का प्रस्ताव वर्ष 2023 में पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर आधारित है, जिसमें 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। हालांकि, इस प्रावधान के लागू होने को भविष्य की जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ा गया है, जिसके कारण इसके क्रियान्वयन में देरी की संभावना बनी हुई है।

परिसीमन के मुद्दे पर प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि निर्णय प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष होगी और किसी के साथ कोई भेदभाव या अन्याय नहीं किया जाएगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि अब तक जो अनुपात और व्यवस्था चली आ रही है, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा और उसी आधार पर आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। साथ ही उन्होंने कहा कि यदि आश्वासन की आवश्यकता है, तो वह इसकी भी गारंटी देते हैं।

महिला आरक्षण विधेयक के समर्थन में प्रधानमंत्री ने कहा कि जो लोग आज इसका विरोध करेंगे, उन्हें भविष्य में इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। उन्होंने देश की महिलाओं पर भरोसा जताते हुए कहा कि उन्हें 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए, ताकि वे स्वयं निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बन सकें। उनके अनुसार, देश की आधी आबादी को नीति-निर्माण में शामिल करना आवश्यक है और यही संविधान की भावना भी है।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि महिलाओं को आरक्षण देना कोई उपकार नहीं, बल्कि उनका अधिकार है, जिसे दशकों से टाला गया। अब समय है कि इस ऐतिहासिक देरी को स्वीकार करते हुए इसे लागू किया जाए।

इससे पहले, केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में चर्चा के दौरान बताया कि परिसीमन के बाद प्रत्येक राज्य में लोकसभा सीटों की संख्या लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।

वहीं, जेडीयू सांसद राजीव रंजन सिंह ने कहा कि ‘नारी शक्ति वंदन विधेयक’ सर्वसम्मति से पारित हुआ था और सरकार का लक्ष्य इसे 2029 के आम चुनाव तक लागू करना है। उन्होंने इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक और मील का पत्थर साबित होने वाला कदम बताया, साथ ही कहा कि ऐसी पहल का विरोध नहीं, बल्कि समर्थन किया जाना चाहिए।

विपक्ष ने महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए इसे परिसीमन से जोड़ने पर आपत्ति जताई है।

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने चर्चा के दौरान कहा कि जब 2023 में नरेंद्र मोदी सरकार ने यह कानून सर्वसम्मति से पारित कराया था, तब Indian National Congress ने अपनी विचारधारा के अनुरूप इसका पूर्ण समर्थन किया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि आज भी कांग्रेस महिला आरक्षण के पक्ष में मजबूती से खड़ी है और आगे भी रहेगी।

हालांकि, उन्होंने बिल की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि सतह पर यह प्रस्ताव आपत्तिजनक नहीं दिखता, लेकिन गहराई से देखने पर इसके पीछे राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट नजर आता है। उनके अनुसार, जिस “राजनीति की बू” का जिक्र प्रधानमंत्री ने किया था, वही इस प्रस्ताव में पूरी तरह दिखाई देती है।

प्रियंका गांधी ने आगे कहा कि 2023 के कानून में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान था कि महिला आरक्षण लागू करने से पहले नई जनगणना और परिसीमन किया जाएगा, लेकिन वर्तमान प्रस्ताव में इन बातों का उल्लेख नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा क्या बदल गया कि सरकार अब पुराने आंकड़ों के आधार पर आगे बढ़ना चाह रही है और इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है।