
दिल्ली में 8 जून को INDIA Block की बैठक हुई , जिसमें देशभर की 23 बड़ी राजनितिक पार्टियों ने हिस्सा लिया. इस मीटिंग में विपक्षी दलों को एक मंच पर लाकर राजनीतिक एकजुटता का प्रदर्शन ज़रूर दिखाई दिया, लेकिन इस बैठक से निकलने वाला सबसे अहम् सवाल अभी भी लाजवाब है।
क्या चुनाव आते आते INDIA Block राष्ट्रहित में काम करेगा या स्वार्थ और सत्ता का लालच हावी रहेगा …… अगर इस गठबंधन का मक़सद सिर्फ बरसरे इक़्तेदार यानी सत्तारूढ़ पार्टी का राजनितिक विरोध करना है तो इस एकता का नतीजा भी स्वार्थ पर आधारित होगा.
अगर देश की अर्थव्यवस्था, बेरोज़गारी, शिक्षा नीति, महंगाई, कृषि संकट, राष्ट्रीय सुरक्षा और संस्थागत सुधारों पर कोई ठोस एवं साझा रोडमैप का विकल्प देश के सामने पेश किया जाता है तो यक़ीनन इस एकता के दूरगामी सकारात्मक नतीजे मिलने की उम्मीद रखें .
इस बात को लेकर india block की आलोचना होती रही है कि लोकसभा चुनाव के इर्दगिर्द इसकी बैठकें होती हैं, लेकिन आज जब INDIA Block की यह मीटिंग दिल्ली के Constitution Club में हुयी तो इसमें देश के कई ज्वलंत मुद्दों के साथ Parliament Session में मिलकर सरकार को घेरने और आगामी विधान सभा की चुनावी रणनीति पर भी बात हुयी लेकिन पेपर लीक मुद्दा काफी प्रमुख रहा.
बैठक में उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनाव को लेकर भी चर्चा हुई. विपक्षी दलों का मानना है कि देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में 2027 का विधानसभा चुनाव राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करेगा इसलिए INDIA ब्लॉक के लिए यूपी में बेहतर तालमेल और मजबूत रणनीति बेहद जरूरी होगी. और यह बात हर बार कही जाती है.
2024 लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन ने कई सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया था. हालांकि विधानसभा चुनाव का समीकरण अलग होता है. स्थानीय मुद्दे व् नेतृत्व का इशू भी रहता है , इस सबके साथ पार्टी संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बड़ी भूमिका निभाती है.
बैठक के फ़ौरन बाद ही ऐसी जानकारी मिल रही है कि समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कांग्रेस की कार्यशैली को लेकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है और गठबंधन को आत्ममंथन यानी Introspection की याद दिलाई है. हालांकि आत्ममंथन की नसीहत या मश्वरा कोई बुरी बात नहीं है, और हर पार्टी को करना चाहिए. मगर असल मामला है कि किस नीयत से मश्वरा दिया जा रहा है.
हमारा मानना है कि देश का राजनितिक विपक्ष अब सिर्फ फोटो sessions और रिवायती बयानबाज़ी से जनता का विश्वास नहीं जीत सकता। जनता को यह विशवास दिलाना होगा कि देश का विपक्ष सिर्फ़ मोदी सरकार या बीजेपी का विरोध नहीं करता, बल्कि सरकार की सभी जनविरोधी नीतियों और विचारधारा का व्यवहारिक और सामूहिक रूप से विरोध करता है.
मुस्लिम समुदाय के मुद्दों का साथ दिया तो हिन्दू समुदाय हमसे नाराज़ होजायेगा वाली सोच अपने आप में अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है, इस फार्मूला को आज़माते हुए लगातार तीसरी बार सत्ता से बाहर है INDIA Alliance. सत्तारूढ़ के सांप्रदायिक और हिंदूवादी नैरेटिव को देशहित में counter करते हुए धर्मनिरपेक्षता, एकता और अखंडता के साथ जनहितेषी योजनाओं के नैरेटिव को मज़बूत करना होगा.
क्योंकि धर्म और जाती की सियासत के लिए देश में एक ही पार्टी काफी है, INDIA Alliance को देश सर्वोपरि और स्वतंत्रता संग्राम वाली सोच और जज़्बे के साथ राजनीती के मैदान में कूदने की ज़रूरत है.
राहुल गाँधी का भारत जोड़ो अभियान एक कामयाब initiative था, जिसने देश से communal सोच, नफ़रत और ख़ौफ़ के माहौल को काफ़ी हद तक कण्ट्रोल किया था, लेकिन उस दौरान जुडी भीड़ को वोट में तब्दील करने में कांग्रेस के रणनीतिकार नाकाम रहे. इन्साफ की बात यह है कि राहुल गाँधी की मेहनत में कोई कमी नहीं है लेकिन संगठन अभी भी न मज़बूत है और न ही सीरियस. जनता बदलाव चाह रही है मगर इसको बेहतर सियासी विकल्प नहीं मिल रहा है.