कपिल बर्मन(जागृत भारत)
दीदी की ‘घर वापसी’ के कयास: संघर्ष, सत्ता और तृणमूल के कांग्रेस में विलय की सुगबुगाहट
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज है। राजनीतिक गलियारों में एक कयास सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रहा है: क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय कर देंगी? सत्ता के समीकरण बदलते ही जिस तरह से टीएमसी के सांसदों और विधायकों में भगदड़ की स्थिति देखी जा रही है, उसने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।
वहीं दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा कथित तौर पर ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की नीति अपनाकर टीएमसी नेताओं को अपने पाले में करने की खबरें भी गर्म हैं। इस संकट के बीच, ममता बनर्जी के अतीत, वर्तमान और भविष्य के राजनीतिक सफर पर नजर डालना बेहद दिलचस्प हो जाता है।:
कांग्रेस से पुराना नाता और बगावत का सफर
ममता बनर्जी और कांग्रेस का रिश्ता बेहद पुराना और गहरा रहा है। 1970 के दशक में एक युवा और आक्रामक छात्र नेता के रूप में ममता ने कांग्रेस से ही अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। 1984 की इंदिरा गांधी की सहानुभूति लहर में उन्होंने माकपा के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर सीट से हराकर तहलका मचा दिया था। वे केंद्र में कांग्रेस सरकार के दौरान मंत्री भी रहीं।
हालांकि, पश्चिम बंगाल में तत्कालीन सत्ताधारी वामपंथियों (सीपीएम) के खिलाफ कांग्रेस के ‘नरम रुख’ से ममता लगातार असहज थीं। उनका मानना था कि राज्य कांग्रेस के बड़े नेता वामपंथियों से मिले हुए हैं। इसी वैचारिक मतभेद और अपनी उपेक्षा के विरोध में 1 जनवरी 1998 को ममता बनर्जी ने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया और अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITMC) का गठन किया।
संघर्ष से शिखर तक: टीएमसी का उदय
तृणमूल कांग्रेस का गठन ममता बनर्जी के जीवन का सबसे बड़ा जुआ था। उन्होंने ‘मां, माटी, मानुष’ का नारा दिया और सिंगूर व नंदीग्राम के भूमि आंदोलनों के जरिए खुद को पश्चिम बंगाल की जनता की आवाज बना दिया। 2011 में उन्होंने 34 साल पुराने अभेद्य वामपंथी किले को ध्वस्त कर इतिहास रच दिया और मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। इसके बाद अगले एक दशक से अधिक समय तक ममता बनर्जी ने बंगाल की राजनीति पर एकछत्र राज किया और टीएमसी को एक राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे तक पहुंचाया।
वर्तमान संकट: भगदड़ और ‘ऑपरेशन कमल’ का साया
राजनीति में वक्त बदलते देर नहीं लगती। वर्तमान में तृणमूल कांग्रेस के सामने अस्तित्व का सबसे बड़ा संकट खड़ा दिख रहा है। सत्ता से बेदखल होने की आहट या राजनीतिक दबाव के चलते पार्टी के भीतर असंतोष की लहर है। खबरों के मुताबिक, भाजपा टीएमसी के असंतुष्ट सांसदों और विधायकों को अपने पाले में लाने की हरसंभव जुगत में लगी है। केंद्रीय एजेंसियों के डर और सत्ता की मलाई खोने के डर से कई नेता पाला बदलने को तैयार बैठे हैं। इस चौतरफा दबाव ने ममता बनर्जी को रक्षात्मक रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है।
क्या वाकई संभव है ‘घर वापसी’?
इस चौतरफा घेराबंदी से बचने के लिए राजनीतिक विश्लेषक ‘विलय’ की थ्योरी को खारिज नहीं कर रहे हैं। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं:
मजबूत वैचारिक छतरी: भाजपा के आक्रामक राष्ट्रवाद और संगठनात्मक ताकत का मुकाबला अकेले क्षेत्रीय दल के दम पर करना अब मुश्किल हो रहा है। कांग्रेस में विलय से टीएमसी नेताओं को एक राष्ट्रीय पार्टी की वैचारिक छतरी और सुरक्षा मिल सकती है।
सोनिया-राहुल से समीकरण: ममता बनर्जी के गांधी परिवार, विशेषकर सोनिया गांधी के साथ हमेशा से मधुर संबंध रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी मोर्चे में दोनों दल अक्सर साथ दिखते हैं।
वोट बैंक का बिखराव रोकना: बंगाल में मुस्लिम और धर्मनिरपेक्ष वोटों का बिखराव रोकने के लिए कांग्रेस और टीएमसी का एक होना एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकता है।
निष्कर्ष: इतिहास का घूमता पहिया
यदि तृणमूल कांग्रेस का कांग्रेस में विलय होता है, तो यह भारतीय राजनीति के इतिहास का एक पूरा चक्र (Full Circle) होगा। जिस कांग्रेस को छोड़कर ममता ने अपनी नई राह चुनी थी, संकट के समय उसी की शरण में जाना उनकी राजनीतिक मजबूरी भी हो सकता है और एक सोची-समझी रणनीति भी। हालांकि, ममता बनर्जी जैसी जुझारू नेता आसानी से घुटने नहीं टेकतीं। यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘दीदी’ इस चक्रव्यूह से निकलने के लिए (कांग्रेस) का दामन थामती हैं या फिर एक नए संघर्ष का रास्ता चुनती हैं।