कपिल बर्मन (जागृत भारत)
इतिहास खुद को दोहराता है, बस उसके पात्र और तरीके बदल जाते हैं। सदियों पहले महाभारत काल में जब गुरु द्रोणाचार्य ने अपने प्रिय और विशेषाधिकार प्राप्त शिष्य अर्जुन को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर सिद्ध करने के लिए एक आदिवासी और वंचित समाज से आने वाले एकलव्य से उसका अंगूठा ‘गुरुदक्षिणा’ में मांग लिया था, तो वह केवल एक शारीरिक अंग का कटना नहीं था। वह असल में एक वंचित वर्ग की योग्यता, उसकी प्रतिभा और उसके भविष्य का क्रूर दमन था। वह इस बात का उद्घोष था कि सत्ता, साधन और विद्या पर केवल एक विशेष वर्ग का ही एकाधिकार रहेगा।
आज के दौर में जब हम ‘नीट’ (NEET) जैसी बड़ी राष्ट्रीय परीक्षाओं के पेपर लीक, धांधली और परीक्षा में संगठित नकल की खबरें सुनते हैं, तो आधुनिक भारत के मानस में वही ऐतिहासिक घाव फिर से हरा हो जाता है। आज का पेपर लीक और शिक्षा का बाजारीकरण कुछ और नहीं, बल्कि आधुनिक एकलव्यों के अंगूठे काटने की नई ‘वर्चस्ववादी’ और ‘मनुवादी मानसिकता’ का ही डिजिटल संस्करण है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मनुवादी मानसिकता
ऐतिहासिक रूप से, भारत का एक लंबा अतीत सामाजिक असमानता से ग्रसित रहा है। मनुवादी व्यवस्था में समाज के एक बड़े हिस्से, विशेषकर शूद्रों और अति-शूद्रों को शिक्षा के अधिकार से पूरी तरह वंचित कर दिया गया था। नियम इतने कड़े और अमानवीय थे कि यदि कोई वंचित वेद मंत्र सुन भी ले, तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डालने तक का विधान था।
इस व्यवस्था के पीछे एक गहरी साज़िश थी वे जानते थे कि अज्ञानता ही गुलामी की सबसे मजबूत जंजीर है। जब तक कोई व्यक्ति अशिक्षित रहेगा, वह अपने शोषण को ही अपनी नियति मानकर स्वीकार करता रहेगा। शिक्षा ही वह ज्योति है जो मनुष्य के भीतर चेतना जगाती है और उसे अन्याय, अत्याचार और शोषण के खिलाफ खड़े होने का साहस देती है।
बाबा साहब का मूलमंत्र: शिक्षित बनो
इसी ऐतिहासिक अन्याय को गहराई से समझते हुए, आधुनिक भारत के शिल्पकार और चेतना के प्रतीक बाबा साहब डॉ. भीम राव अंबेडकर ने शोषित समाज को जगाने के लिए एक कालजयी नारा दिया था:
“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।”
गौर करने वाली बात यह है कि बाबा साहब ने ‘शिक्षित बनो’ को सबसे पहली प्राथमिकता दी। उनका मानना था कि बिना शिक्षा के संगठन अंधभक्तों का झुंड बन जाएगा, और बिना शिक्षा के किया गया संघर्ष दिशाहीन होगा। यदि आपको अपने अधिकारों, अपने मान-सम्मान और स्वाभिमान के लिए व्यवस्था से लड़ना है, तो वैचारिक रूप से मजबूत होना अनिवार्य है, और उसका एकमात्र रास्ता शिक्षा है। शिक्षा वह “शेरनी का दूध” है, जिसे जो पियेगा, वह दहाड़ेगा।
वर्तमान वर्चस्ववादी ताकतें और शिक्षा का संकट
आज के समय में जब हम शिक्षा के स्तर और व्यवस्था को देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि कुछ अदृश्य ताकतें योजनाबद्ध तरीके से शिक्षा को आम आदमी की पहुँच से दूर करना चाहती हैं। सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों की स्थिति को जर्जर करना, उच्च शिक्षा की फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी करना और परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर धांधली होना, यह सब एक सोची-समझी क्रूर व्यवस्था का हिस्सा प्रतीत होते हैं।
जब एक गरीब, किसान या मजदूर का बच्चा दिन-रात एक करके, भूखे पेट रहकर परीक्षा की तैयारी करता है और अंत में पता चलता है कि पेपर चंद अमीर लोगों के कमरों में लाखों-करोड़ों रुपये में पहले ही बिक चुका था, तो यह केवल एक परीक्षा का लीक होना नहीं है। यह उस गरीब परिवार की उम्मीदों की हत्या है। यह इस बात को सुनिश्चित करने का प्रयास है कि:
अमीर और अमीर बन रहे: क्योंकि उसके पास साधन हैं, वह पेपर खरीद सकता है या महंगे निजी संस्थानों में पढ़ सकता है।
गरीब हमेशा गरीब और लाचार बन रहे: ताकि वह कभी सत्ता और साधनों में अपनी हिस्सेदारी न मांग सके।
यह वर्चस्ववादी विचारधारा चाहती है कि देश की सत्ता, संपत्ति और संसाधन केवल कुछ गिने-चुने ‘विशेषाधिकार प्राप्त’ लोगों के हाथों में ही सिमटे रहें। वे जानते हैं कि यदि आम आदमी का बच्चा शिक्षित हो गया, तो वह अपने अधिकारों के लिए सवाल पूछेगा, वह नौकरियों में बराबरी का हक मांगेगा और संसद से लेकर प्रशासन तक में अपनी जगह का दावा करेगा।
भारत का भविष्य और हमारा दायित्व
यदि शिक्षा की यही स्थिति रही, जहां योग्यता को धन बल और बाहुबल से कुचल दिया जाए, तो भारत का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। एक ऐसा देश जहां प्रतिभाएं अवसरों के अभाव में दम तोड़ दें और केवल पैसे के दम पर अयोग्य लोग शीर्ष पदों पर बैठ जाएं, वह देश कभी विश्व गुरु या महाशक्ति नहीं बन सकता।
आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि इस नई मनुवादी और वर्चस्ववादी मानसिकता के खिलाफ देश के युवाओं, बुद्धिजीवियों और आम नागरिकों को एकजुट होना होगा। हमें यह समझना होगा कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और शिक्षा का लोकतंत्रीकरण (सभी के लिए समान उपलब्धता) ही इस देश को बचा सकता है।
आधुनिक एकलव्यों को अब अपना अंगूठा दान करने की जरूरत नहीं है, बल्कि उन्हें बाबा साहब की कलम को अपनी ताकत बनाकर व्यवस्था से सवाल पूछना होगा। जब तक देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार नहीं मिलता, तब तक समानता और लोकतंत्र की हर बात अधूरी है। शिक्षा पर सबका हक है, क्योंकि यही संघर्ष की पहली सीढ़ी है।
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