असम के भारी मतदान ने बढ़ाया असमंजस

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इस साल का जनादेश सुनने का मौका जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा है, दिल्ली की फिज़ा गरम होती जा रही है। उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन और अगस्ता वेस्टलैंड मामले में कथित घूसखोरी पर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी एक-दूसरे पर हमला बोली हुई हैं। लेकिन केंद्र के सियासी समीकरणों में इन दोनों पार्टियों के लिए राज्यों से जो नई हवा बही जानी है, वह 19 मई को ईवीएम मशीनों से निकलेगी।

फिलहाल जिन पांच राज्य – असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, पुदुच्चेरी के जनादेश नई सियासी फिज़ा तैयार करेंगे। इसमें असम ही एकमात्र राज्य है जिसके नतीजे इन दोनों पार्टियों के आला नेताओं की सियासत के लिए सबसे अधिक काम के होंगे। कांग्रेस का तो दांव केरल में भी है और पश्चिम बंगाल में भी है। अगर वाममोर्चा के साथ मिलकर वह ममता बनर्जी को कुछ झटका दे पाती है तो उसके केंद्रीय नेतृत्व को राहत मिलेगी। लेकिन भाजपा में मोदी-शाह-जेटली की आला तिकड़ी के लिए तो असम से ही ठंडक मिल सकती है जो दिल्ली और बिहार से चली सियासी लू की तपन कुछ हल्की कर दे, बशर्ते वहां के लोगों ने वाकई कोई भगवा पुरबाई बहाने के लिए बटन दबा दिया हो।

असम में मतदान के भारी प्रतिशत को देखें तो पुरबाई बहने की उम्मीद तो बंधती है लेकिन उसके रुख को लेकर कुछ असमंजस बना हुआ है। सबसे गूढ़ सवाल यही है कि असम के दोनों चरणों में इतने भारी औसतन 84 प्रतिशत से अधिक मतदान का रहस्य क्या है? पहले चरण के ऊपरी असम और बराक घाटी की 65 सीटों के लिए 82.2 प्रतिशत मतदान हुआ तो दूसरे चरण में निचले और मध्य असम की 61 सीटों के लिए 87.83 प्रतिशत मतदान हुआ। दूसरे चरण में तो कई इलाकों में मतदान प्रतिशत 90 से अधिक दर्ज किया गया है। ये वही इलाके हैं, जहां मुस्लिम आबादी सर्वाधिक है और करीब 30 सीटें सीधे मुसलमानों के वोट से तय होती हैं। कुल 126 सीटों वाली विधानसभा में इसी वजह से राज्य में करीब 34 प्रतिशत मुस्लिम वोटों का महत्व कुछ ज्यादा ही अहम है।

भाजपा गठबंधन की उम्मीदों के उफान की एक बड़ी वजह यह भी है कि अगर मुसलमान वोट कांग्रेस और बदरूद्दीन अज़मल के ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआइयूडीएफ) में बंटे तो उसके लिए बहुमत पाना बेहद आसान हो जाएगा। एआइयूडीएफ को लोकसभा चुनावों में तीन सीटें और 14.80 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। लेकिन क्या मुस्लिम वोट बंटे हैं या फिर भारी मतदान एक खास तरह के ध्रुवीकरण की कहानी कहते हैं। असम की स्थानीय मीडिया में एक घटना की बड़ी चर्चा है, जो इस ध्रुवीकरण का संकेत देती है।

बदरूद्दीन अजमल के इलाके धुबरी में एक गांव में एक मुसलमान ने अपनी 10 साल की पत्नी को सरेआम इसलिए तलाक दे दिया क्योंकि उसने गांव के फैसले के विरुद्ध कांग्रेस के उम्मीदवार को वोट नहीं दिया था। संभव है, खासकर मुस्लिम इलाकों में वोट इस बार भाजपा को हराने के लिए दिए गए हों। इसलिए यह भी समझा जा रहा है कि भारी मतदान का अर्थ मतदाताओं द्वारा छोटी पार्टियों को ख़ास तवज्जो नहीं देना भी हो सकता है। अगर ऐसा होता है तो सिर्फ एआइयूडीएफ को ही नहीं बल्कि असम गण परिषद और बोडो गुटों की ओर भी ज्यादा झुकाव नहीं दिखेगा, जो भाजपा के सहयोगी हैं।

लेकिन दूसरी संभावना यह भी है कि 15 साल के गोगोई राज से ‘परिवर्तन’ की आकांक्षा के साथ संभावित मुस्लिम विरोधी ध्रुवीकरण का भी असर लोगों पर हो सकता है। असम में इसकी जमीन कई स्थानीय और अलगाववादी आंदोलनों के दौरान तैयार भी की गई है। मोटे तौर पर खासकर बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ आंदोलन के जरिए ही राज्य में नब्बे के दशक में असम गण परिषद की सरकार बनी थी।

असम गण परिषद में टूट-फूट और बोडो जनजातीय तथा उल्फा अलगाववादी आंदोलनों ने उसे राज्य की राजनीति में बेमानी बना दिया तो कांग्रेस का एकछत्र राज्य फिर कायम हो गया। पहले हितेन सैकिया और फिर तरुण गोगोई की सरकारों ने अलगाववादी गुटों के बीच टूट-फूट का लाभ उठाया और उनकी कई इलाकों में वफादारी भी हासिल कर ली। उधर, मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने के लिए मुंबई के एक इत्र व्यापारी बदरूद्दीन अजमल ने ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का गठन किया। 2011 के विधानसभा चुनावों में इस फ्रंट ने अच्छा-खासा प्रदर्शन करके चौंका दिया था।

पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा को अचानक कुल 14 में से 7 सीटें और 36.50 प्रतिशत वोट मिलने से राज्य का सियासी मानचित्र बदलता हुआ लगा। फिर कांग्रेस के हेमंत बिस्वा सरमा अपने दलबल के साथ भाजपा में शामिल हो गए। बाद में असम गण परिषद (अगप) और एक बोडो गुट बीपीएफ से गठजोड़ के कारण भी भाजपा का खेमा मजबूत दिखने लगा। भाजपा ने दिल्ली और बिहार से सबक लेकर अपनी रणनीति भी बदली और केंद्रीय खेल राज्यमंत्री सर्बानंद सोनेवाल को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार भी घोषित किया। सोनेवाल पहले अगप में रह चुके हैं और एक छोटे-से जनजातीय समूह से आते हैं।

भाजपा ने शुरू में मुस्लिम विरोधी ध्रुवीकरण की भी कोशिशें कीं। लोकसभा चुनावों में तो इसी भावना को भुनाने के लिए मोदी ने कहा था कि केंद्र में सरकार बदलते ही बांग्लादेशियों को वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। लेकिन बांग्लादेश से भूमि हस्तांतरण संधि पर मुहर लगने के बाद मोदी सरकार के इस वादे पर लोगों का भरोसा शायद कुछ डिग गया है। इस वजह से विधानसभा चुनावों में इस पर ज्यादा जोर नहीं दिया गया।

कांग्रेस भी भरसक मुसलमानों के हमदर्द कहलाने से बचने के लिए एआइयूडीएफ से समझौते के रास्ते पर नहीं गई। कांग्रेस को दूसरा लाभ अगप और बोडो गुटों में असंतोष का भी मिल सकता है। सैकिया ने बोडो और उल्फा के समर्पण किए नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी काफी जोड़ा है। कांग्रेस शायद यह भावना फैलाने में एक हद तक कामयाब रही है कि भाजपा के हिंदुत्ववादी रुझानों से राज्य में सांप्रदायिक और जनजातीय तानाबाना बिगड़ जाएगा। इसी वजह से खासकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने असम के 15वीं सदी के वैष्णव संत शंकरदेव को अपने कई भाषणों में याद किया और उनके सामाजिक सहिष्णुता के संदेश पर जोर दिया।

भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने भी शंकरदेव को याद करके हिंदू भावनाओं को छूने की कोशिश की। लेकिन भाजपा गठबंधन की जमीन तैयार करने में तो सबसे अधिक हेमंत बिस्वा सरमा का ही योगदान कहा जाएगा। हेमंत के सामने कांग्रेस और सैकिया को अपनी ताकत दिखाने की भी चुनौती थी। कांग्रेस और भाजपा गठबंधन दोनों ही अपने बहुमत का दावा कर रहे हैं और कुछ चुनावी पंडित त्रिशंकु विधानसभा की भी उम्मीद कर रहे हैं। चर्चाएं तो ये भी हैं कि बदरूद्दीन अजमल दोनों ही खेमों से संपर्क में हैं क्योंकि किसी को बहुमत न मिलने की स्थिति में उनका महत्व बढ़ सकता है। हालांकि भारी मतदान स्पष्ट जनादेश का भी संकेत हो सकता है। इसलिए 19 मई को शायद सबसे ज्यादा दिलचस्पी असम के चुनाव नतीजों में ही होगी।

हरिमोहन मिश्र वरिष्ठ पत्रकार एवं टिप्पणीकार हैं…

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