१ मई को दुनिया मज़दूर दिवस मना रही थी और सबदलपुर गाउँ में दुखयारी की पगार न मिलने की वजह से उसके घर चूल्हा नहीं जला था यह बात मुझको दुखयारी के भतीजे ने बताई मैं उस गाउँ में पूरी तैयारी के साथ गया और उस वयक्ति की पूरी छान बीन करके ही पहुंचा मैंने दुखयारी से जानना चाहा कौन है जो तुम्हारी पगार नहीं देरहा उसने यह कहकर मना करदिया की वो बड़ा आदमी है पुलिस वाले उसके घर बैठे रहते हैं और शराब चलती रहती है कुछ न कह्यो साहब आप। हम उससे मिले तो पता चला कस्बे में शराब की दूकान है और सूद पर पैसा देता है वो शख्स। मगर गाउँ के खेत से गेहूं की गहाई कराकर मज़दूरी नहीं देता है। मैंने जब उसको बताया की जो पुलिस वाले तुम्हारी बैठक में बैठते हैं उनका अफसर हमको सलाम करता है तुमने दुखयारी की पगार क्यों रोकी है चलो अभी उसकी मज़दूरी पहुंचकर आओ उसको आभास होगया था की यह ज़रूर मेरी जानकारी लेकर यहाँ पहुंचा है तो फ़ौरन गया और उसकी २० दिन की मज़दूरी देकर आया और क्षमा मांगी मुझको लगा मेरा मज़दूर दिवस मन गया! उसी रोज़ दिल्ली में एक बड़ी कांफ्रेंस मुझे मुख्य अतिथि बना रखा था जहाँ कई नेता और साहूकार आ रहे थे ,मगर दुखयारी की मज़दूरी दिलाकर जो ख़ुशी हासिल हुई वो मालाएं पहनकर न होती । किस मज़दूर दिवस को मना रहे हो भाई !यही हाल ऊपर के स्तर तक बढ़ा जा रहा है ।
आज जिस मीडिया को दुनिया के वंचित वर्ग एवं मज़दूर वर्ग की आवाज़ बनना चहिये वो कॉर्पोरेट वर्ग और सत्ता पक्ष का ग़ुलाम बन हुआ है कुछ को छोड़कर , उनको धमकियाँ मिलती हैं और जान की भी क़ुरबानी देनी पड़ती है और उनकी शहादत का खून कुछ दिन तक कई कलमों की स्याही बनता है और फिर सियाही सूख जाती है क़लम भी खामोश होजाता है ।हालाँकि क़लम की धार तलवार से तेज़ है फिर भी इसका उचित उपयोग नहीं
पिछले दिनों समाजवाद की चादर ओढ़े चीन के पूँजीवादी शासकों की तमाम कोशिशों के बावजूद वहाँ मज़दूरों के बढ़ते आन्दोलनाे की ख़बरें बाहर आईं ।चीन की एक संस्था ‘चाइना लेबर बुलेटिन’ के अनुसार वर्ष 2015 में चीन में मज़दूरों ने अपने अधिकार और पूँजीवाद के खिलाफ करीब 2774 हड़तालें एवं विरोध प्रदर्शन किये जो वर्ष 2011 (185 हड़तालें) की तुलना में 13 गुना बढ़ चुकी हैं। इन हड़तालों में से एक-तिहाई हड़तालें मुख्य रूप से मैन्युफेक्चरिंग और निर्माण क्षेत्र में मालिकों द्वारा वेतन न दिए जाने पर संगठित हुई थी।
चीन के श्रम मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2015 में करीब 10 लाख 56 हज़ार औद्योगिक विवाद और 503 हड़तालें भी सामने आ चुकी हैं विवाद सामने आये और इस वर्ष अकेले जनवरी माह में ही 503 हड़तालें एवं औद्योगिक विवाद भी सामने आ चुके हैं। ये हड़तालें मुख्यत: मालिकों द्वारा मज़दूरों को वेतन न दिए जाने, कारखानों में तालाबंदी और छंटनी, मालिकों द्वारा मजदूरों के लिए मौजूद श्रम कानूनों के प्रावधानों को लागू न करने के खिलाफ़ संगठित हो रही है। यूं तो चीन की सरकार द्वारा वर्ष 1995 में श्रम कानूनों में संशोधन करके वेतन प्राप्त करने का अधिकार, काम के दौरान आराम और अत्याधिक ओवरटाइम न कराए जाने के प्रावधान शामिल किये गये थे, पर जैसा कि हम सभी जानते है कि ये कानून महज़ कागज़ों तक सीमित रहते हैं और मेहनतकशों को भ्रमित करके उनकी आँखों में धूल झोंकने के लिए बनाए जाते है।
हर वर्ष मनाए जाने वाले दिवस जैसे ,बाल दिवस ,मज़दूर दिवस,महिला दिवस ,मानवाधिकार दिवस पर्यावरण दिवस इत्यादि से कुछ नहीं होगा! स्वतंत्र दिवस देश 68 वर्षों से मनाता आरहा है किन्तु आज़ादी की आज भी गुहार लगाई जा रही है !किसको मिली आज़ादी और कौन है आज भी ग़ुलाम, यह एक विषय है चर्चा का ! दरअसल दुनिया में पूँजीवाद इतना हावी होगया है कि हरेक मुद्दे और मामले कि कड़ी सियासत से जुड़ जाती है और सियासत के तार पूँजीवाद से जुड़े होते हैं , तो दिखने को क़ानून तो बनते हैं मगर उन्ही क़ानूनों पर अमल होपाता है जिससे कॉर्पोरेट घराने को नुकसान न हो ।
पिछले एक दशक से पीड़ितों और मज़दूरों द्वारा विश्व भर में चलाये जा रहे आंदोलन के कारण दुनिया के नक़्शे पर राजीतिक , सामाजिक तथा वैचारिक क्रांति कि एक धुंदली सी तस्वीर देखने को मिली है जिसको साफ़ होने में समय और दिशा निर्देश की ज़रुरत दिखाई दी है! विश्व में फैलती निजीकरण कि आंधी इस क्रांति की ज़िम्मेदार होगी साथ ही सरकारी विभागों, उद्योगों तथा कारखानों में विफल प्रशासन और प्रबंधन भी निजीकरण की वयवस्था का आधार बना,मज़दूर तथा कर्मचारी वर्ग की थोड़ी दुष्टता और लापरवाही से भी इंकार तो नहीं किया जासकता किन्तु कॉर्पोरेट और सरकारों की मिलीभगत इसके लिए ज़्यादा उत्तरदायित्व रखती हैं ! मगर पूरी दुनिया में सामंतवाद ,जातिवाद ,पूँजीवाद तथा साम्राजयवाद के विरुद्ध जो आंधी चल चुकी है …. वो कितनी खतरनाक होगी इसका अंदाजा स्वयं सरकारों को भी नहीं है , और जनता तो अभी पानी, दूध , ब्रेड ,और दवा लेने की लाइन में ही खड़ी है और सबसे लम्बी लाइन अब मोबाइल रिचार्ज करवाने वालों की होने लगी है जो ग़ुलामी की पहचान बन चूका है काफी चिंता का विषय है !ALI AADIL KHAN editor’s desk