क्या देवता मांस खाते थे?

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Prof. Ram Puniyani
Prof Ram Puniyani

भगवान राम और अन्य देवताओं की खानपान की आदतों पर केन्द्रित ध्रुव राठी का एक वीडियो हाल में विवाद का मुद्दा बना. ध्रुव राठी के वीडियो गहन शोध और अध्ययन पर आधारित होते हैं और काफी लोकप्रिय हैं. उनके ताज़ा वीडियो में बताया गया है कि भगवान राम मांसाहारी थे. वीडियो में कई जगह वाल्मीकि रामायण का हवाला दिया गया है.

धर्मग्रंथों में दिए गए विवरण के आधार पर उन्होंने कई अन्य देवताओं के खानपान का वर्णन किया है और उस काल में मांसाहार के प्रचलन और देवताओं द्वारा सोमरस का सेवन किए जाने की बात कही है. विवाद खड़ा करने वालों का मानना है कि देवता मांसाहारी खाद्य पदार्थों का सेवन कर ही नहीं सकते. हिंदी धर्मग्रंथों में ऐसे बहुत सारे उद्धरण हैं जिनमें उस काल में मांस भक्षण की बात कही गई है.

स्वामी विवेकानंद अपनी पुस्तक ‘ईस्ट एंड वेस्ट‘ में इसकी तसदीक करते हैं. स्वामी जी अमेरिका में एक बड़ी सभा में बोलते हुए बताते हैं: “अगर में आपको यह बताऊं तो आप अचंभित रह जाएंगे कि प्राचीन अनुष्ठानों में गौमांस न खाने वाले व्यक्ति को अच्छा हिन्दू नहीं माना जाता था. हिन्दुओं के लिए कई मौकों पर सांड़ की बलि चढ़ाना और उसका मांस खाना अनिवार्य था.” {(विवेकानंद का 2 फरवरी 1900 को शेक्सपियर क्लब, पासडेना, केलिर्फोनिया, अमेरिका में ‘बुद्धिस्टिक इंडिया‘ विषय पर संबोधन. द कंपलीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद (खंड 3, कलकत्ताः अद्वैत आश्रम, 1997 पृष्ठ 536)}

स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रायोजित अन्य शोध कार्यों से भी इसकी पुष्टि होती है. इनमें से एक में कहा गया है, “‘ब्राम्हणों सहित वैदिक आर्य मछली, मांस और यहां तक कि गौमांस तक खाते थे. विशिष्ट मेहमानों के सम्मान में भोजन में गौमांस परोसा जाता था.

हालांकि वैदिक आर्य गौमांस का सेवन करते थे, किंतु दूध देने वाली गायों का वध नहीं किया जाता था. गायों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक शब्द अगोन्या (जिसका वध नहीं किया जाना है) था. लेकिन  अतिथि गोघना (जिसके लिए गाय का वध किया जा सकता था) होता था. केवल सांडों, बांझ गायों और बछड़ों का कत्ल किया जाता था {सी. कुन्हन राजा, ‘वैदिक कल्चर‘ में सुनीता कुमार एवं अन्य (संपादक) श्रृंखला “द कल्चरल हैरिटेज ऑफ इंडिया” खंड 1, कलकत्ताः द रामकृष्ण मिशन, 1993, 217 से उदृत).

बाबासाहेब अम्बेडकर ने भी भारत की खानपान की परंपराओें का अध्ययन किया और बताया कि बौद्ध धर्म के उदय के बाद उसका मुकाबला करने के लिए ब्राम्हणवादियों ने ‘गौमाता‘ का नारा उछाला. शाकाहार जिन लोगों की पहुंच के बाहर था उन्होंने गौमांस का सेवन जारी रखा और उन्हें अस्पृश्य घोषित कर दिया गया. यदि हम उद्विकास के सिद्धांत के आधार पर बात करें तो प्राचीन काल में मानव शिकार करके भोजन जुटाते थे. पशुपालक समाज के आकार लेने तक यह जारी रहा.

इसके दौरान डेयरी उत्पादों के अतिरिक्त पशुओं का सेवन भी किया जाता रहा. देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशुओं की बलि चढ़ाना एक आम बात बन गई थी. भगवान गौतम बुद्ध ने देवताओं को गायों और अन्य पशुओं की बलि चढ़ाए जाने का विरोध किया. जहां भगवान महावीर पशु मांस खाए जाने को पूर्णतः समाप्त किए जाने के पक्षधर थे, वहीं भगवान बुद्ध कहते थे कि यदि भिक्षा में भिक्षुक को मासांहारी भोजन दिया जाए तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए. बौद्ध सम्राट  अशोक ने अपने आज्ञापत्र में कहा था कि पशुओं की बलि चढ़ाया जाना बंद होना चाहिए लेकिन भोजन हेतु पशुओं और पक्षियों का वध किया जा सकता है.

आज भी कई मंदिरों में पशुओं की बलि चढ़ाने की सदियों पुरानी परंपरा जारी है. अभी भी कामाख्या देवी मंदिर (असम) और दक्षिणेश्वर काली मंदिर सहित कई मंदिरों में मांस और मुर्गियों का प्रसाद की तरह इस्तेमाल किया जाता है. महाराष्ट्र में लोनावाला के पास एकवीरा देवी का मंदिर है जिसमें मुर्गा और ताड़ी को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है.

भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, आज भारत की कुल जनसंख्या का लगभग 70 प्रतिशत मांसाहारी है. जैन धर्मावलंबी अधिक अनुपात में शाकाहारी हैं और केवल 45 प्रतिशत हिंदू शाकाहारी हैं. तटीय इलाकों में रहने वाले अधिकतर लोगों का पसंदीदा खाद्य पदार्थ मछली है. कोंकण क्षेत्र में इसे ‘सागर पुष्प‘ कहा जाता है वहीं बंगाल के कुछ इलाकों में इसे ‘सागर फल‘ कहते हैं. उल्लेखनीय है कि बंगाल में मछली का वहां के कई रस्मो-रिवाजों में महत्वपूर्ण स्थान है. 

दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में खानपान की आदतों में जमीन-आसमान का अंतर है. भारत में ही मुसहर समुदाय है जिसके सदस्य गरीबी के कारण मजबूर होकर चूहे खाते हैं. उत्तर-पूर्वी राज्यों में गौमांस का सेवन देश के अन्य राज्यों की तुलना में अधिक होता है. जहाँ गौमांस को एक राजनैतिक मुद्दा बना दिया गया है और हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा मुसलमानों और दलितों की लिंचिंग  एक आम बात बन गई वहीं केरल के भाजपा नेता एन. श्रीप्रकाशम ने आश्वासन दिया है यदि वे चुनाव जीते तो बेहतर गुणवत्ता के बीफ की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगे.

फिल्म ‘केरेला स्टोरी 2‘ के टीजर में हमने देखा कि एक मुस्लिम युवक से विवाह करने वाली एक हिन्दू लड़की को मुस्लिम परिवार जबरदस्ती गौमांस खिला रहा है. यह क्या मजाक है. हिंदू लड़कियों को मुस्लिम पुरूषों से विवाह करने से रोकने के लिए यह दिखाया गया है ताकि लड़कियां अपनी मर्जी से विवाह करने के प्रति हतोत्साहित हों. हकीकत यह है कि गौमांस केरल का एक अत्यंत प्रचलित खाद्य पदार्थ है.

मानवजाति का इतिहास बताता है कि विभिन्न कालखंडों में अलग-अलग तरह की खानपान की आदतें रही हैं. वर्तमान में वीगनवाद का दौर है. इसके पीछे यह नजरिया है कि जानवरों के दूध पर उनके बच्चों का हक है और इस पर मनुष्यों का अधिकार नहीं है. यह नैतिक दृष्टि से एकदम सही है. यह भी सही है कि शाकाहार पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से बेहतर है. लेकिन लोगों की आदतों का भी सम्मान किया जाना चाहिए.

मेरे मित्र और गुरु डॉ असगर अली इंजीनियर मुझे बताते थे कि गांधीजी अपने मेहमानों को बिना झिझके मांसाहारी भोजन परोसने को तैयार रहते थे. जब उनसे अनुरोध किया गया कि वे गौवध पर प्रतिबंध लगवाना सुनिश्चित करें तब उन्होंने कहा कि यह खानपान की विभिन्न आदतों वाले लोगों का देश है और इसलिए ऐसा कानून बनाया जाना अन्यायपूर्ण होगा.

इस धारणा को जन-जन के मन में बिठाने का प्रयास किया जा रहा है कि मुसलमान मांसाहारी होने के कारण हिंसक प्रवृत्ति के होते हैं. साम्प्रदायिक शक्तियां इसमें काफी हद तक कामयाब रही हैं. सच यह है कि बहुत सारे हिंदू भी मांस-मछली खाते हैं. जहां तक हिंसक प्रवृत्तियों को मांसाहार से जोड़ने की बात है, यह दावा अत्यंत बेतुका है.

हम जानते हैं कि सबसे बड़ा नरसंहारी हिटलर 1933 से लेकर अपनी मौत तक पूर्णतः शाकाहारी रहा और नेल्सन मंडेला जैसे शांति के प्रबल पैरोकार निश्चित ही मांसाहारी रहे होंगे. चिकित्सा विज्ञान में हुए शोध एवं अनुसंधान में भी किसी व्यक्ति की खानपान की आदतों और उसकी मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया है.

सबसे खतरनाक विरूपण है प्राचीन काल में मांस का सेवन किए जाने को नकारना और यह प्रोपेगेंडा करना कि मुसलमान अपनी खानपान की आदतों की वजह से हिंसक प्रवृत्ति के होते हैं. (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)

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