Edited by mukesh Yadav
करीब 10 अरब डॉलर का झटका, सोने के भंडार में रिकॉर्ड गिरावट ने बढ़ाई चिंता
नई दिल्ली: भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट दर्ज की गई है। 12 जून को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 9.985 अरब डॉलर घटकर 671.625 अरब डॉलर रह गया। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह सोने के भंडार में 10.754 अरब डॉलर की भारी कमी रही, जिसने सरकार के आर्थिक प्रबंधन पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक सप्ताह पहले भी विदेशी मुद्रा भंडार 71.1 करोड़ डॉलर घटकर 681.610 अरब डॉलर पर आ गया था। लगातार दो सप्ताह की गिरावट यह संकेत देती है कि वैश्विक आर्थिक दबावों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है।
हालांकि राहत की बात यह रही कि फॉरेन करेंसी एसेट्स (FCA), जो कुल विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा है, 84.6 करोड़ डॉलर बढ़कर 544.290 अरब डॉलर हो गया। लेकिन यह बढ़ोतरी सोने के भंडार में आई भारी गिरावट की भरपाई नहीं कर सकी।
आरबीआई के अनुसार, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) भी 6.6 करोड़ डॉलर घटकर 18.699 अरब डॉलर रह गए, जबकि आईएमएफ में भारत की रिज़र्व पोजीशन 1.1 करोड़ डॉलर घटकर 4.815 अरब डॉलर पर आ गई।
शुल्क बढ़ाने के बावजूद नहीं रुका दबाव
विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को देखते हुए पिछले महीने केंद्र सरकार ने सोने और चांदी के आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत तथा प्लैटिनम पर 6.4 प्रतिशत से बढ़ाकर 15.4 प्रतिशत कर दिया था। सरकार का दावा था कि इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और कच्चे तेल, उर्वरक तथा महत्वपूर्ण तकनीकों के आयात को प्राथमिकता देने में मदद मिलेगी।
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी उस समय स्वीकार किया था कि मध्य-पूर्व का संकट भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ा रहा है।
लेकिन ताज़ा आंकड़े यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या आयात शुल्क बढ़ाने जैसी नीतियां वास्तव में प्रभावी साबित हुईं? यदि शुल्क वृद्धि के बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार लगातार घट रहा है, तो यह सरकार की आर्थिक रणनीति की सीमाओं को भी उजागर करता है।
आयात पर निर्भरता बनी सबसे बड़ी कमजोरी
भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और शिपिंग मार्ग अस्थिर हों, तब विदेशी मुद्रा पर दबाव और बढ़ जाता है।
स्थिति को और गंभीर बनाता है देश का लगातार बढ़ता व्यापार घाटा। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का व्यापार घाटा 333.2 अरब डॉलर रहा, यानी देश ने निर्यात की तुलना में कहीं अधिक आयात किया।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी में व्यापार घाटा बढ़कर 34.68 अरब डॉलर हो गया, जबकि दिसंबर में यह 25.05 अरब डॉलर था। जनवरी में आयात 19.2 प्रतिशत बढ़कर 71.24 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि निर्यात में केवल 0.6 प्रतिशत की मामूली वृद्धि हुई और वह 36.56 अरब डॉलर रहा।
ये आंकड़े बताते हैं कि भारत अभी भी आयात आधारित अर्थव्यवस्था की चुनौती से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाया है।
एक ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य अभी बहुत दूर
आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर Michael Debabrata Patra पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि भारत को वैश्विक वित्तीय झटकों से सुरक्षित रहने के लिए कम से कम एक ट्रिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार चाहिए।
उनके अनुसार, लगभग 350 अरब डॉलर अल्पकालिक विदेशी कर्ज चुकाने की सुरक्षा के लिए और 600 से 650 अरब डॉलर विदेशी निवेशकों की संभावित पूंजी निकासी से निपटने के लिए आवश्यक होंगे।
मौजूदा विदेशी मुद्रा भंडार 671.625 अरब डॉलर है, यानी भारत अभी भी एक ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य से लगभग 328 अरब डॉलर पीछे है।
नीतियों पर उठ रहे सवाल
विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक मजबूती का महत्वपूर्ण पैमाना माना जाता है। लगातार गिरता भंडार केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि निर्यात बढ़ाने, आयात पर निर्भरता घटाने और विदेशी मुद्रा अर्जित करने की मौजूदा रणनीतियों में अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है।
सरकार वैश्विक परिस्थितियों को इसकी प्रमुख वजह बता रही है, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बाहरी कारणों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाना, ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करना और विदेशी निवेश को अधिक स्थिर बनाना अब नीति-निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
(संपादकीय टिप्पणी: यह विश्लेषण उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों और सार्वजनिक बयानों के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें सरकार की नीतियों पर आलोचनात्मक प्रश्न उठाए गए हैं, लेकिन किसी निष्कर्षात्मक आरोप का दावा नहीं किया गया है।)
