सोनम वांगचुक की रिहाई लोकतंत्र की जीत

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Maroof Raza Senior Journalist

सोनम वांगचूक की रिहाई लद्दाख के संघर्ष और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटना है। उनकी रिहाई लद्दाख की आवाज़ और न्याय की जीत है।
मैं बात कर रहा हूं मशहूर पर्यावरण कार्यकर्ता, शिक्षा सुधारक और लद्दाख की बुलंद आवाज़ सोनम वांगचुक की , जिसने हिमालय की बर्फीली चोटियों से निकलकर पूरे देश के दिल में जगह बनाई। मैं बात कर रहा हूं ।

करीब 170 दिनों के लंबे इंतजार के बाद, केंद्र सरकार ने सोनम वांगचुक की हिरासत को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है। 14 मार्च 2026 को उन्हें जोधपुर जेल से रिहा कर दिया गया। यह रिहाई केवल एक व्यक्ति की आज़ादी नहीं है, बल्कि लद्दाख के उन हज़ारों लोगों की उम्मीदों की जीत है, जो अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मामला सितंबर 2025 का है। लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और संविधान की ‘छठी अनुसूची’ में शामिल करने की मांग को लेकर लेह में आंदोलन चल रहा था। इसी दौरान हिंसा भड़क उठी, जिसमें दुर्भाग्यवश चार लोगों की जान चली गई। प्रशासन ने सोनम वांगचुक पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाते हुए उन पर कड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगा दिया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

वांगचुक की रिहाई के पीछे एक लंबी कानूनी लड़ाई भी रही है। उनकी पत्नी, डॉ. गीतांजलि अंगमो, ने सुप्रीम कोर्ट में ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ (Habeas Corpus) याचिका दायर की थी। अदालत ने सरकार से वांगचुक के बयानों का सटीक अनुवाद मांगा और उनकी हिरासत पर सवाल उठाए।

आखिरकार, सरकार ने स्वीकार किया कि वांगचुक अपनी हिरासत अवधि का लगभग आधा समय पूरा कर चुके हैं और लद्दाख में शांति और संवाद का माहौल बनाने के लिए उन्हें रिहा करना ज़रूरी है।

वांगचुक की रिहाई का लद्दाख एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस ने स्वागत किया है। उन्होंने इसे एक बड़ी जीत बताया और कहा कि अब उनके आंदोलन पर लगा ‘देशद्रोही’ का टैग हट गया है। हालाँकि, लद्दाख की मांगें अभी भी जस की तस ही हैं।

सोनम वांगचुक की रिहाई हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र में संवाद ही सबसे बड़ा रास्ता है। क्या यह रिहाई लद्दाख की समस्याओं का स्थायी समाधान लाएगी? यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन आज लद्दाख की आवाज़ फिर से स्वतंत्र है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और जर्नलिस्ट यूनियन ऑफ़ दिल्ली के अध्यक्ष हैं

 

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