आरएसएस प्रमुख का घर वापसी अभियान तेज करने का आव्हान

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-राम पुनियानी

हमारे संविधान के मुताबिक देश के हर नागरिक को यह चुनने का सामाजिक एवं वैधानिक अधिकार है कि वह किस धर्म का पालन करे – या फिर किसी भी धर्म को न माने.  इसके बावजूद धर्म के सहारे राजनीति करने वाले संगठन इसे स्वीकार नहीं करते. आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत एक ओर तो कहते हैं कि सभी भारतवासी हिन्दू हैं. वहीं दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि हिन्दुओं की आबादी घट रही है क्योंकि बहुत से हिन्दुओं का धर्म बदलकर उन्हें मुसलमान और ईसाई बनाया जा रहा है. वे यह भी कहते हैं कि हिन्दू दंपत्तियों को कम से कम तीन बच्चे पैदा करना चाहिए क्योंकि हिन्दुओं की घटती जनसंख्या अत्यंत चिंताजनक है.

ये दोनों बातें विरोधाभासी हैं. एक ओर आप कहते हैं कि देश में रहने वाले सभी लोग हिंदू हैं. दूसरी ओर आप हिन्दू धर्म में घर वापसी का आव्हान भी करते हैं! हिन्दुत्व राजनीति से जुड़े कई लोग देकर कहते हैं कि भारत के सभी लोगों का डीएनए एक-दूसरे से मिलता-जुलता है. जहां तक जेनेटिक्स का सवाल है, उसका किसी के धर्म कोई संबंध नहीं हो सकता क्योंकि वैश्विक स्तर पर लोग एक जगह छोड़कर दूसरी जगह बसते रहे हैं. इसलिए अलग-अलग धर्मों के अनुयायियों के डीएनए में समानता हो सकती है. सिर्फ डीएनए में समानता के आधार पर अपने जन्म या स्वेच्छा से अपनाए गए धर्म को छोड़कर बहुसंख्यकों का धर्म ग्रहण करने के आव्हान या मांग को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता.

यह दावा करना एकदम गलत है कि भारत में इस्लाम तलवार की नोंक पर फैला क्योंकि भारत में सबसे पहली मुस्लिम बसाहट केरल के मालाबार तट पर कायम हुई थी. यह किसी राजा की तलवार की नोंक के जरिए नहीं हुआ था क्योंकि  18वीं सदी में टीपू सुल्तान के पहले तक किसी मुस्लिम राजा का शासन केरल में कायम नहीं हुआ था. भारत में पहली मस्जिद चेरमान जुमा मस्जिद 7वीं सदी में ही बन चुकी थी. बाद में संभवतः लालच या दबाव में कुछ धर्मपरिवर्तन हुए होंगे. किंतु धर्मपरिवर्तन कर इस्लाम ग्रहण करने की सबसे बड़ी वजह रही वर्ण व्यवस्था के कारण होने वाले अत्याचारों से छुटकारा पाने की इच्छा. ये धर्मपरिवर्तन राजाओं ने नहीं करवाए बल्कि सूफी संतों के मानवीय दृष्टिकोण से प्रभावित होकर हुए. जैसा कि स्वामी विवेकानंद बताते हैं इस्लाम भारत में नीची जाति के लोगों के लिए एक मुक्तिदाता की तरह आया. कुछ मामलों में युद्ध में विजय हासिल करने वाले मुस्लिम राजाओं ने हिन्दू राजाओं के सामने शर्त रखी कि अगर वे इस्लाम ग्रहण कर लें तो उन्हें बक्श दिया जायेगा. परंतु इस वजह से धर्मपरिवर्तन करने वालों की संख्या बहुत कम थी. यह कहना सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा कि धर्मपरिवर्तन करने से केवल लोगों की पूजा पद्धति बदली. मुसलमानों के अपने अलग पूजास्थल हैं, तीर्थस्थान है, पवित्र पुस्तकें हैं और पहचान है. मौजूदा हिन्दुत्व विचारकों का यह दावा, हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रणेता सावरकर के नजरिए के विपरीत है जिनका विचार था मुस्लिम एक अलग राष्ट्र हैं.

जहां तक ईसाई धर्म की बात है, वह भारत में सन् 52 में सेंट थामस के साथ आया जिन्होंने मालाबार तट पर चर्चों का निर्माण करवाया. सन् 2011 की जनगणना के अनुसार देश की कुल जनसंख्या में उनका प्रतिशत मात्र 2.30 था. वे दूरदराज के आदिवासी इलाकों में काम करते हैं, जिससे प्रभावित होकर आदिवासी ईसाई धर्म अपनाते हैं. लेकिन 2000 साल बाद भी उनका कुल जनसंख्या का 2.30 प्रतिशत हो पाने से ऐसा लगता है कि दबाव या लालच के जरिए धर्मपरिवर्तन नहीं हुआ है. ईसाई समुदाय का एक छोटा सा तबका ऐसा है जो स्वीकार करता है कि वह धर्मपरिवर्तन करवाना चाहता है लेकिन उनके प्रमुख संप्रदाय तब तक किसी का धर्मपरिवर्तन नहीं करवाते जब तक संबंधित व्यक्ति स्वेच्छा से ऐसा न करना चाहता हो.

भारत में साम्प्रदायिक राजनीति के जोर पकड़ने के साथ सबसे पहले आर्य समाज ने मुसलमानों को हिन्दू धर्म ग्रहण करवाने का काम किया. उन्होंने इसे शुद्धि का नाम दिया. लगभग उसी समय उत्तर भारत में तबलीगी जमात ने तंजीम (संगठन) और तबलीग (धर्मप्रचार) का काम शुरू किया. शुद्धि से संबंधित मान्यता यह थी कि जिन्होंने इस्लाम स्वीकार किया वे अशुद्ध हो गए हैं और उन्हें वापिस लाना और उनके शुद्धिकरण की धार्मिक क्रिया करना अनिवार्य है. तंजीम का मानना था कि कुछ मुसलमान इस्लाम के रीति-रिवाजों को भूल चुके हैं और उन्हें इसकी शिक्षा देना जरूरी है.

मौजूदा घरवापसी अभियान करीब चार दशक पहले मुख्यतः आदिवासी/ दलित इलाकों में शुरु किया गया था. आदिवासी इलाकों में हवन के साथ अन्य धार्मिक रस्में जैसे गरम पानी के झरनों में स्नान कराना आदि करवाई जाती थीं जिसके बाद यह घोषणा की जाती थी कि संबंधित व्यक्ति हिन्दू बन गया है. झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्रों में इसका उद्धेश्य था मुसलमानों का धर्मपरिवर्तन करवाकर उन्हें हिंदू बनाना. इसका एक उदाहरण आगरा के वेदनगर में 2014 में सामने आया. फुटपाथ पर रहने वाले करीब 350 मुसलमान, जिनमें से अधिकतर कचरा बीनने वाले और निराश्रित थे, को स्नान करके आने के लिए कहा गया. उनसे वायदा किया गया कि उन्हें बीपीएल और राशन कार्ड दिए जाएंगे. जब वे आए, तो उनसे हवन करवाया गया और फिर उन्हें हिन्दू घोषित कर दिया गया. इस कारगुजारी में बजरंग दल और हिन्दू जन जागृति समिति का हाथ था. ये दोनों संगठन आरएसएस से संबद्ध हैं. धर्मपरिवर्तन करवाने के लिए गरीब मुसलमानों और ईसाईयों को निशाना बनाया जाता है.

इसी दिशा में एक और कदम उठाते हुए कई राज्यों ने ‘धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम‘ बनाए हैं जो यह सुनिश्चित करते हैं कि लोग अपना धर्म स्वयं न चुन सकें. इनमें से कई अधिनियमों में प्रावधान है कि धर्मपरिवर्तन के लिए कलेक्टर की अनुमति अनिवार्य होगी. कई पास्टरों और पादरियों के साथ धर्मपरिवर्तन में लिप्त होने का आरोप लगाकर मारपीट की गई है. इस पिछले साल क्रिसमस की पूर्व संध्या पर फुटपाथ पर क्रिसमस से जुड़ी वस्तुएं बेच रहे छोटे दुकानदारों को धर्मपरिवर्तन करवाने का आरोप लगाते हुए मारा-पीटा गया. धर्मपरिवर्तन करवाने के आरोप में ही पास्टर स्टेन्स और उनके दो अवयस्क बेटों कों ओडिशा के क्योंझर में जिंदा जलाकर मौत के घाट उतार दिया गया था.

अब घरवापसी के मुद्दे पर दुबारा आते हैं. यह साम्प्रदायिक संगठनों एवं उनसे जुड़ी अन्य संस्थाओं का समाज को बांटने के खेल को पुनर्जीवित करने का प्रयास है. घरवापसी जोर-जबरदस्ती से करवाया जाने वाला धर्मपरिवर्तन है. जमीयत-उलेमा-ए हिन्द के मौलाना मदनी इस अभियान की सख्त भर्त्सना करते हुए कहते हैं कि वे मुसलमान हैं और मुसलमान ही रहेंगे. इसी तरह लव जिहाद संबंधी अभियान संचालित किया जा रहा है. इस मुद्दे पर केन्द्रित केरेला स्टोरी 2 के ट्रेलर से यह स्पष्ट है कि यह एक साम्प्रदायिक फिल्म है जिसका उद्धेश्य प्रोपेगेंडा है.

फिल्म बताती है कि मुस्लिम युवकों द्वारा हिन्दू लड़कियों को लुभाकर उनसे विवाह करने और धर्मपरिवर्तन करने का संगठित अभियान चल रहा है. केरल में पुलिस द्वारा इसकी जांच की गई और इसे झूठा पाया गया. ट्रेलर में इसे अत्यंत विकृत और घृणास्पद ढंग से दिखाया गया है. फिल्म का भोंडापन घृणास्पद है. पहले आई केरेला स्टोरी की तरह यह भी काल्पनिक आंकड़ों पर आधारित है, जो हकीकत से बहुत दूर हैं. हादिया (अकीला जिसने धर्मपरिवर्तन कर इस्लाम अपनाया था) के मामले से यह स्पष्ट है कि हिंदू लड़कियों को मुस्लिम युवकों द्वारा हिन्दू लड़कियों को जाल में फंसाने का आख्यान किस हद तक झूठा है. वास्तव में यह उसका अपनी मर्जी से लिया गया फैसला था.

यह फिल्म शक्तिशाली साम्प्रदायिक संगठनों की बांटने वाली राजनीति को और सशक्त बनाएगी और हमारे देश को एक अत्यंत अनुदार समाज बनने की दिशा में और आगे धकेल देगी जिसमें बंधुत्व के मूलभूत सिद्धांत के मर्म पर प्रहार होगा. घरवापसी के ये अभियान और ऐसी फिल्में भारतीय संविधान के मूल्यों और समन्वयवादी संस्कृति के भारतीय संस्कारों के एकदम विपरीत हैं जो भारत की भावनात्मक एकता का आधार था.(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)

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