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मदीना पहुँच कर आपने तीन बड़े काम किये

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कुंजी है इक़्तिदार की ताजिर के हाथ में


(क़ौमों का राजनीतिक भविष्य उनकी अर्थव्यवस्था पर निर्भर है)

कलीमुल हफ़ीज़ (समाज सुधारक एवं समाज सेवी )

कोरोना से सबसे ज़्यादा मुतास्सिर होनेवाला शोबा (डिपार्टमेंट) तिजारत और मईशत (Economy) का है। एक अनपढ़ ग़रीब मज़दूर से लेकर कारख़ानेदार और सरमायादार को जो बड़ा नुक़सान हुआ है वो माल का नुक़सान है। जान का नुक़सान इसके मुक़ाबले में Less है। मईशत के नुक़सान का एक पहलू ये भी है कि इसके असरात वक़्ती तौर पर नहीं बल्कि एक लम्बी मुद्दत तक बाक़ी रहने वाले हैं।

चूँकि ये बीमारी अभी ख़ुद ग़ैर-यक़ीनी सूरते-हाल में है। अभी ये कहना नामुमकिन है कि दुनिया अपने मामूल पर कब वापस आएगी। कोरोना ख़ुद एक पहेली है, इसके साथ साज़िशों का एक सिलसिला भी है। बड़ी ताक़तों के कुछ ख़ुफ़िया इरादे भी हैं। इस वक़्त कोरोना शतरंज का एक मोहरा है। दुनिया की सुपर पावर्स चालें चल रही हैं। शः और मात का खेल जारी है।

इन हालात में लॉक-डाउन भी ग़ैर-यक़ीनी सूरते-हाल से दो-चार रहेगा। तजज़िया करने वालों (विश्लेषकों) का ख़याल है कि कम से कम एक साल तक लॉक-डाउन के हालात बने रहेंगे। ऐसे में मुस्लिम उम्मत की हैसियत से हमें अपनी मईशत के लिये क्या स्ट्रेटेजी बनानी चाहिये। इस पर ग़ौर करने की ज़रूरत है।


मुआशी (आर्थिक) तौर पर अभी कुछ और नुक़सानात का अन्दाज़ा है। रुपये की क़ीमत कम हो रही है। डॉलर 90 रुपये तक जा सकता है। मुल्क से बाहर काम करनेवालों की एक बड़ी तादाद मुल्क वापसी करेगी। इस तरह मुल्क दोहरी मार झेलेगा। एक तो विदेशी विनिमय मुद्रा (FOREIGN EXCHANGE CURRENCY) में कमी आएगी, दूसरे वतन वापसी पर उन्हें रोज़गार देना होगा, जो पहले से ही बेरोज़गारी की मार झेल रहे मुल्क के लिये एक बड़ा चैलेंज होगा।

चीन, नेपाल और पाकिस्तान की सीमाओं पर झड़पें और ज़्यादा घाटे की वजह बनेंगी। बड़े शहरों से मज़दूरों और कामगारों की वतन-वापसी तेज़ी से जारी है। जिसका एक नुक़सान जहाँ ये होगा कि शहरों को उनकी कमी का एहसास होगा वहीं देहात और मक़ामी (स्थानीय) सतह पर रोज़गार के मसायल पैदा होंगे। ग़ैर-महफ़ूज़ वतन-वापसी बीमारी में बढ़ोतरी का कारण भी बन रही है। अब तक लॉक-डाउन में ग़रीब और बीच के तबक़े के पास जो जमा पूँजी थी वो ख़र्च हो चुकी है।

सरकारी राशन पर गुज़ारा नामुमकिन है। केन्द्र सरकार की ना-अहली जग-ज़ाहिर हो चुकी है। मज़दूर फ़ाक़ों से मर रहे हैं, ख़ुद-कुशी की घटनाएँ होने लगी हैं, मज़दूरों को लानेवाली ट्रेनें रास्ता भटक रही हैं, उनके लिये खाना तो दूर पीने का पानी तक नसीब नहीं है, और जो उनको खिला-पिला रहे हैं सरकार उन पर लॉक-डाउन की ख़िलाफ़वर्ज़ी के मुक़द्दिमे क़ायम कर रही है। सरकारें इन संगीन हालात में भी सियासत करने से बाज़ नहीं आ रही हैं। ज़ाहिर है इन हालात में हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा जा सकता। ख़ुद ज़िन्दा रहने और दूसरों की ज़िन्दगी बचाने के लिये कुछ तो करना ही होगा।


पैसा इन्सान की बुनियादी ज़रूरत है, दुनिया में पैसा कमाने के कुछ जाने-पहचाने ज़रिए हैं। कुछ लोग नौकरी करते हैं। कुछ लोग मज़दूरी करते हैं और एक बड़ी तादाद तिजारत करती है। तिजारत करने वालों की तादाद हमेशा ज़्यादा रही है। हदीस में है कि अल्लाह ने रोज़ी के दस हिस्से किये उनमें से नौ हिस्से तिजारत में रखे।

नबी (सल्ल०) की मुआशी और आर्थिक ज़िन्दगी की शुरूआत तिजारत से हुई। हिजरत के बाद मदीना पहुँच कर आपने तीन बड़े काम किये, मस्जिदे-नबवी की तामीर, अंसार और मुहाजिरीन में भाईचारा और मदीना मार्किट का क़ियाम। आपने तिजारत के उसूल तय किये। आप (सल्ल०) ख़ुद बाज़ार में जाते, चीज़ों और क़ीमतों की निगरानी करते। सहाबा (रज़ि०) में ज़्यादा तादाद ताजिरों की ही थी। अमानतदार ताजिर को प्यारे नबी (सल्ल०) ने हश्र के दिन अर्श के साये की ख़ुशख़बरी सुनाई है।


इन सब बातों को कहने का मेरा मक़सद ये है कि मुसलमान पैसा कमाने, कारोबार करने, बाज़ार में जाने को भी इबादत समझें। बदक़िस्मती से मुसलमानों में ऐसी राहिबाना तालीमात का प्रचार किया गया जिससे वो मार्किट से बाहर हो गए।

कोरोना और लॉक-डाउन में मईशत

कोरोना और लॉक-डाउन में मईशत (अर्थव्यवस्था) का ये पहलू भी हमारे सामने रहना चाहिये कि अब मईशत में कुछ तब्दीलियाँ आएँगी। इन्सान वो चीज़ें ख़रीदेगा जिनपर उसकी ज़िन्दगी का बाक़ी रहना डिपेंड करता है। मसलन वो दाल, चावल, मसाले, सब्ज़ियाँ लेगा, वो अपनी सेहत की ख़ातिर दवाएँ ख़रीदेगा।

जूते, कपड़े भी साल में एक बार ख़रीद सकता है। बिजली और पानी भी बुनियादी ज़रूरत है। उनको बहाल रखने की भी कोशिश करेगा। लेकिन चाट, मिठाइयाँ, आइसक्रीम, पिज़्ज़ा, चाऊमीन और बर्गर नहीं ख़रीदेगा। वो सैर-सपाटे को ताक़ पर रख देगा। यानी होटल और टूरिज़्म, एयरलाइंस और ट्रांसपोर्ट का कारोबार ज़्यादा मुतास्सिर होगा। खेल, खिलोने, तोहफ़े-तहायफ़, लक्ज़री चीज़ें जैसे AC, फ़्रिज, कूलर, टीवी, कार वग़ैरा सिर्फ़ दुकानों और शोरूमों की ज़ीनत बनकर रह जाएँगे।


सवाल ये है कि मईशत और तिजारत के लिये क्या किया जाए? इस बारे में सबसे पहले तिजारत यानी रिज़्क़े-हलाल की तलाश को इबादत समझा जाए। किसी काम को कमतर और ज़लील न समझा जाए। मुल्की क़ानून के साथ अख़लाक़ी इक़दार (नैतिक मूल्यों) का ख़याल रखा जाए, ज़िन्दगी के लिये जो बुनियादी और ज़रूरी चीज़ें हैं, जिनका इशारा ऊपर किया गया है, उनकी तिजारत की जाए, उन्हीं की मैनुफ़ेक्चरिंग, पैकेजिंग, ट्रांसपोर्ट, मरम्मत, होल-सेल, मार्केटिंग, सप्लाई वग़ैरा की जाए। एक चीज़ भी ग्राहक तक पहुँचने में कई मरहलों से गुज़रती है।

ये हमें ख़ुद तय करना होगा कि हमारी बस्ती, शहर या ज़िले को किन चीज़ों की ज़रूरत है? आटा, चावल, दालें, मसाले, घी, तेल, सर्फ़, साबुन, गैस, सब्ज़ी, फल, दूध, गोश्त, अंडा, मछली, पानी, दवाएँ, मास्क, सेनेटाइज़र, दस्ताने, तालीम, तामीर और खेती से मुताल्लिक़ चीज़ें, ये वो चीज़ें हैं जिनकी ज़रूरत हर बस्ती को है। इनके अलावा मोटर-मेकैनिक, इलेक्ट्रीशियन, राज-मिस्त्री, प्लंबर, बार्बर वग़ैरा को भी उतना काम मिल सकता है कि वो दो वक़्त की रोटी का इन्तिज़ाम कर सकें।

मीडिया और इंटरनेट से जुड़ी तमाम सेवाएँ और तिजारत जारी रहेगी। कपड़े, जूते, फ़र्नीचर या इलेक्ट्रॉनिक चीज़ें बनानेवाले कारख़ानेदारों के पास अगर सरमाया मौजूद हो तो वो इस दौरान मेनुफ़ेक्चरिंग कर सकते हैं ताकि मुनासिब वक़्त आने पर बेच सकें। खेती से जुड़े लोगों को भी नए तरीक़े तलाश करते रहने चाहिये, साइंसी तरक़्क़ी ने इस मैदान में इन्क़िलाब बरपा कर दिया है।
तिजारत में आजकल ऑनलाइन कारोबार बहुत जाना-पहचाना जाता है।

ज़िन्दगी का हर शोबा (डिपार्टमेंट) ऑनलाइन हो रहा है। लॉक-डाउन में हमने देखा कि एजुकेशनल इंस्टिट्यूट ऑनलाइन हो गए। डॉक्टर्स भी अपनी सेवाएँ ऑनलाइन दे रहे हैं। इसी तरह आप भी अपने प्रोडक्ट का कारोबार ऑनलाइन कर सकते हैं। इसके दर्जनों शोबे हैं। ऑनलाइन कारोबार बहुत आसान है। जिसे छोटे से छोटे गाँव में रहकर मोबाइल से भी किया जा सकता है।

हमारे पढ़े-लिखे नौजवान ज़रा सी मेहनत और कोशिश से ये काम करके पैसा कमा सकते हैं, जब पैसा कमाने की बात है तो इंटरनेट की दुनिया वहम व गुमान से भी बहुत बड़ी है। अर्टिफ़िशियल इंटेलिजेन्स एक नई टेक्नोलॉजी है जिसे अब स्कूल और कॉलेजेज़ में सब्जेक्ट के तौर पर पढ़ाया जा रहा है। इसको समझिये। इसके ज़रिए से कारोबार बहुत तरक़्क़ी कर सकता है।

ऑनलाइन कारोबार के आम होने का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि आज के दौर में कहा जाता है कि अगर आप इंटरनेट पर मौजूद नहीं हैं तो मानो आपका वुजूद ही नहीं है।


तिजारत और मईशत के सिलसिले में एक अहम् चीज़ सरमाया जुटाना है। इस बारे में मक़ामी सतह पर सेल्फ़ हेल्प ग्रुप बनाकर काम किया जा सकता है। जिसमें ज़रूरतमन्दों को बग़ैर ब्याज के पैसा दिया जा सकता है। कुछ कामों के लिये सरकार ने लोन स्कीम लागू की है। हम पैसेवाले लोगों से नफ़े में शिरकत की बुनियाद पर भी पैसा हासिल कर सकते हैं।

बहरहाल जब इरादे मज़बूत हों तो रास्ते निकल ही आते हैं। हमारे सरमायदारों और कारख़ानेदारों की ये ज़िम्मेदारी है कि इस नाज़ुक वक़्त में वो रोज़गार के मौक़े पैदा करें और हमारे काम करनेवालों की ज़िम्मेदारी है कि वो ज़्यादा वक़्त मेहनत से काम करें। हममें से हर शख़्स को इतना तो ज़रूर कमाना चाहिये कि सख़्त हालात आसानी से गुज़र जाएँ।

एक ताजिर हज़ारों लोगों को रोज़ी दे सकता है। इसलिये तिजारत का ज़ेहन बनाइये। तिजारत के गुर सीखिये। जो भी पैसा आपके पास है उसी से शुरू कीजिये। नए मौक़े और रास्ते तलाश कीजिये। एक-दूसरे की मदद और रहनुमाई कीजिये। बाज़ार में माल ढोनेवाले बनकर न रह जाइये बल्कि दुकानदार और सौदागर बनिये। ये बात याद रखिये जिसका क़ब्ज़ा बाज़ार पर होता है उसी के हाथों में सत्ता होती है।

कुंजी है इक़्तिदार की ताजिर के हाथ में !
अपनों को साथ ले के मईशत सँवारिए
!!

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One comment

  1. Well said…A sound economy will lead to prosperity and development.

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