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Love Jihad:”मुहब्बत से भी ख़तरा हो गया है”

Love Jihad:”मुहब्बत से भी ख़तरा हो गया है”

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लव-जिहाद के नाम पर बीजेपी सरकारें जनता की तवज्जोह असल मुद्दों से हटाना चाहती हैं

Kalimul Hafeez ,Writer, social activist and Educationist

प्यार किया कोई चोरी नहीं की’, ‘प्यार किया नहीं जाता हो जाता है’, ‘प्यार किया तो डरना क्या’ ये और इस तरह के गाने गुनगुनाना, प्यार की बातें करना जल्द ही देश के कुछ राज्यों में जुर्म और पाप में गिना जाने लगेगा। शीरीं-फ़रहाद और लैला-मजनूँ के क़िस्से सुनाना महँगा पड़ेगा। इसलिये कि देश के कुछ राज्यों में ‘लव-जिहाद’ के नाम से एक क़ानून बनाए जाने की तैयारी है। जिसके तहत प्यार करना ग़ैर-क़ानूनी हो जाएगा। देश के ये वे राज्य हैं जहाँ प्रेम का राग अलापने वाले और ‘वसुधेव कुटुंबकम’ का नारा लगाने वालों की सरकारें हैं। जो सबका साथ सबका विकास और सबके विश्वास के साथ सत्ता में आए थे। जो सारी दुनिया में अम्न और मुहब्बत का सन्देश देने की बात करते हैं। अगर यह क़ानून बनता है तो हमारा देश मुहब्बत पर पाबन्दी लगाने के मामले में इंटरनेशनल रिकॉर्ड क़ायम करेगा।


‘लव-जिहाद’ क्या है? इसकी हक़ीक़त क्या है? बीजेपी इसके ख़िलाफ़ क़ानून क्यों बनाना चाहती है? इससे जनता का क्या फ़ायदा होगा? ये वे सवालात हैं जो एक आम नागरिक के दिल में पैदा होते हैं। ‘लव’ का अर्थ है मुहब्बत और ‘जिहाद’ का अर्थ है कोशिश करना, जिद्दोजुहद करना, यहाँ तक कि जान की भी परवा न करना। लेकिन संघ की विचारधारा के अनुसार इसका अर्थ यह है कि ”मुस्लिम नौजवानों के ज़रिए मुहब्बत के नाम पर हिन्दू लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाना” इस नाम की कोई चीज़ ज़मीन पर नहीं पाई जाती। संघ का मामला यह है कि पहले एक चीज़ घड़ी जाती है, उसको हव्वा बनाया जाता है, फिर उसको इतना उछाला जाता है कि लोग उसे हक़ीक़त समझने लगते हैं।


‘लव-जिहाद’ में शब्द जिहाद भी बहुत अच्छा अर्थ रखता है। जिहाद दीने-इस्लाम की एक पवित्र इस्तिलाह (Terminology) है। जिसका अर्थ यह है कि इन्सान बुराइयों को ख़त्म करने और भलाइयों को फैलाने की जिद्दोजुहद और कोशिश करे। लेकिन जिहाद शब्द का इस्तेमाल करके सरकार चाहती है कि देश के नॉन-मुस्लिम यह जान लें कि यह काम मुसलमान कर रहे हैं, जिहाद का शब्द हिन्दुओं में डर पैदा करने के लिये इस्तेमाल किया जा रहा है।

अभी पिछले दिनों कुछ मुस्लिम नौजवानों के आई ए एस में सिलेक्शन को लेकर भी देश के एक टीवी चैनल ने “यूपीएससी-जिहाद” का शोशा छोड़कर यह डर पैदा किया था कि मुसलमान देश के ऊँचे पदों पर पहुँच कर देश के ख़िलाफ़ जिहाद करने वाले हैं। यह मुसलमानों के ख़िलाफ़ संघ की एक सोची-समझी साज़िश है। इसके ज़रिए वह अपने वोटरों के अन्दर मुसलमानों का डर पैदा करके पोलाराइज़ेशन की राजनीति कर रही है।

सरकार यह भी चाहती है कि ‘लव जिहाद’ के नारे के ज़रिए जनता की तवज्जोह असल मुद्दों और मसलों जैसे बेरोज़गारी, भुखमरी, जी डी पी की गिरती हालत, ख़ुदकुशी पर मजबूर किसान, देश की असुरक्षित सीमा आदि से हट जाए। बीजेपी के नज़दीक देश का सबसे बड़ा मुद्दा ‘लव जिहाद’ है। गोदी मीडिया इस काम में पूरी तरह साथ है। वह सारे दिन ‘लव जिहाद’ पर बकवास करता रहता है।

जनता की अधिकतर संख्या अपने दो वक़्त की रोटी के चक्कर में ऐसी फँसी है कि बेचारी सरकार के ख़िलाफ़ न सड़कों पर उतर सकती है, न प्रोटेस्ट कर सकती है। इसलिये कि अगर वह एक दिन भी काम न करे तो बच्चे भूख से मर जाएँगे। लीडरशिप कुछ सोच-समझकर ख़ामोश है, वह बोलेगी तो मुसलमानों की मुँह भराई का इल्ज़ाम आ जाएगा।


यह भी ग़ौर करने की बात है कि क्या इस नाम-निहाद लव-जिहाद की वकालत या हिमायत मुसलमान या उनकी कोई तन्ज़ीम करती है। मालूम होना चाहिये कि इस्लाम के नज़दीक सिर्फ़ शादी की नियत से धर्म-परिवर्तन करना कोई बहुत अच्छा काम नहीं है। नैतिकता के नज़रिये से देखें तो माँ-बाप, चाहे उनका ताल्लुक़ किसी भी धर्म से हो, वे दूसरे धर्म तो क्या अपनी जाति और ब्रादरी के बाहर भी रिश्ते और शादियों को पसन्द नहीं करते।

किसी समाज ने भी आज तक ऐसी शादियों को पसन्द की नज़रों से नहीं देखा। जब न कोई हिमायत करता है, न कोई पसन्द करता है और न कोई ऐसा संगठित अभियान चल रहा है, न ‘लव-जिहाद’ का वजूद ही है तो फिर देश को गुमराह करने की क्या ज़रूरत है? आख़िर कब तक जनता को मुसलमानों के ख़िलाफ़ क़ानून बना-बनाकर बहकाया जाता रहेगा।

कभी तलाक़, कभी हलाला, कभी मस्जिद और कभी कश्मीर के नाम पर वोट हासिल किये जाते रहेंगे? क्या अब पश्चिम बंगाल का चुनाव लव जिहाद के नाम पर लड़ा जाएगा?
क्या अपने धर्म से बाहर शादियाँ केवल मुसलमान कर रहे हैं? इस्लाम में तो इस तरह की शादी की इजाज़त ही नहीं जिसमें एक पक्ष ग़ैर-मुस्लिम हो। अलबत्ता देश का क़ानून ज़रूर इजाज़त देता है।

इसीलिये ऐसे लोग निकाह पढ़ने और फेरे फिरने के बजाय अदालतों में कोर्ट-मेरेज करते हैं। इस मामले में केवल हिन्दू लड़कियाँ ही मुसलमान लड़कों से शादी नहीं करतीं, बल्कि मुसलमान लड़कियां भी हिन्दू लड़कों के साथ अपना घर बसाती हैं। इसलिये कि देश का संविधान देश के नागरिकों को तमाम बुनियादी अधिकार देता है, जिसमें अपनी मर्ज़ी से शादी करने का हक़ भी शामिल है।

समझ में नहीं आता कि महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले और मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ से आज़ादी दिलाने वाले किस मुँह से महिलाओं पर अपनी पसन्द की शादी करने पर सज़ा की बात कर रहे हैं? क्या इस तरह का क़ानून बनाना महिलाओं की आज़ादी और अधिकार को छीन लेने के बराबर नहीं है?


वास्तव में मामला ‘लव जिहाद’ की आड़ में धर्म परिवर्तन पर पाबन्दी लगाने का है। नागरिकों से अपनी पसन्द के आस्था और धर्म का अधिकार छीन लेने का है और देश को मनु-स्मृति के अनुसार हिन्दू राष्ट्र बनाने का है। केंद्र सरकार धीरे-धीरे एक-एक क़दम इस दिशा में आगे बढ़ रही है। देश के मुखिया ने साईं का रूप धारण कर लिया है। पिछले सात साल में कितनी ही बार संवैधानिक पदों पर बैठे ज़िम्मेदारों की तरफ़ से भारत को हिन्दू राष्ट्र कहा जा चुका है। राम मन्दिर के शिला न्यास कार्यक्रम के समय भी यही उद्घोष किया गया था।


सवाल यह है कि इन मसलों का हल क्या है? आर एस एस और उसके सहयोगी संगठन और बीजेपी सरकारें अपने एजेंडे (हिन्दू राष्ट्र) की तरफ़ बढ़ रहे हैं। इनसे इसे छोड़ देने की माँग करना या संविधान की दुहाई देना भैंस के आगे बीन बजाने के बराबर है। उन्होंने तो हर मामले में तय कर रखा है कि जो उनकी बात नहीं मानेगा उसका राम नाम सत्य कर दिया जाएगा।

ये मैं नहीं कह रहा हूँ, अगर आपको याद हो तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों ‘लव जिहाद’ पर नौजवान जोड़ों को धमकी देते हुए कहा था कि अगर ये नहीं मानेंगे तो लव जिहादियों का ‘राम नाम सत्य’ कर दिया जाएगा। ज़ाहिर है इस बू-जहली रवैये का मुक़ाबला शरीफ़ाना तौर तरीक़े से नहीं किया जा सकता।

अलबत्ता इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ये कहकर कि जीवन साथी का चुनाव व्यक्ति की आज़ादी और उसकी मर्ज़ी पर निर्भर करता है, इस पर किसी तरह की क़ानूनी पाबंदी लगाने के ख़िलाफ़ अपना इशारा दे दिया है लेकिन फासीवादी सोच से इस की उम्मीद नहीं है कि वो अदालतों के इशारे समझेंगे।


इसलिए देश के उस वर्ग की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है जो ख़ुद को सेक्युलर समझता है, कि वह कोई ठोस क़दम उठाए। मुसलमानों से मैं बस इतनी ही गुज़ारिश करूँगा कि वे सब्र के साथ देश के संविधान की पाबन्दी करें, मुस्लिम नौजवान बेटे-बेटियाँ अपने पाक दामन की हिफ़ाज़त करें और ख़ुदा के उस हुक्म को याद रखें कि “एक मोमिन ग़ुलाम आज़ाद मुशरिक से बेहतर है भले ही वह तुम्हें पसन्द हो।” (अल-बक़रा-221)

लगेंगी बेड़ियाँ अब आशिक़ी को।
मुहब्बत से भी ख़तरा हो गया है॥

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