क्या दुनिया में सिर्फ नफ़रत की सियासत चलेगी?

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क्या दुनिया में सिर्फ नफ़रत की सियासत चलेगी?

उनका जो काम है अहल ए सियासत जाने
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुंचे

क्या कैराना की हार बीजेपी के लिए ख़तरे की घंटी?

Ali Aadil Khan

2019 के लोकसभा चुनाव में एक साल से भी कम वक़्त बचा है और सत्ताधारी बीजेपी को हाल के लगभग सभी उपचुनावों में हार का सामना करना पड़ा है.

हाल में देश की 4 लोकसभा और 10 विधान सभा व कुल 14सीटों पर उपचुनाव में बीजेपी की हार को 2019 के चुनाव से जोड़ कर देखा जाना स्वाभाविक है किन्तु बीजेपी BJP के पास अभी कई पत्ते खोलने बाक़ी हैं जो आखरी समय में फेके जासकते हैं , जिनमें बाबरी मस्जिद राम जन्म भूमि विवाद सबसे एहम है .

हालांकि ये हार बीजेपी को परेशान करने वाली ज़रूर हैं खासतौर पर UP की कैराना लोकसभा और नूरपुर विधान सभा सीट जिसपर मुख्यमंत्री योगी और प्रधानमंत्री मोदी ने खुद रैलियां और रोड शोज किये थे , जिसमें इन दोनों की साख दाव पर लगी थी . ऐसे में सवाल उठने लगा है कि क्या भारत की चुनावी राजनीति में भारतीय जनता पार्टी और मोदी के प्रभुत्व के दिन लदने वाले हैं?

क्या बीजेपी विपक्ष की एकजुटता की कोई काट निकाल पाएगी?
इसके साथ ही अलग-अलग राज्यों में कुल 10 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में केवल उत्तराखंड की थराली सीट पर बीजेपी को जीत मिली है. इस उपचुनाव में विपक्ष को सबसे बड़ी जीत उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट पर मिली है. इस सीट से राष्ट्रीय लोकदल की उम्मीदवार तबस्सुम हसन को सभी विपक्षी पार्टियों का समर्थन हासिल था.

2 माह पूर्व उत्तर प्रदेश के ही गोरखपुर और फूलपुर में बीजेपी की करारी हार के बाद कैराना में बीजेपी की ताज़ा हार जनता के रुख को साफ़ करने के लिए काफी होसकता है , हालाँकि इससे विपक्ष और ख़ास तौर से कांग्रेस को बहुत ज़्यादा खुश होने की ज़रूरत नहीं है .याद रहे गोरखपुर, फूलपुर और कैराना तीनों सीटों पर 2014 के आम चुनाव में बीजेपी का क़ब्ज़ा हुआ था .

पश्चिम उत्तर प्रदेश में स्थित मुज़फ्फर नगर , कैराना 2013 में सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में आया था जिसके बाद धार्मिक ध्रुवीकरण हुआ था. यह ध्रुवीकरण 2014 के आम चुनाव में बीजेपी के खूब काम आया ,और इस बार उपचुनाव में भी इसको मुख्यमंत्री योगी द्वारा हिन्दू मुस्लिम बनाने की पूरी कोशिश की गयी थी जो लोकतान्त्रिक तथा मुख्यमंत्री पद के एकदम विपरीत था ,मगर यही तरीक़ा भाता है बीजेपी को देश पर सत्ता क़ब्ज़ाने के लिए , हालांकि सत्ता पर बने रहने के लिए साम्प्रदायिकता फैलाने का यही इलज़ाम कांग्रेस पर भी लगता रहा है ,जो सच भी साबित होता है,

इसमें एक बात में और जोड़ देता हूँ की कांग्रेस ने आम तौर पर शिक्षा के फ़रोग़ के लिए बेहतर योजनाएं नहीं बनाईं जिससे अल्पसंख्यक हुए पिछड़ा ,दलित और आदिवासी समाज मुख्यधारा का हिस्सा बन सकता , क्योंकि देश की अनपढ़ जनता को मूर्ख बनाना ज़्यादा आसान है जो आजतक चला आरहा है .

किन्तु इसमें एक सच्चाई यह है की कांग्रेस ने संविधान से कोई छेड़ छड़ नहीं की जबकि कांग्रेस के PM नर्सिंगहाराओ पर संविधान की धज्जियाँ उड़ाने का इलज़ाम बदस्तूर है , और यह भी आम है की वो कांग्रेस को कमज़ोर करने के लिए आये थे और करगए जिसका ख़मयाज़ा आजतक कांग्रेस भुकत रही है और देश का अल्पसंख्यक अभी तक बाबरी मस्जिद की शहादत को नहीं भुला पाया है . भले मुसलमान नमाज़ जैसे फ़रीज़े को छोड़कर रोज़ाना पूरे दीन को ढा रहा .

बीच में ज़रा एक नज़र डालें शपथ के वाक्यों पर

“मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण रखूँगा, मैं मंत्री या मुख्यमंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वाहन करूँगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा।’ क्या ऐसा देश के मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री भी इस शपथ का पालन कर रहे हैं ? आप ही इन्साफ से बताएं …

झारखंड में बीजेपी सत्ता में है और वहां भी विधानसभा की दो सीटों पर हुए उपचुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्च को जीत मिली है. बिहार में भी जेडीयू और बीजेपी गठबंधन को जोकीहट विधानसभा सीट के उपचुनाव में राष्ट्रीय जनता दल से हार गयी है .

कैराना लोकसभा सीट पर बीजेपी की हार के बारे में आम राये है कि यह सांप्रदायिकता और धुर्वीकरण की हार है और एक बार फिर से जाट और मुसलमान राजनीतिक रूप से साथ आ गए हैं.

आरएलडी नेता जयंत चौधरी ने इस जीत के बाद कहा कि बीजेपी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से जिन्ना विवाद खड़ा कर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश की थी, लेकिन किसानों को यह बात समझ में आ गई थी कि जिन्ना से नहीं बल्कि उन्हें गन्ना से फ़ायदा होना है और किसानों ने जिन्ना जैसे नक़ली मुद्दे का साथ न देकर किसानो के बुनयादी मुद्दे को सामने रखकर वोट किया , और हमारा किसान आइंदा भी यही strategy रखेगा.

वहीं, बीजेपी प्रमुख अमित शाह का कहना था कि उपचुनाव प्रधानमंत्री की कुर्सी तय नहीं करता है इसलिए इसके नतीजे को किसी संकेत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.जबकि भीतरी तौर पर साँसे अमित शाह की भी रुकी हुयी हैं .

हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षक इस बात को मानते हैं कि इन नतीजों से बीजेपी की मुश्किलें बढ़ गई है कि जाट और मुसलमान साथ आ गए तो उनका पूरा खेल बिगड़ जाएगा.

बीजेपी इस बात को पूरी तरह से समझती होगी कि उत्तर प्रदेश में दलित 21.2 फ़ीसदी हैं और मुसलमान 19.8 फ़ीसदी. इनके साथ जाट या किसान भी आ गए तो उत्तर प्रदेश ही नहीं देश में बीजेपी के वोटों का अंकगणित बदल जाएगा.

इसलिए बीजेपी के साथ अमित शाह जैसे शातिर और संघ जैसी Organised संस्था 2019 के लिए किसी भी जाइज़ या नाजाइज़ कोशिशों और योजना को बनाने में पीछे नहीं रहेगी चाहे इसके लिए देश व् इंसानियत तथा देश की गंगा जमनी संस्कृति का कितना ही बड़ा नुकसान क्यों न होजाये. क्योंकि सत्ता के लिए और इश्क़ में सब कुछ जाइज़ ठहरा लिया जाता है जो सिरे से ग़लत है .

कैराना में चुनाव से प्रधानमंत्री मोदी ने बागपत में चुनावी रैली की तरह ही एक जनसभा को संबोधित किया था, लेकिन इसका भी कोई असर चुनाव पर नहीं हुआ. साथ ही दिल्ली मेरठ अधूरे एक्सप्रेसवे का जल्द बाज़ी और चुनाव के मद्दे नज़र उदघाटन भी जनता को नहीं भाया .जिसपर First Post का कार्टून बहुत ही सटीक लगा हम इसको साभार पब्लिश करने का प्रयास करेंगे .

हमारे पाठकों को याद होगा अमित शाह ने एक चैनल को दिए इंटरव्यू में दावा किया था कि उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी 50 फ़ीसदी वोट हासिल करेगी .हालाँकि इस बार उनका वोट प्रतिशत घटकर 46 .4 % रहगया. झारखंड बीजेपी के मुख्यमंत्री रघुवरदास के लिए दोनों सीटों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा से हारना भी बड़ा झटका है.

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद जितने उपचुनाव हुए सबमें बीजेपी को हार मिली है. कई राजनीतिक विश्लेषक इस बात को मानते हैं कि अगर 2019 के लोकसभा में भी विपक्ष एकजुट रहा तो बीजेपी को 2014 के आम चुनाव के उलट नतीजे देखने को मिल सकते हैं. उपचुनाव के नतीजों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में आई कमी के तौर पर भी देखा जा रहा है.महाराष्ट्र के पालघर और बंडारा-गोंडिया में भी बीजेपी के वोट शेयर में 9 फ़ीसदी की गिरावट आई है.

समय कैसे खेल बदलता है एक वक़्त था जब 1960 और 70 के दशक में कांग्रेस को रोकने के लिए समाजवादी और जनसंघ एक ही मंच पर आए थे और आज बीजेपी को रोकने के लिए कांग्रेस और समाजवादी एक मंच पर हैं.
2019 के आम चुनाव से पहले उपचुनावों में विपक्ष संयुक्त मोर्चा रणनीति भले सफल दिख रही है. मगर चुनाव आते आते बीजेपी इस रणनीति को किस तरह काटती है देखना बाक़ी है .

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