बिहार चुनाव 2020: तीन दशक बाद, 3 राजनीतिक स्तंभ नहीं दिखाई देंगे !

देवेंद्र यादव कोटा राजस्थान

इसे विधि का विधान कहें या राजनीतिक त्रासदी या फिर बिहार राजनीति का दुर्भाग्य !

3 दशक बाद पहली बार एक साथ, बिहार विधानसभा के संपन्न होने वाले चुनाव में बिहार की राजनीति की दिशा और दशा तीन दशक पहले बदलने वाले तीन प्रमुख राजनीति के स्तंभ प्रचार में नजर नहीं आएंगे !

इसे बिहार और देश की राजनीतिक त्रासदी कहें या विधि का विधान रामविलास पासवान और रघुवंश प्रसाद की मृत्यु बिहार विधानसभा के चुनाव के एलान के बाद अचानक से हो गई !

लालू प्रसाद यादव जेल में है उन्हें जमानत तो मिली मगर वह जेल से रिहा नहीं हो पाएंगे क्योंकि उन्हें दूसरे केस में जमानत नहीं मिली !

तीन दशक पहले, बिहार की राजनीति को बदलने वाले प्रमुख नेताओं में रामविलास पासवान , रघुवंश प्रसाद और लालू प्रसाद यादव मजबूत स्तंभ थे !

रामविलास पासवान और रघुवंश प्रसाद की मृत्यु और लालू के जेल में होने के बाद राजनीतिक विश्लेषक बिहार के चुनाव में तीनों नेताओं को लेकर नफा और नुकसान पर चर्चा करने लगे है !


राजनीतिक पंडितों के द्वारा की जा रही चर्चा पर बात करें इससे पहले इस पर भी बात कर ले की रामविलास पासवान और लालू प्रसाद यादव ने अपने अपने पुत्रों को बिहार की राजनीति में एक दशक पहले ही उतार दिया था रामविलास पासवान के पुत्र चिराग पासवान बिहार में दूसरी बात सांसद हैं वही तेजस्वी यादव विधायक हैं और यह दोनों ही युवा नेता अपनी अपनी पार्टियों की कमान संभाले हुए हैं !

चिराग पासवान एलजेपी और तेजस्वी यादव आरजेडी, की कमान अपने हाथों में लेकर बिहार विधानसभा चुनावों के लिए लंबे समय से रणनीति बनाने और तैयार करने में जुटे हुए थे, मौजूदा विधानसभा चुनाव में दोनों ही युवा नेताओं के पास मजबूत चेहरा नहीं है यह अनुमान लगाना कहां तक सत्य है लेकिन यह सत्य है कि स्वर्गीय राम विलास पासवान ने अपने जीते जी चिराग पासवान को बिहार की राजनीति में मजबूत युवा नेता के रूप में स्थापित किया और दुनिया से अलविदा हो गए !

लालू प्रसाद यादव का शरीर भले ही जेल में है लेकिन उनका मन बिहार विधानसभा चुनाव में है , तेजस्वी यादव भी बिहार की राजनीति में एक स्थापित मजबूत युवा नेता हैं ! चिराग पासवान और तेजस्वी यादव के लिए बिहार विधानसभा चुनाव चुनौती भी है और परीक्षा भी !

जहां तक लालू प्रसाद यादव की अनुपस्थिति को लेकर विश्लेषक राजनीतिक नफा नुकसान का अनुमान लगा रहे हैं और सत्ताधारी जेडीयू और भाजपा लालू की कमी को लेकर खुश हो रहे हैं, तो बिहार के चुनावों पर लालू को लेकर विश्लेषण करने वाले विश्लेषकों को यह भी नहीं भूलना चाहिए की 2015 के विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी पार्टी जेडीयू ने बिहार में अपनी साख लालू प्रसाद यादव का सहारा लेकर ही बचाई थी !

2015 के विधानसभा चुनाव में सर्वाधिक सीट लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी को मिली थी लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने थे बाद में नीतीश कुमार ने लालू का साथ छोड़ दिया और भाजपा का दामन पकड़ लिया अब नीतीश बाबू भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं और दुहाई दे रहे हैं सुशासन की , बुराई कर रहे हैं लालू के कुशासन की,!

क्या लालू का कुशासन 2015 में नहीं था जब जेडीयू ,आरजेडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही थी क्या यह आरजेडी से अलग होने के बाद लालू का कुशासन अब याद आ रहा है, !
चिराग पासवान और तेजस्वी यादव के सामने चुनौती बड़ी है और परीक्षा की घड़ी नजदीक है देखना यह होगा कि यह दोनों नेता एक बार फिर से बिहार की राजनीति में इतिहास लिख पाते हैं या नहीं क्योंकि देश की नजर बिहार में नया राजनीतिक समीकरण और इतिहास लिखे जाने पर टिकी हुई है !

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