सोमनाथ: इतिहास या सियासी मंच?

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Ali Aadil khan
Ali Aadil Khan Editor’s Desk

धार्मिक स्थल कोई भी हो, या किसी भी मज़हब का खुदा हो उसको बुरा कहना इस्लाम के धार्मिक ग्रंथ में असहनीय है और अपराध भी. लेकिन आज जब दुनिया के देश टेक्नोलॉजी और साइंस के माध्यम से अपने नागरिकों के भविष्य को संवारने में व्यस्त हैं. ऐसे में भारत की सत्ताधारी पार्टी की राजनितिक धुरी अतीत की उन धार्मिक घटनाओं में जनता को उलझाने में मग्न है जिसका परिणाम अलगाव, नफरत और खंडित समाज के सिवा कुछ भी नहीं.

सोमनाथ के 75 साल पूरे होने पर एक बार फिर इतिहास, राजनीति और प्रतीकों का वही पुराना मंच सजाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात में सोमनाथ की अस्मिता नामी प्रोजेक्ट पर आधारित कार्यक्रम के दौरान कहा कि “आक्रमणकारी इतिहास की धूल में मिल गए, लेकिन भारत की आत्मा आज भी जीवित है।

उन्होंने कहा कि दुनिया की कोई ताकत भारत को झुका नहीं सकती और न ही किसी दबाव में ला सकती है.” सुनने में भाषण जितना जोशीला लगता है, वर्तमान देश के हालात में इस तरह के ब्यान उतने ही हास्यास्पद और मज़ाक़ दिखाई देते हैं।

सोमनाथ मंदिर पर हमलों की कहानी अक्सर भावनात्मक अंदाज़ में सुनाई जाती है, लेकिन इस पूरे अध्याय में सबसे दिलचस्प किरदार शायद अंग्रेज निभा गए, जिन्होंने 1842 में अचानक खुद को “हिंदुओं की आस्था और इज्जत के रक्षक” घोषित कर दिया। वही अंग्रेज, जो भारत को लूट रहे थे और भारतियों पर ज़ुल्म करके राज कर रहे थे. अंग्रेज़ गवर्नर लार्ड एलनबरो ने दावा किया कि वे अफगानिस्तान से सोमनाथ का “लूटा हुआ दरवाजा” वापस लाये और भारत के 800 साल पुराने अपमान का बदला चुका दिया गया है।

ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड एलनबरो ने बड़े गर्व से ऐलान किया कि अंग्रेजों ने हिंदुओं की प्रतिष्ठा बहाल कर दी। लेकिन बाद में जो सच निकला, उसने इस पूरी कहानी को साम्राज्यवादी ड्रामे में बदल दिया।

जिस दरवाजे को “सोमनाथ का गौरव” बताकर ढोल पीटे गए, वह असल में अफ़ग़निस्ता के शहर गजनी में बना साधारण देवदार की लकड़ी का सरवाज़ा निकला . दरवाज़े की न लकड़ी चंदन, न गुजराती शैली, न कोई ऐतिहासिक छाप । यानी अंग्रेजों ने राजनीतिक सहानुभूति बटोरने के लिए इतिहास को पैकेजिंग करके परोसा, और कुछ समय तक यह चाल चल भी गई।

विडंबना देखिए जिस अँगरेज़ साम्राज्य्वादी सरकार ने हिन्दुस्तानियों को गुलाम बनाया और शोषण का राज किया, मगर infrastructure पर पूरा ध्यान दिया वही खुद को “हिंदू अस्मिता का बदला लेने वाला” बताते रहे। और आज, डेढ़ सौ साल बाद फिर परास्त और हार के इतिहास के इन्हीं प्रतीकों को फिर से चमका कर राजनीति की नई पॉलिश चढ़ाई जा रही है।

यानी जनता में मुग़लों और अफ़ग़ान आक्रांताओं का भय पैदा करके नासमझ नागरिकों को बताया जा रहा है की देखो अब हिन्दू सम्राट है तुम सब को कोई किसी आक्रांता से डरने की ज़रूरत नहीं है , हालांकि रोज़ हिन्दू खतरे में है का नारा देकर चुनाव में जीत हासिल की जाती है. अफ़्सोसोकि बात यह है के जनता आज भी लुटेरों और कायरों को अधिनायक बनाये बैठी है.

सवाल यह है कि क्या इतिहास केवल घाव कुरेदने के लिए याद किया जाएगा? या फिर यह भी याद रखा जाएगा कि सत्ता चाहे अंग्रेजों की हो या आधुनिक नेताओं की — इतिहास का इस्तेमाल भावनाओं को भड़काने और समर्थन जुटाने के लिए हमेशा से सबसे आसान हथियार रहा है. और यह वर्तमान सरकार में बैठे राजनितिक ठेकेदारों ने अच्छे से समझ लिया है, लेकिन जनता जब तक जाग पाएगी तब तक काफी बर्बादी हो जाने की संभावनाएं बताई जा रही हैं.

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