
उत्तर प्रदेश का शहर बरैली पिछले कई बरसों से सुर्ख़ियों में है. ताज़ा मामला गायों को भूसा दान करने की ज़िम्मेदारी का आया है. बरेली के नवाबगंज ब्लॉक के Block Education Officer ने 22 मई को एक नोटिस जारी कर सभी स्कूलों को प्रति स्कूल 46 किलो,,, दान का भूसा इकठ्ठा करने का लिखित आदेश जारी जारी करके शिक्षक वर्ग में बेचैनी पैदा कर दी थी.
इस आदेश में कहा गया था, “इस काम को एक सप्ताह के अंदर पूरा किया जाना है, ढील करने वालों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की जाएगी.”
स्कूलों को जारी किए गए इस आदेश में कहा गया था, “आप सभी को निर्देशित किया जाता है कि 46 किलोग्राम भूसा यानी गायों का चारा या खुराक प्रति विद्यालय भूसा का दान खंड विकास अधिकारी नवाबगंज या पशु चिकित्सा अधिकारी नवाबगंज के कार्यालय में देना सुनिश्चित करें और दान की रसीद प्राप्त करें.”
उसूलन तो यह ज़िम्मेदारी गोरक्षकों और बजरंग दल के जिला लेवल नेताओं को दी जानी चाहिए थी, क्योंकि गोवंश की तमाम तरह की सुरक्षा का ठेका तो उन्ही के पास है और इसके लिए उनको किसी इंसान की जान तक लेने का मानो अधिकार भी दे दिया गया है.
लेकिन जैसे ही शिक्षकों को सरकारी आदेश की जानकारी मिली तुरंत शिक्षक संगठन Active हो गए और बरेली की ज़िला बेसिक शिक्षा अधिकारी डॉ. नमिता से संपर्क साधा गया .
बेसिक शिक्षा अधिकारी ने मौके की नज़ाकत को समझते हुए और विवाद के बढ़ जाने की वजह से इसके खतरे को भांपते हुए आदेश को वापस ले लिया और आदेश जारी करने वाले अधिकारी पर जांच बिठाने की बात कही .
बरेली की बेसिक शिक्षा अधिकारी डॉ. नमिता ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “ये आदेश नासमझी में जारी किया गया है और संबंधित अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया है.
” डॉ अनीता का कहना है, कि यह आदेश क्यों जारी किया गया इसका पता लगाने के लिए विभागीय जांच भी की जाएगी. अब आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि बहुत से आदेश नासमझी में भी जारी किये जाते हैं या किये जा सकते हैं. इस प्रकार के सरकारी आदेशों से आपको यह समझ लेना चाहिए कि अब Block Level अधिकारी भी ज़िला अधिकारी की Permision के बिना कोई भी आदेश कभी भी जारी कर सकते हैं.
यूनाइटेड टीचर्स एसोसिएशन बरेली के ज़िलाध्यक्ष भानु प्रताप सिंह ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “भूसा इकठ्ठा करने का आदेश अव्यवहारिक यानी Impractical और गुरु की गरिमा के ख़िलाफ़ है.” उन्होंने कहा, “आज हमसे भूसा इकट्ठा करने के लिए कहा जा रहा है, कल कोई आदेश आएगा कि गोबर इकट्ठा करो.
बरेली के ही एक और शिक्षक वीरेंद्र कुमार ने इस आदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा,, “शिक्षकों को मज़ाक का विषय बनाकर रख दिया गया है, अगर शिक्षक हाथ में झोला लेकर भूसा इकट्ठा करेगा तो उसकी क्या गरिमा रह जाएगी?”
शिक्षक संघ के बड़े पैमाने पर विरोध करने का अल्टीमेटम दिए जाने के बाद जिला प्रशासन एक्टिव हो गया और तुरंत इस सरकारी आदेश को वापस लेलिया गया. लेकिन पूरी तरह इस आदेश को वापस नहीं लिया गया इसमें कुछ संशोधन करके दूसरा ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया और इसमें बेसहारा गौवंश के भरण पोषण हेतु दान का भूसा इकठ्ठा करने को स्वैच्छिक कर दिया गया.
लेकिन अगर यह आदेश ही रखना है तो फिर स्वेच्छा कैसी ? और आदेश में स्वेच्छा या मर्ज़ी तो नहीं चलती. अब ज़रा सरकार कि विरोधाभासी योजनाओं पर एक नज़र डालें आपको पता है देश में शिक्षकों के लिए TET Compulsory वाले सरकारी आदेश के खिलाफ teachers associations का विरोध प्रदर्शन देखने को मिला ,
हालिया Supreme Court ने सख्त आदेश देते हुए कहा है की Teachers को TET तो qualify करना ही होगा , SC ने कहा बिना योग्यता वाले Teachers अगर स्कूलों में रहे तो इसका बुरा असर आने वाली नस्लों पर ही पड़ेगा . यह बात 100 % सही है लेकिन अगर शिक्षकों से गायों के लिए भूसा इकठ्ठा करने का काम दिया जाएगा तो नस्लों पर केसा असर पड़ेगा ?
दुसरे जब schools में Teachers ही बच्चों के साथ धर्म और जाती के आधार पर पक्षपात करेंगे, जाती या धर्मसूचक जुमलों से पुकारेंगे या स्टूडेंट्स और उनके Parents को धर्म और जाती देखकर प्रताणित करेंगे तो देश का भविष्य कैसा होगा ? इसपर सुप्रीम कोर्ट कब संज्ञान लेगा?
कलकत्ता में गोवंश की क़ुर्बानी पर सरकारी पाबंदी, और १४ वर्ष से ऊपर के गोवंश को खाने की इजाज़त दिए जाने के आदेश के बाद हिन्दू किसानो का सरकारी आदेश का विरोध हो रहा है.
दिल्ली IIT जैसे संस्थानों में गाये के मूत्र और गोबर पर शोध के लिए Programme आयोजित किये जाना हास्यास्पद बताया जा रहा है. दूसरी तरफ अब देशभर में मुस्लिम समाज और धार्मिक रहनुमाओं की तरफ से गाये को राष्ट्रीय पशु घोषित किये जाने की मांग ने इस मुद्दे को और भी गंभीर बना दिया है .
गोमांस का कारोबार करने वाली ज़्यादातर बड़ी कम्पनियाँ गैर मुस्लिमों द्वारा चलाई जा रही हैं. और करोड़ों रुपयों का दान PM Releaf fund में दे रही हैं इस सबका पर्दाफ़ाश पहले ही हो चूका है.
पिछले वर्ष अलीगढ में गोश्त व्यापारियों पर गोरक्षकों द्वारा किये गए हमले के बाद घायलों का हाल जान्ने के लिए अलीगढ मेडिकल में दिल्ली से पहुंची मिशन फ्यूचर फाउंडेशन की टीम और इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर के उपाध्यक्ष के अलावा कई मुस्लिम संस्थाओं ने मीट मुक्त भारत की सरकार से मांग रखी थी. और हर तरह के गोश्त को देश में बैन करने की अपील की गई थी. यानी मीट मुक्त भारत की मांग राखी गई थी.
गोकशी के नाम पर इसको धार्मिक मुद्दा बनाकर एक ख़ास समुदाय को परेशान किया जाता है. इसी लिए इस समुदाय की तरफ से गाये को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग बार बार उठ रही है. इस गंभीर विषय पर सरकारी निर्णेय के बाद तय हो जाएगा कि सरकार गाय को माता की नज़र से देखती है या सियासी लाभ के चश्मे से.
और आजकी राजनीति में मुद्दे वोट धुर्वीकरण और सत्ता हथियाने के लिए तैयार किये जाते हैं ….और वर्तमान में सत्ताधारी पार्टी कि राजनीती बस इन्ही मुद्दों के आसरे टिकी है. मगर यह सोच देश के अमन , शान्ति और विकास में बड़ी रुकावट का सबब है साथ ही लोकतंत्र , संविधान और राष्ट्रविरोधी भी .