
अक्टूबर का महीना क्रांतियों का महीना रहा है और एक संजोग यह भी है की इसी महीने में महात्मा गाँधी का भी जन्म हुआ था. रूस , फ्रांस चीन और अमेरिका में भी कई क्रांतिकारी आंदोलन इसी महीने में हुए थे. और आज 12 अक्टूबर को 7 बजे के आसपास भारत भी बड़े बदलाव की करवट लेकर चूका है …
दिल्ली की सड़के और देश की अवाम इसकी गवाह बनी, आज शिवजी की बरात में सारी पार्टियां मौजूद रहीं, राहुल गाँधी ने सभी पार्टियों संगठनों और संस्थाओं के स्वागत का ऐलान पहले ही कर दिया था . और राहुल ने आज विपक्ष के लिए एक बड़ा ही घातक ब्यान भी दे दिया था की लगभग 200 आला अधिकारी उनके संपर्क में हैं जो सरकार की ख़ुफ़िया जानकारी उनको दे रहे हैं.
अब इसको आप सियासी हिकमत इ अमली भी कह सकते हैं और ककीकत भी, सत्तापक्ष को इसके बाद विभीषण के पैदा होने का शक दिल में बैठ गया है जो सत्ता के क़िले को ढहाने में बड़ी भूमिका निभाएगा.
बीजेपी कॉंग्रेस्समुक्त भारत के नारे को सही साबित करने में १२ साल तक कामयाब रही . लेकिन क्या विपक्ष की एकता बीजेपी मुक्त भारत के सपने को साकार करने में सफल हो पाएगी ? इसमें हमको तो पूरा शक है .
विपक्षी पार्टियों के अधिकतर महत्वाकांक्षी नेता आज राहुल के साथ रथ पर सवार होते हुए आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव की रणनीति के बारे में भी सोच रहे होंगे, लेकिन फिलहाल तो सभी लोकतंत्र बचाओ मार्च में साथ दिखाई दिए.
मगर जो रणनीतिकार बीजेपी और RSS के पास हैं वो फ़िलहाल विपक्ष के पास नज़र नहीं आते. अलबत्ता जनता और ख़ास तौर से युवा और युवतियों और छात्रों का अपार समर्थन कांग्रेस के पक्ष में जाता दिखाई दे रहा है.
एक और ऐतिहासिक बात आजके दिन सामने आई , जंतर मंतर जो विरोध का, आंदोलन का ,,,अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रतीक था उसको वहां से हटा दिया गया या कहिये Denotified कर दिया गया. लेकिन आज ही दिल्ली की सड़कें एक बड़े ऐतिहासिक मार्च की गवाह बन गईं या इसको आप आंदोलन भी कह सकते हैं.
आपको इस जंतर मंतर से जुड़ा एक तारीखी सच बताते चलें ,1993 में जब कांग्रेस के PV नरसिंघा राव प्रधान मंत्री थे तो कानून-व्यवस्था और सुरक्षा कारणों से बोट क्लब (Boat Club) पर हमेशा के लिए धरना-प्रदर्शनों पर पाबंदी लगा दी गई थी.
इस प्रदर्शन स्थल को जंतर मंतर शिफ्ट कर दिया था जो संसद भवन से 400 मीटर और दूर होगया यानी जो दूरी पहले 1.1 कि.मी.थी अब 1.5 KM हो गई. इस पर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कांग्रेस के इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए इसे “लोकतंत्र की हत्या” और “नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन” बताया था।
आडवाणी का कहना था कि बोट क्लब संसद भवन और सत्ता के गलियारों (Raisina Hill) के बेहद करीब है, जिससे जनता की आवाज़ सीधे सरकार के कानों तक पहुँचती है लिहाज़ा प्रदर्शन स्थल को जंतर-मंतर शिफ्ट करना जनता की आवाज़ को दबाने जैसा है और इसको संसद से दूर करने की एक साज़िश है.
आज जब धरनास्थल को (पुरानी दिल्ली) के रामलीला मैदान से करीब 4 किलोमीटर दूर • (उत्तरी दिल्ली) का बुराड़ी मैदान जो संसद भवन से 23.9 किलोमीटर • (पूर्वी दिल्ली) का सीबीडी ग्राउंड 13 Km की दूर शिफ्ट कर दिया गया है, इसके बाद सत्तापक्ष के नेता आंदोलनकारियों के शोर से दूर रहकर सुकून की नींद ले सकेंगे?
लेकिन सवाल यह है कल जब कांग्रेस सत्ता में आती है तो क्या आंदोलन स्थल को वापस जंतर मंतर शिफ्ट कर दिया जाएगा? इसकी उम्मीद भी कम नज़र आती है
सवाल यह भी है,की आज जिस लोकतंत्र को बचाने के लिए बाराखम्बा से सुप्रीम कोर्ट तक जो मार्च निकाला गया क्या इसको ज़िंदा रखने के लिए विपक्षी दल अपने अपने प्रदेशों में जहाँ उनकी सरकारें हैं ज़िंदा रखे हुए हैं? इसपर भी पूरे विपक्ष को Introspection यानी आत्मनिरीक्षण करने की ज़रुरत है. और हम इस वीडियो के माध्यम से उनको याद दिलाना चाहते हैं
दिल्ली के बारह खम्बा से सर्वोच्च न्यायालय तक लोकतंत्र बचाओ मार्च के इस ज़बरदस्त हुजूम को सत्ता में बैठे मंत्री भले हवा हवाई कह कर अपनी झेंप को मिटा रहे हों लेकिन सच यह है कि यह तूफ़ान इतना ज़बरदस्त था जिसमें सत्ता की छत उड़ भी सकती है.
सिकंदरा रोड जो मंडी हाउस circle से निकलती है, भगवानदास रोड, और Copernicus मार्ग ये तीनों ही रास्ते इंसानी खोपड़ियों से पटे पड़े थे ये हुजूम शायद दिल्ली की जनता ने पहली बार देखा होगा …. आज यहाँ 10 अक्टूबर वाली security Forces भी होती तो इसको नहीं रोक सकती थी….. आप भी आजके इस ऐतिहासिक लोकतंत्र बचाओ मार्च का एक नज़ारा ज़रूर देखिये … ….
दोस्तों आजके इस मार्च को आप सत्ता के बदलने की तरह देखते हैं या देश में अभी भी सांप्रदायिक दंगे हिन्दू मुस्लिम हिंदुस्तान पाकिस्तान जैसे मुद्दे सांप्रदायिक पार्टियों को सहारा दे सकते हैं? अपनी राये कमेंट बॉक्स में जाकर ज़रूर दें मेरा भारत ज़िंदाबाद