आशीष मिश्रा की रिहाई पर विपक्ष लामबंद क्यों ?

लखीमपुर खीरी हिंसा: 4 महीने बाद जेल से बाहर आए गृहराज्य मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा, चार किसानों को रौंदने के मामले में हैं आरोपी

आशीष मिश्रा की जमानत मंजूर होने के बाद से इस मुद्दे को लेकर सियासत गरमाई हुई है। तमाम विपक्षी दल आशीष मिश्रा की रिहाई के मुद्दे पर भाजपा पर निशाना साध रहे हैं।

लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में मुख्य आरोपी इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से जमानत मिलने के बाद आशीष मिश्रा 15 Feb को जेल से रिहा होगया । आशीष के पिता अजय मिश्रा उर्फ़ टेनी केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री हैं। लखीमपुर हिंसा मामले में कुल 8 लोगों की जान गई थी, जिसमें चार किसान भी शामिल थे।और आशीष पर उस घटना से सम्बंधित कई मुक़द्दमे दर्ज हैं .

10 फरवरी को हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच से जमानत मंजूर होने के बाद भी आशीष मिश्रा की रिहाई नहीं हो सकी थी। दरअसल, कोर्ट के आदेश में आशीष मिश्रा को IPC की धारा 147 148, 149, 307, 326 और 427 के साथ-साथ आर्म्स एक्ट की धारा 34 और 30 के तहत आरोपों में जमानत मिली थी। जबकि FIR के समय इस बात का ख्याल रखा गया होगा कि आशीष को आईपीसी की धारा 302 और 120-बी से बाहर रखा जाए ।बा अलफ़ाज़ दीगर जनता को और किसानों को आश्वासन देने के लिए 8 धाराएं दिखा दी हाई थीं . और कह दिया गया था कि गिरफ़्तारी ज़रूर होगी मगर रिहाई भी होगी यह तो नहीं कहा गया था . बहार हल जो भी हो फिलहाल मंत्री जी के लाडले तो बाहर हैं भले कितने ही परलोक सुधार गए हों.

यहाँ यह बात क़ाबिले ग़ौर है कि एक दिन पहले कोर्ट ने जमानती आदेश में 302 और 120-B की धाराओं को जोड़ने के आदेश दिए थे। ये दोनों धाराएं हत्या और आपराधिक साजिश से संबंधित हैं। वहीं, संशोधित बेल ऑर्डर के बाद आशीष मिश्रा के जेल से बाहर होने का रास्ता साफ हो गया। कोर्ट का आदेश जेल पहुंचा तो करीब 1 घंटे की कागजी कार्रवाई के बाद आशीष मिश्रा को जेल से रिहा किया गया।

यहाँ यह बात साफ़ होजाती है कि अगर सैयां भये कोतवाल, तो डर काहे का ” , यानी साफ़ है जिसका बाप ही केंद्र सरकार में गृह राज्य मंत्री है तो फिर इंसान कि जान कि क्या क़ीमत रह जाती है , और वैसे भी कल तक जो अपराधी , आरोपी होता है पार्टी Join करते ही सारे अपराध माफ़ और क्लीन चिट मिलने में अब कोई शक ही नहीं .

अब चाहे हरिद्वार धर्म संसद भड़काऊ भाषण देने (हेट स्पीच) के आरोपी स्वामी यति नरसिंहानंद को ज़मानत का मामला हो या , प्रज्ञा सिंह ठाकुर की रिहाई का , पूर्व मंत्री डा. मायाबेन कोडनानी और विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के नेता डा. जयदीप पटेल को पहले ही ज़मानत मिल चुकी है . अगर नहीं मिली तो बेगुनाह , मौलाना कलीम सिद्दीकी साहब , मुहम्मद उम्र गौतम , आज़म खान , केरल के सिद्दीक कप्पन (journalist ) ये चंद नाम मिसाल के तौर पर हैं , जबकि ऐसे बेगुनाहों कि तादाद हज़ारों में है जो बेक़ुसूर , जेल की सलाखों के पीछे ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं . ये ज़ुल्म है और ज़ुल्म की नहूसत दुनिया को भुगतनी पड़ती है .

तो इस पूरे प्रकरण में हमारा कहना है की आशीष मिश्रा की रिहाई पर विपक्ष शोर कर रहा है किन्तु हज़ारों बेगुनाहों की रिहाई के लिए ज़बान क्यों बंद है , शायद वहां सियासी लाभ नहीं होगा ….

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