अपमान से जन्मा आंदोलन: ‘कॉकरोच’ बना स्वाभिमान  का प्रतीक

कपिल बर्मन

इस वैचारिक क्रांति का जन्म हाल ही के एक गहरे विवाद से हुआ। जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के एक संदर्भ से यह विवाद पनपा कि बेरोजगारों, प्रदर्शनकारियों और सत्ता से सवाल करने वाले आम नागरिकों को कथित तौर पर ‘कॉकरोच’ (तिलचट्टा) के रूप में सम्बोधित किया गया, तो देश भर के युवाओं का आक्रोश फूट पड़ा। लेकिन इस नई पीढ़ी ने अपमानित होकर खामोश बैठने के बजाय इस शब्द को अपना अस्त्र बना लिया।

विज्ञान कहता है कि ‘कॉकरोच’ एक ऐसा जीव है जो परमाणु हमले जैसी भीषण आपदाओं में भी जीवित रहने की क्षमता रखता है। युवाओं ने संगठित होकर इसी रूपक के साथ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का गठन किया। उनका संदेश स्पष्ट है: आम नागरिक, उसकी आवाज और उसके मौलिक अधिकार किसी भी सत्तावादी प्रहार, दमन या तानाशाही रवैये से नष्ट नहीं हो सकते। यह आंदोलन अब सीधे तौर पर वर्तमान राजनीतिक चरित्र और मोदी सरकार की नीतियों के सामने एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है।

नायक पूजा का अंत: महापुरुषों की चेतावनी

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि यहाँ जनता अपने नेताओं को भगवान का दर्जा दे देती है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ इसी ‘अंधभक्ति’ और नायक-पूजा पर सीधा प्रहार कर रही है।

25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने ऐतिहासिक और अंतिम भाषण में बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इस खतरे के प्रति देश को आगाह किया था। उन्होंने कहा था:

भक्ति या नायक-पूजा धर्म में आत्मा की मुक्ति का मार्ग हो सकती हैलेकिन राजनीति में भक्ति या नायक-पूजा पतन और अंततः तानाशाही का सुनिश्चित मार्ग है।”

बाबासाहेब ने स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए हमें अपनी स्वतंत्रता किसी भी ‘महापुरुष’ के चरणों में समर्पित नहीं करनी चाहिए। इसी वैचारिक तर्ज पर शहीद भगत सिंह ने भी कहा था कि

आलोचना और स्वतंत्र सोच एक क्रांतिकारी के दो अनिवार्य गुण हैं।”

आज का जेन-जी युवा इन्हीं महापुरुषों के विचारों को अपनाकर सत्ता के अंधानुकरण को नकार रहा है।

 राजनीतिक दलों में हलचल और अधिकारों का संघर्ष

इस युवा विद्रोह ने स्थापित राजनीतिक दलों में भारी खलबली मचा दी है। जो नेता अब तक धर्म, जाति और भावनात्मक मुद्दों के नाम पर युवाओं को भटका रहे थे, वे अब रोजगार, शिक्षा, और अभिव्यक्ति की आजादी (अनुच्छेद 19) पर सीधे सवाल सुनकर घबराए हुए हैं। राजनीतिक दलों को अब यह समझ में आ रहा है कि युवाओं का यह नया वर्ग खोखले दावों को नहीं, बल्कि तथ्यों और तर्कों को मानता है।

यह केवल व्यवस्था के प्रति असंतोष नहीं है, बल्कि यह अपने मौलिक अधिकारों और गरिमापूर्ण जीवन (अनुच्छेद 21) को लेकर एक नए संघर्ष की आहट है।

संसदीय लोकतंत्र में भूमिका और भविष्य

संसदीय लोकतंत्र में जब विपक्ष सड़क से गायब हो जाए और मुख्यधारा की मीडिया सत्ता की वंदना में लग जाए, तब कॉकरोच जनता पार्टी जैसे नागरिक आंदोलनों की आवश्यकता होती है। भविष्य में इस आंदोलन की भूमिका एक ‘संवैधानिक प्रहरी’ और एक मजबूत ‘दबाव समूह’ (Pressure Group) की होगी। मीम्स, व्यंग्य, डिजिटल कैंपेन और तर्कों के माध्यम से यह गैर-राजनीतिक मंच सत्ता की जवाबदेही तय कर रहा है।

सारांश:‘कॉकरोच जनता पार्टी’ भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में नागरिक अधिकारों की पुनर्स्थापना का एक अभिनव अध्याय है। यह तानाशाही प्रवृत्तियों के अंत की आहट है और एक ऐसे भविष्य का संकल्प है जहां लोकतंत्र में कोई राजनेता नहीं, बल्कि ‘नागरिक’ ही असली नायक होगा। नागरिक की यह अंगड़ाई इस बात का उद्घोष है कि जब समाज का सबसे युवा हिस्सा निडर होकर सवाल पूछने लगे, तो बड़े से बड़े सत्ता-प्रतिष्ठान को भी झुकना ही पड़ता है।

लेखक जाने माने समाज सुधारक और समाज सेवी हैं

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