‘वंदे मातरम्’ न गाने पर आपराधिक कार्रवाई नहीं?

Edited by Ali Aadil khan 

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: धार्मिक आधार पर ‘वंदे मातरम्’ न गाने पर आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए
2026 के नए कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई; कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, ‘बिजो इमैनुएल’ फैसले का दिया हवाला

नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026। ‘वंदे मातरम्’ को लेकर देश में चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा की आपत्ति के कारण ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाता, उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह अभी अंतिम फैसला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और आगे की सुनवाई के लिए मामला रखा है।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टी.एम. कृष्णा की उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें उन्होंने 2026 में किए गए उस कानूनी संशोधन को चुनौती दी है, जिसके तहत राष्ट्रीय गीत से संबंधित कुछ गतिविधियों को दंडनीय बनाया गया है।

क्या है पूरा मामला?

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना ने इस याचिका पर सुनवाई की।

याचिका में 1971 के Prevention of Insults to National Honour Act में 2026 में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।

याचिका का एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अगर कोई नागरिक अपनी धार्मिक मान्यता या अंतरात्मा की आवाज़ के कारण ‘वंदे मातरम्’ के एक या सभी पद गाने से इनकार करता है, तो क्या उसे आपराधिक सजा दी जा सकती है?

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक 2026 में किए गए संशोधन के बाद कानून में राष्ट्रीय गीत को लेकर भी दंडात्मक प्रावधान जोड़े गए हैं।

किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने या ऐसे गायन में बाधा डालने पर जेल, जुर्माने या दोनों का प्रावधान है। रिपोर्टों के अनुसार अधिकतम सजा तीन वर्ष तक की जेल हो सकती है।

यही प्रावधान अब सुप्रीम कोर्ट के सामने संवैधानिक सवाल बनकर आया है। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने 1986 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक Bijoe Emmanuel बनाम State of Kerala फैसले का हवाला दिया।

कोर्ट ने संकेत दिया कि उस फैसले में स्थापित कानून को मौजूदा मामले में भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। अदालत की टिप्पणी का सार था कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा की आपत्ति के कारण ‘वंदे मातरम्’ के एक या सभी पद गाने से इनकार करता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।

एक रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा कि उसे उम्मीद है कि Bijoe Emmanuel मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून इस मामले पर भी लागू होगा।

क्या था Bijoe Emmanuel मामला?

यहां सुप्रीम कोर्ट का 1986 का फैसला बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। Bijoe Emmanuel बनाम State of Kerala मामले में तीन स्कूली बच्चों ने अपने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन राष्ट्रगान बजने के दौरान वे सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में कहा था कि केवल राष्ट्रगान न गाने को, जब व्यक्ति सम्मानपूर्वक व्यवहार कर रहा हो, अपने आप में राष्ट्रगान का अपमान नहीं माना जा सकता।

इसी संवैधानिक सिद्धांत को मौजूदा ‘वंदे मातरम्’ मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यानी यहां एक अहम अंतर सामने आता है. यानी सम्मान करना एक बात है और किसी व्यक्ति को किसी विशेष तरीके से अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए मजबूर करना दूसरी बात।

सुप्रीम कोर्ट फिलहाल इसी संवैधानिक सवाल की जांच कर रहा है।

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