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शाहीन बाग़ से उठी हिन्दुओं की पुकार , है कोई जो ….

शाहीन बाग़ से उठी हिन्दुओं की पुकार , है कोई जो ….

मैं अकेला हिंदू हूं जो उस बिल्डिंग में रह रहा हूं मगर मुझे आज आज तक न तो पूजा पाठ करने से रोका, न मुझे परेशान किया, मेरा बेटा सुबह शंख बजाता है इस पर कभी भी किसी मुस्लमान ने कोई आपत्ति नहीं जताई ,मुझे बहुत अच्छा लगता है मुसलमानो के बीच रहने में

वसीम अकरम त्यागी
मुस्लिम आबादी वाली इस बस्ती में हिंदू दुकानदार भी हैं, उनके मकान भी हैं, धार्मिक स्थल भी हैं। समाज में बढ़ रही नफ़रत क्या इस इलाक़े तक भी पहुंची है? यह जानने के लिये हमने दुकानदारों, वहां के हिन्दू निवासियों , और मंदिर के पुजारी से बात की।

शाहीन बाग़ इलाक़े को कौन नहीं जानता? सीएए विरोधी आंदोलन ने दिल्ली के इस इलाक़े को वैश्विक पहचान दी। यूपी के नोएडा से सटी इस बस्ती की अधिकांश आबादी मुस्लिम है।

पिछले दिनों जब दक्षिणपंथी हिंदुत्तववादी संगठनों के लोगों ने मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार का आह्वान किया, तो उसका परिणाम कर्नाटक के धारवाड़ में तरबूज़ बेचने वाले एक मुस्लिम फेरीवाले को भुगतना पड़ा।कर्नाटक में ही लगने वाले एक ‘हिंदू मेले’ में मुस्लिम दुकानदारों को प्रतिबंधित कर दिया। देश में दीपावली के अवसर पर हिंदुत्तववादी संगठनों के लोगों द्वारा आह्वान किया जाता रहा है कि दीपावली में सामान उन्हीं से ख़रीदें जो ‘दीपावली’ मनाते हों। ज़ाहिर है इस तरह का आह्वान मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार के लिये ही किया जाता है।

समाज के दूसरे पक्ष की ओर चलते हैं। जी हां, हम ज़िक्र कर रहे हैं, शाहीन बाग़ का। अधिकांश मुस्लिम आबादी वाली इस बस्ती में हिंदू दुकानदार भी हैं, उनके मकान भी हैं, धार्मिक स्थल भी हैं। समाज में बढ़ रही नफ़रत क्या इस इलाक़े तक भी पहुंची है, यह जानने के लिये हमने दुकानदारों, रहवासियों, और मंदिर के पुजारी से बात की।

“नेताओं ने ख़राब किया है माहौल”

दीपक चौरसिया 15 साल से शाहीन बाग़ में पान की दुकान चला रहे हैं, उनके शत-प्रतिशत ग्राहक मुस्लिम ही हैं। दीपक अपना 15 वर्षों का अनुभव बताते हुए कहते हैं “मेरा तो जन्म ही मुस्लिम के घर में हुआ, हमारा मकान मालिक मुसलमान था, हमारा भाईचारा ऐसा है यदि आज मुझे कोई समस्या भी हो जाए तो हमारे साथ यहीं के स्थानीय मुसलमान खड़े मिलेंगे, मुझे आज तक कभी यह महसूस ही नहीं हुआ कि मैं हिंदू हूं और मुसलमानों के बीच रह रहा हूं, लेकिन देश के नेताओं ने देश को बदनाम कर दिया।” दीपक चौरसिया के मुताबिक़ वे जब से शाहीन बाग़ आए हैं, तभी से एक ही दुकान में हैं, दुकान में उन्होंने एक छोटा सा मंदिर भी बनाया हुआ है, सुबह दुकान खोलते ही वे सबसे पहले पूजा करते हैं। हालांकि दुकान उन्होंने किराए पर ली हुई है, दुकान मालिक भी मुसलमान है। दीपक के मुताबिक़ “उनके दुकान मालिक ने न तो दुकान में मंदिर बनाने पर कोई ऐतराज़ किया और न ही उन्हें किसी ने पूजा पाठ करने से रोका।”

समाज में बढ़ रही नफ़रत के सवाल पर दीपक दो टूक कहते हैं कि “नफरत तो हम और आप ही फैलाते हैं, और कौन फैलाता है! लेकिन यह ग़लत है, जो देश चला रहा है उसे इसे समझना चाहिए, मैं जिस बिल्डिंग में रहता हूं उसमें 16 फ्लैट हैं, जिसमें से 15 मुसलमानों के हैं, मैं अकेला हिंदू हूं जो उस बिल्डिंग में रह रहा हूं मगर मुझे आज ने न तो पूजा पाठ करने से रोका, न मुझे परेशान किया, मेरा बेटा सुबह शंख बजाता है इस पर कभी भी किसी ने कोई आपत्ति नहीं की।”

हाल ही में रामनवमी जुलूस में डीजे पर बजाए जाने वाले भड़काऊ नारे, गीत को दीपक गलत बताते हैं। उनके मुताबिक़ “ये नफ़रत करने वाले दफान हो जाए, अगर यह बात पीएम साब को समझ नहीं आ रही है, तो हमें पीएम बना दें, हम बता देंगे कि देश कैसे चलाते हैं।”

दीपक चौरसिया के ‘निखिल पान भंडार’ के सामने ही ‘अग्रवाल स्वीटस’ है जिसे सुनील यादव चला रहे हैं। दीपक चौरसिया की की दुकान की तरह ही सुनील यादव की दुकान की कहानी है। जिस बिल्डिंग में अग्रवाल स्वीटस है उसका मालिक मुसलमान हैं। दुकान में मंदिर भी बनाया हुआ है जिस पर उनके मुस्लिम दुकान मालिक को कोई आपत्ति नहीं है। सुनील बताते हैं कि वे तक़रीबन दस वर्षों से इस शाहीन बाग़ में हैं, लेकिन उनके धर्म की वजह से कभी भी किसी ने भी उनसे कोई बदतमीज़ी तक भी नहीं की। रामनवमी के दौरान हुई हिंसा पर सुनील यादव का कहना है कि “कुछ लोग होते हैं जो धर्म या जाति के नाम पर हिंसा पर उतर आते हैं, हम समाज में अच्छे और बुरे लोग होते हैं। धर्म के नाम पर हिंसा नहीं होनी चाहिए, इंसान हैं इंसानियत के नाते ही जिएं, आपस में मिल जुलकर रहना चाहिए।”

“नफ़रत के झांसे में आने वालों को होगा अफ़सोस”

शाहीन बाग़ में इंसानियत और सद्घभाव की ये बातें सिर्फ एक तरफा नहीं हैं, बल्कि यहां के स्थानीय लोगों का भी यही मानना है कि नफ़रत की सियासत के झांसे में आने वालों को अफ़सोस होगा। मोहम्मद जाबिर का बचपन शाहीन बाग़ में ही बीता है। जाबिर कहते हैं कि मेरी याद में (बीते 35 वर्षों में) शाहीन बाग़ में धर्म को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ। शाहीन बाग़ में पान की जितनी भी दुकानें वे तक़रीबन हिंदू चलाते हैं। इसके अलावा अग्रवाल स्वीटस, मेडिकल स्टोर हैं, हार्डवेयर की दुकानें हैं, इनके शत प्रतिशत ग्राहक मुसलमान हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या कभी उनके मन में भी इस इलाक़े में हिंदू दुकानदारों के बहिष्कार का ख्याल आया, इस पर जाबिर कहते हैं, “हम भी इंसान ही हैं, फरिश्ते नहीं हैं। लेकिन जिस तरह एक बाग़ में तरह-तरह के फूल हैं, उसी तरह इस देश में अलग अलग धर्म संस्कृतियों के लोग हैं, यही इस मुल्क की ख़ूबसूरती है।”

नफ़रत फैलाने वालों के लिये जाबिर कहते हैं, “अपने राजनीतिक स्वार्थ को पूरा करने के लिये नफ़रत का जो माहौल बनाया गया है, इसके दुष्परिणाम उन लोगों को भुगतने होंगे जो नफ़रत फैला रहे हैं। नफरत इंसान को जानवर बना देती हैं, कल जब यही नफ़रती अपने घर जाएंगे, तो वहां भी जुदा राय रखने वाले अपने ही भाईयों से लड़ेंगे। तब इन्हें अहसास होगा कि इन्होंने नफ़रत के लिये कितना कुछ गंवा दिया।” जाबिर समाज से आह्वान करते हैं कि, “अच्छे लोगों को सामने आना चाहिए इस माहौल को बदलने की कोशिश करनी चाहिए।” शाहीन बाग़ जैसे इलाक़े में हिंदू दुकानदारों की सुरक्षा की गारंटी देते हुए जाबिर कहते हैं कि, “ जिस तरह दिल्ली में मुस्लिम बिरयानी वाले की दुकान बंद कराई गई, या मंदिर के सामने तरबूज बेचने वाले मुस्लिम का ठेला पलटा गया, ऐसा यहां जामियानगर में तो मुमकिन नहीं हैं। कल यदि कोई नफ़रती तत्व आकर इन दुकानदारों को परेशान करता है तो हम लोग सबसे पहले उसके सामने खड़े मिलेंगे, ये लोग हमारे लोग हैं, इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी है।”

जाबिर के इस दावे को ही शारिब हसन आगे बढ़ाते हैं। शारिब कहते हैं कि “बहिष्कार करने जैसी चीज़ें हमारे दिमाग़ में भी नहीं आती, न हमारी उस तरह की सोच है। इस इलाक़े में एक किमी के भीतर तीन मंदिर हैं, मस्जिद भी हैं। यहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं लेकिन इसके बावजूद सब अमन से रहते हैं।” पिछले दिनों दिल्ली समेत देश में जो सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुई हैं, शारिब उन्हें राजनीति से प्रेरित घटनाएं मानते हैं। उनके मुताबिक़ “ये सब राजनीति से प्रेरित घटनाएं हैं। देश का 80 प्रतिशत युवा बेरोजगार है, इन सब मुद्दों से ध्यान हटाकर उसे दूसरी ओर ले जाया जा रहा है।” मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार के सवाल पर शारिब कहते हैं कि “मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार करने जैसी बातों को आम भारतीय नहीं सोचता, बल्कि कुछ चुनिंदा लोग हैं जो राजनीति से प्रेरित होकर इस तरह की बातें करते हैं। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तौर से पिछड़े होने के बावजूद देश का मुसलमान शांति में विश्वास करता है।” शारिब बार-बार दोहराते हैं कि “ये तमाम घटनाएं जो इन दिनों घट रही हैं ये सब राजनीति से प्रेरित हैं। जहां तक सवाल शाहीन बाग़ का है तो सीएए विरोधी आंदोलन ने इस इलाक़े को एक नई पहचान दी है। राष्ट्रीय स्तर शाहीन बाग़ आंदोलन प्रतीक है, संविधान की हिफ़ाज़त का प्रतीक है।” मौजूदा सांप्रदायिक माहौल को शारिब खारिज करते हुए कहते हैं, “आज भी इस देश का आम आदमी आपस में मिल जुलकर रहना चाहता है, और रहता है, वह आपसी सौहार्द में विश्वास रखता है। नफ़रत का जवाब मोहब्बत है, इसी पैग़ाम को आम करने की ज़रूरत है।”

“हमारे दिमाग़ के साथ खेल रहे हैं राजनेता”

उत्तर प्रदेश के बलिया की रहने वाली कविता राय एक दशक से भी अधिक समय से शाहीन बाग़ से जुड़ी रही हैं। 2017 में उन्होंने अपना टैम्पटेशन नाम से क़ैफे चला रही हैं। उनका क़ैफे शाहीनबाग़ के सबसे व्यस्त रास्ते पर है। मौजूदा माहौल पर बात करते हुए कविता कहती हैं कि, “मेरे कैफ़े पर आने वाले 99 प्रतिशत ग्राहक मुस्लिम ही हैं। सुबह से लेकर शाम तक मेरा मुस्लिमों से ही बात-चीत होती है, एक लड़की होने के नाते, या बिजनेस वुमेन होने के नाते मैंने कभी मुस्लिमों को बीच में असहज महसूस नहीं किया।

मुहम्मद जाबिर                                   कविता रॉय                                मोहमद शारिब

समाज में बड़ रही नफ़रत पर कविता कहती हैं कि, “वे (राजनेता) हमारे दिमाग़ से खेल रहे हैं, वे हमारे दिमाग़ को पढ़ चुके हैं कि हमारे दिमाग़ो में एक दूसरे के लिये क्या चलता है। लेकिन मेरा सवाल है कि कितने ऐसे लोग हैं जिनका मुस्लिम के साथ उठना बैठना नहीं हैं? क्या किसी मुसलमान शिक्षक ने कहा कि वह हिंदू छात्रों को नहीं पढ़ाएगा? यदि कोई मुस्लिम डॉक्टर है तो उसने हिंदू मरीज़ों मार दिया? हमारे पूर्वांचल में एक कहावत है कि ‘कौवा कान लेले गइल’ हमारे समाज आज कल यही चल रहा है। लोग अपना कान देखने के बजाय कौवा के पीछे भाग रहे हैं। मुसलमानों के बारे में तरह-तरह की अफवाहे हैं। अरे भैय्या पहले मुसलमानों के बीच में आकर तो देखो, मैं कई वर्षों से मुस्लिम इलाक़े में रह रही हूं, मुसलमानों के बीच रहकर कारोबार कर रही हूं मैंने तो कभी खुद को असुरक्षित महसूस नहीं किया।”

देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, लेकिन देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो मुसलमानों की वतनपरस्ती पर सवाल करता रहा है। कविता राय ऐसे लोगों को जाहिल करार देते हुए कहती हैं, “कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि ये आपका देश नहीं है, अगर यह देश उनका (मुसलमानों) का नहीं है तो, अगर यह देश उनका नहीं है तो यह फैसला तो 1947 में ही हो जाना चाहिए था। भारत में मुग़ल शासन रहा है, मुग़लकाल में भी तो हम हिंदू थे, अगर मुग़ल चाहते तो वो भी कह देते कि यह देश उनका (हिंदुओं का) नहीं है, और तब संभावनाएं भी थीं, लेकिन नहीं। अब ये फिज़ूल के मुद्दे उठाए जा रहे हैं। यह जानते हुए भी कि इस देश की ख़ूबसूरती यही है कि यह सारे धर्मों को समाहित किए हुए हैं।” पिछले दिनों मुस्लिम महिलाओं को निशाना बनाने वाले कई मामले सामने आए हैं, उन सभी मामलों पर कविता कहती हैं कि महिला सिर्फ महिला होती है, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, लेकिन उसकी एक ही पहचान होती है, और वह है महिला अगर हमें सोशल मीडिया पर अच्छी बातें पोस्ट नहीं करनी हैं तो न करें, लेकिन गलत चीजों को बढ़ावा भी न दें।

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम…

जामिया नगर इलाक़े में तीन मंदिर हैं, उन्हीं में से एक श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर है। इस मंदिर के मुख्य पुजारी की तबीयत ख़राब होने की वजह से अपने गांव जा चुके हैं। जिसके बाद में पुजारी के रूप में घासी लाल शर्मा कार्यरत हैं। घासी लाल शर्मा इसी वर्ष इस मंदिर में आए हैं। घासी लाल शर्मा बताते हैं कि “यह मंदिर हमारे एक रिश्तेदार का है जो इन दिनों अपने गांव में हैं।

शाहीन बाग़ मंदिर के पुजारी घासी लाल शर्मा

 

मैं तक़रीबन एक डेढ़ महीने पहले ही यहां आया हूं। इस दौरान मैंने यही देखा कि सबको अपने काम से काम है, सब अपने काम में लगे हुए हैं हम मंदिर में पूजा करते हैं, कभी कोई विवाद या लड़ाई झगड़ा हमारी जानकारी में नहीं आया। अभी मैं जिस इलाक़े में रह रहा हूं यहां, आटे में नमक बराबर भी हिंदू नहीं हैं, सारी बस्ती मुसलमानों की है लेकिन मुझे आज तक किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा, सभी मेरा आदर सत्कार करते हैं, मैं भी लोगों का आदर करता हूं।”

पिछले दिनों धर्म संसद, हिंदू महापंचायत के अलावा भी ‘बाबाओं’ की तरफ से भी अनर्गल बयान आए हैं। घासी लाल शर्मा उन बयानों को खारिज करते हुए कहते हैं कि, “ ये लोग गेंहू में घुन की तरह हैं, ये हर समाज में हैं। लेकिन चाहे किसी भी समाज से हो, समाज का हर आदमी सुबह रोजगार के लिये जाता है, उनको शांति अमन चाहिए, कोई नहीं चाहता की झगड़ा हो, वह अपना गुजारा करने में ही मस्त है। ये झूठी अफवाहें गलत हैं।” श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर के पुजारी कहते हैं कि “मैं जितने भी दिन से यहां हूं मुझे तो आज तक किसी ने नहीं टोका, ये नफरत गलत है। कोरोना तो वैसे ही हमें बर्बाद कर दिया है, इसलिये शांति से रहें… ईश्वर अल्लाह एक ही नाम सबको सम्मति दे भगवान…।”

मंदिर के नज़दीक विजय पाल फोटो स्टूडियो चलाते हैं। उनका जन्म भी यहीं हुआ है। मौजूदा सांप्रदायिक माहौल पर बात करते हुए विजय पाल कहते हैं कि, “कुछ उन्मादी लोग हर समाज में मौजूद हैं, कोई भी समाज इससे अछूता नहीं है। हमें एक दूसरे का ख्याल रखना चाहिए।” यहीं पर राजेश की फोटो स्टेट की दुकान चलाते हैं। वे बचपन में अपने पिता के साथ ओखला गांव में आए थे और यहीं बस गए। राजेश बताते हैं कि, “उन्हें आज तक उनके धर्म की वजह से किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा, यह जो माहौल इन दिनों बन रहा है यह सब नेतागिरी चमकाने के लिये हो रहा है।”  यहीं पर कमल की भी दुकान है। कमल बताते हैं कि 50 वर्षों से उनकी यहां दुकान है, यह दुकान उनके पिता जी ने शुरू की थी और अब वे इस दुकान को संभाल रहे हैं। कमल बताते हैं कि “हम यह सोच भी नहीं सकते यह दुकान इस इलाक़े से बाहर ले जाएं।”

पुराने तो भारी भरकम हैं, नए को संभालें!

मंदिर के सामने राम लीला ग्राउंड पिलखन के पेड़ के नीचे मेहरबान अली बैठे हैं, उनके पीछे राम लीला मैदान कमैटी एक बोर्ड लगा है, जिस पर पदाधिकारियों के नाम लिखे हैं, उन्हीं नामों में एक नाम मेहरबान अली का है, मेहरबान अली रामलीला ग्राउंड कमैटी के उपाध्यक्ष हैं। जिस जगह वो बैठे हैं उसे ‘चौपाल’ बताते हुए कहते हैं कि, “हर शाम इसी चौपाल पर बहस होती हैं, लेकिन वह बहस हिंसा तो छोड़िए दूसरे व्यक्ति के अनादर तक भी नहीं पहुंची।” मेहरबान दावा करते हैं कि, “यहां से अच्छी रामलीला, दशहरा, होली, दीवाली पूरे देश में कहीं नहीं मनाई जाती है। यहां सब मिल जुलकर रहते हैं, किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं है। हमारे घरों में होने वाला कोई भी कार्यक्रम यहां के हिंदू भाईयों बग़ैर मुकम्मल नहीं हो सकता, और ऐसा ही स्थिति हिंदूओं की है, वे भी हमारी शिरकत के बिना कोई कार्यक्रम संपन्न नहीं कर सकते।”

मेहरबान अली कहते हैं कि “ अगर यहां कोई माहौल खराब करने की कोशिश करेगा तो उसे रोकने के लिये हम बैठे हैं, हम किसी भी क़ीमत पर अपना भाईचारा खराब नहीं होने देंगे। लेकिन जैसे हालात पैदा किये जा रहे हैं, वो अच्छा नहीं है। इससे देश की फिज़ा ख़राब होगी, देश का माहौल ख़राब होगा। आने वाली पीढ़ी को समस्या हो जाएगी।”
नफ़रत का जवाब मोहब्बत

मेहरबानी अली के कथन को ही मोहम्मद अबुज़र थोड़ा और आगे बढ़ाते हैं। अबुज़र कहते हैं कि “नफ़रत का जवाब नफ़रत नहीं बल्कि मोहब्बत है। और मुसलमानों ने इसे साबित भी किया है, रामनवमी पर शोभा यात्रा पर माहौल खराब करने की कोशिशें हुईं लेकिन ऐसे में भी मुसलमान शोभा यात्रा में शामिल लोगों को शरबत पिलाते दिखे।” हिंदू दुकानदारों का बहिष्कार के सवाल पर अबुज़र कहते हैं कि अव्वल तो ऐसा होने नहीं देंगे, और यदि कोई करने की कोशिश भी करता है तब मैं ऐसी परिस्थिति में हिंदू दुकानदारों के साथ रहुंगा। होने नहीं दुंगा, और मैं ही नहीं कोई भी समझदार इंसान ऐसा नहीं होने देगा। अबुज़र तर्क देते हैं कि “यहां पर मुस्लिम बुसंख्या में हैं, इसलिये इसकी जिम्मेदारी भी मुसलमानों की है यहां कोई भी ग़ैर मुस्लिम अपने धर्म की वजह से परेशान न हो।”

वर्तमान पर हालात पर चिंता ज़ाहिर करते हुए अबुज़र कहते हैं, “हमें पहले कट्टरपंथ और रूढ़िवाद में फर्क करना होगा। कट्टरपंथी हर समाज में होते हैं। लेकिन क्या कभी सुना कि किसी मौलाना ने 20 लाख हिंदूओं को कत्ल करने का आह्वान किया, क्या किसी मौलाना ने दूसरे धर्म के महिलाओं का बलात्कार करने की धमकी दी? आपने नहीं देखा होगा कि किसी मुसलमान ने सब्जी बेचने वाले किसी मजदूर को उसका आधार कार्ड देखकर मारा हो।” नफ़रत के इलाज के सवाल पर अबुज़र कहते हैं, “इसका इलाज बहुसंख्यक समाज के पास है, लेकिन उससे पहले बहुसंख्यक समाज को यह स्वीकार करना होगा, हिंदू समाज का एक बड़ा वर्ग मुसलमानों के प्रति रेडिकल हो चुका है, तभी उसे डी-रेडिकल किया जा सकता है।”

शाहीन बाग़ बेहद विशाल भारत का छोटा सा मोहल्ला मात्र है। ऐसे हज़ारों शाहीन बाग़ हैं जहां सौ फीसद मुस्लिम आबादी में किसी हिंदू दुकानदार को अपना काम करने में कोई दिक्कत नहीं आती। मुनव्वर राना कहते हैं-

कहीं मंदिर कहीं मस्जिद की तख्ती हम लगा बैठे
बनाना था हमें एक घर मगर क्या हम बना बैठे।

परिंदों में नहीं होती है ये फ़िरकापरस्ती क्यों
कभी मंदिर पे जा बैठे कभी मस्जिद पे जा बैठे।

इस शेर में मस्जिद पर आने वाले किसी परिंदे को नहीं उड़ाया जाता। मंदिर को भी ज़मानत देना चाहिए कि नई रविश में बह कर वो परिंदों से उनकी नस्ल की बुनियाद पर नफ़रत नहीं करेगा। तरक़्क़ी के लिए हमें आगे बढ़ना है मगर मुहब्बत के लिए हमें गए वक्तों में लौटना होगा। गांधी ने यूं ही नहीं कहा था “हिंदू और मुसलमान इस मुल्क की दो आंखें हैं।”

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