नीट पेपर लीक: गिरफ़्तार महिला प्रोफ़ेसर कौन हैं, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने क्या ज़िम्मेदारी
दी थी ?
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नीट परीक्षा पर सवाल पहले ही उठ रहे थे, अब सीबीआई की कार्रवाई ने पूरे सिस्टम की साख पर और गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। पुणे से मनीषा मांढरे की गिरफ़्तारी ने यह बहस तेज़ कर दी है कि आखिर देश की सबसे अहम मेडिकल प्रवेश परीक्षा कितनी सुरक्षित है।
सीबीआई के अनुसार, मनीषा मांढरे नीट यूजी-2026 की परीक्षा प्रक्रिया से जुड़ी थीं और उन्हें नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने एक्सपर्ट के तौर पर नियुक्त किया था। जांच में सामने आया है कि उन्हें बॉटनी और ज़ूलॉजी के प्रश्नपत्रों तक पूरी पहुंच हासिल थी।
हैरानी की बात यह है कि एक प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत व्यक्ति का नाम भी अब इस कथित पेपर लीक घोटाले में सामने आ रहा है। सवाल सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर उठ रहे हैं जो लाखों छात्रों के भविष्य का दावा करती है।
सीबीआई अब तक इस मामले में नौ लोगों को गिरफ़्तार कर चुकी है। इससे पहले लातूर निवासी पीवी कुलकर्णी को भी पुणे से पकड़ा गया था, जिन्हें एजेंसी ने इस पूरे नेटवर्क का ‘मास्टरमाइंड’ बताया है। सीबीआई ने कहा है कि पीवी कुलकर्णी को गहन पूछताछ के बाद पुणे से गिरफ्तार किया गया.
फिलहाल मनीषा मांढरे या उनके वकीलों की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। जवाब आने के बाद तस्वीर और साफ़ हो सकती है, लेकिन फिलहाल यह मामला परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल बन चुका है।
देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा अब सिर्फ़ “पेपर लीक” का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल बन चुका है। पुणे के एक नामी कॉलेज की वरिष्ठ बॉटनी प्रोफ़ेसर मनीषा मांढरे का नाम सामने आने के बाद इस घोटाले ने और सनसनीखेज़ रूप ले लिया है।
सीबीआई के मुताबिक़, मनीषा मांढरे को नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की ओर से परीक्षा प्रक्रिया में एक्सपर्ट की भूमिका दी गई थी। यानी जिस व्यवस्था पर लाखों छात्रों के भविष्य की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी थी, उसी व्यवस्था के भीतर से अब लीक के आरोप सामने आ रहे हैं।
जांच एजेंसी का दावा है कि अप्रैल 2026 में मनीषा मांढरे ने पुणे में मनीषा वाघमारे के माध्यम से संभावित नीट उम्मीदवारों को इकट्ठा किया और अपने घर पर “विशेष क्लास” चलाई। इन क्लासों में कथित तौर पर बॉटनी और ज़ूलॉजी के वे सवाल समझाए गए, जो बाद में 3 मई 2026 को हुई नीट यूजी परीक्षा में लगभग उसी रूप में दिखाई दिए। छात्रों को सवाल नोटबुक में लिखने और किताबों में मार्क करने तक के निर्देश दिए गए थे।
सवाल यह है कि अगर जांच के दावे सही हैं, तो क्या अब मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं मेहनत से ज़्यादा “नेटवर्क” और “पहुंच” का खेल बनती जा रही हैं? लाखों छात्र सालों की मेहनत करते हैं, लेकिन हर नए खुलासे के साथ उनकी मेहनत और भरोसा दोनों कटघरे में खड़े दिखाई दे रहे हैं।
सीबीआई ने अब तक दिल्ली, जयपुर, गुरुग्राम, नासिक, पुणे और अहिल्यानगर समेत छह शहरों में छापेमारी कर कई दस्तावेज़, लैपटॉप, बैंक स्टेटमेंट और मोबाइल फ़ोन ज़ब्त किए हैं। मामले में कुल नौ लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है, जिनमें से पांच को सात दिन की सीबीआई हिरासत में भेजा गया है।
नीट विवाद अब केवल एक आपराधिक जांच नहीं, बल्कि उस शिक्षा व्यवस्था की परीक्षा बनता जा रहा है जो हर साल करोड़ों युवाओं को “मेरिट” और “ईमानदारी” का सपना दिखाती है।
नीट पेपर लीक मामले ने अब शिक्षा व्यवस्था के भीतर की चुप्पियों और “गोपनीय तंत्र” पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस कॉलेज में मनीषा मांढरे पिछले 24 वर्षों से प्रोफ़ेसर थीं, वहां की प्रिंसिपल डॉ. निवेदिता एकबोटे ने भी खुद को इस पूरे विवाद से लगभग अनजान बताया है।
समाचार एजेंसी से बातचीत में डॉ. एकबोटे ने कहा कि उन्हें मनीषा मांढरे की गिरफ़्तारी की जानकारी मीडिया के ज़रिए मिली। उनके मुताबिक़, मांढरे एनटीए के साथ “गोपनीय शर्तों” के तहत जुड़ी हुई थीं और कॉलेज प्रशासन को नीट परीक्षा या प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया की कोई जानकारी नहीं थी।
हालांकि, यही बयान अब नए सवाल पैदा कर रहा है। अगर किसी वरिष्ठ प्रोफ़ेसर को राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा से जुड़ी इतनी संवेदनशील ज़िम्मेदारी दी गई थी, तो क्या संस्थान पूरी तरह अंजान रह सकता है? या फिर “गोपनीयता” के नाम पर जवाबदेही की दीवारें इतनी ऊंची बना दी गई थीं कि किसी को कुछ पता ही न चले?
प्रिंसिपल ने यह भी बताया कि मनीषा मांढरे सात महीने बाद रिटायर होने वाली थीं। लेकिन रिटायरमेंट से पहले सामने आया यह विवाद अब केवल एक प्रोफ़ेसर की गिरफ़्तारी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे परीक्षा तंत्र की पारदर्शिता पर सवाल बन चुका है।
सीबीआई की जांच में अब तक दिल्ली, जयपुर, गुरुग्राम, नासिक, पुणे और अहिल्यानगर से कुल नौ लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है। इनमें कथित “मास्टरमाइंड” पीवी कुलकर्णी के अलावा मनीषा वाघमारे का नाम भी शामिल है, जिन पर संभावित उम्मीदवारों को जुटाने और कथित विशेष क्लासों के आयोजन में भूमिका निभाने का आरोप है।
उधर, लगातार बढ़ते विवाद और भरोसे के संकट के बीच नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने सरकार की मंज़ूरी के बाद 21 जून को नीट 2026 की दोबारा परीक्षा कराने का फैसला किया है। लेकिन बड़ा सवाल अब भी वही है — क्या दोबारा परीक्षा से सिर्फ़ पेपर बदलेगा, या व्यवस्था भी बदलेगी?
नीट पेपर लीक मामले की परतें खुल रही हैं और हर नए खुलासे के साथ यह घोटाला केवल “कुछ लोगों की साज़िश” नहीं, बल्कि शिक्षा और कोचिंग के धंधे में पनपते एक पूरे नेटवर्क की तस्वीर पेश करता दिख रहा है।
सीबीआई की औपचारिक जांच शुरू होने से ठीक एक दिन पहले महाराष्ट्र में जिस नाम ने सबसे ज़्यादा हलचल मचाई, वह था नासिक के 30 वर्षीय शुभम खैरनार का। पुलिस के मुताबिक़, नीट परीक्षा का कथित प्रश्नपत्र नासिक के एक टेलीग्राम ग्रुप तक पहुंचा था, जिसके बाद 12 मई 2026 को शुभम को गिरफ़्तार कर सीबीआई के हवाले कर दिया गया।
जांच एजेंसी का दावा है कि शुभम खैरनार को 29 अप्रैल 2026 को धनंजय लोखंडे से प्रश्नपत्र की पीडीएफ़ मिली थी, जिसे उसने आगे यश यादव समेत कई लोगों तक पहुंचाया। सीबीआई के अनुसार, मांगीलाल खटीक, विकास बिवल और दिनेश बिवल को भी वही पेपर साझा किया गया था।
सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह है कि शुभम नासिक में “एसआर एजुकेशन कंसल्टेंसी” नाम से कारोबार चला रहा था। यानी मेडिकल प्रवेश परीक्षा के सपनों के बीच अब “कंसल्टेंसी”, “नेटवर्क” और “लीक चैनल” जैसे शब्द भी खुलकर सामने आने लगे हैं।
परिवार की ओर से दावा किया गया कि शुभम तीसरे वर्ष का मेडिकल छात्र है और प्रैक्टिस भी करता है। लेकिन जब बीबीसी मराठी ने इसकी पड़ताल की, तो सीहोर स्थित सत्य साई यूनिवर्सिटी प्रशासन ने साफ़ कहा कि शुभम ने दाखिला तो लिया था, मगर उसने पढ़ाई का एक भी वर्ष पूरा नहीं किया।
यानी जिस व्यक्ति को “डॉक्टर” बताकर पेश किया जा रहा था, उसकी शैक्षणिक सच्चाई ही सवालों के घेरे में आ गई। यह मामला अब केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि उस माहौल की ओर इशारा करता है जहां “डिग्री”, “कोचिंग” और “मेडिकल करियर” के नाम पर भ्रम और कारोबार साथ-साथ चल रहे हैं।
नीट विवाद अब लाखों मेहनती छात्रों के मन में एक असहज सवाल छोड़ रहा है — क्या परीक्षा में सफलता अब किताबों से तय होगी, या संपर्कों और बंद कमरों में चलने वाले नेटवर्क से?
