क्यों पहुँचे 21 मीडिया संस्थान सुप्रीम कोर्ट

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मीडिया संस्थान
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क्या भ्रष्टाचार की पड़ताल करने से पहले पत्रकारों को आरोपी की अनुमति लेनी होगी?

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून को चुनौती; मीडिया संगठनों ने खोजी पत्रकारिता, गोपनीय सूत्रों और सूचना के अधिकार पर जताई चिंता, केंद्र से 17 नवंबर तक जवाब तलब

प्रेस की आज़ादी पर डिजिटल निजता कानून का साया? 21 मीडिया संस्थान सुप्रीम कोर्ट पहुँचे

नई दिल्ली, 29 अक्टूबर 2026।

भारत में डिजिटल निजता की सुरक्षा और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच टकराव का एक अहम मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है। देश के 21 समाचार प्रकाशकों ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 और इससे जुड़े 2025 के नियमों के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी है। मीडिया संगठनों का तर्क है कि कानून में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट नहीं होने से खोजी पत्रकारिता, भ्रष्टाचार की पड़ताल और जनहित से जुड़ी खबरों के प्रकाशन पर गंभीर असर पड़ सकता है।

27 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। अदालत ने विवादित प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने की मांग पर भी नोटिस जारी किया और मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर के लिए सूचीबद्ध की। अदालत ने अभी कानून की संवैधानिक वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है और न ही मांगी गई अंतरिम रोक मंज़ूर की है।

मीडिया संस्थानों की मुख्य आपत्ति क्या है?

डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी गोराडिया दिवान ने अदालत में दलील दी कि यदि पत्रकारों को किसी व्यक्ति के बारे में खबर प्रकाशित करने से पहले उसकी सहमति लेनी पड़े, तो कई महत्वपूर्ण खबरों की पड़ताल ही बाधित हो सकती है।

मान लीजिए, किसी मंत्री, सरकारी अधिकारी या कारोबारी पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। पत्रकार दस्तावेज़ जुटाता है, संबंधित लोगों से बातचीत करता है और वित्तीय लेन-देन की पड़ताल करता है। यदि जांच के दौरान ही संबंधित व्यक्ति को सूचना देकर उसकी सहमति लेना अनिवार्य हो, तो याचिकाकर्ताओं के अनुसार, सबूत नष्ट किए जाने, गवाहों पर दबाव पड़ने या जांच की जानकारी लीक होने का जोखिम पैदा हो सकता है।

मीडिया संगठनों ने अदालत में चेतावनी दी कि इस तरह की व्यवस्था खोजी पत्रकारिता को कमजोर कर सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि गलत या मानहानिकारक खबर के लिए कानून के तहत जवाबदेही तय की जा सकती है, लेकिन खबर प्रकाशित होने से पहले ही ऐसी बाधाएँ खड़ी करना प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि पत्रकारों की सहमति संबंधी आपत्ति कानून की व्याख्या और उसके संभावित प्रभावों को लेकर है। इसका अर्थ यह नहीं कि कानून के तहत प्रकाशित हर जानकारी के लिए हर परिस्थिति में सहमति लेना अनिवार्य है; अधिनियम में कुछ अपवाद और विशेष प्रावधान भी हैं।

गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा पर चिंता

खोजी पत्रकारिता में कई बार ऐसे लोग महत्वपूर्ण दस्तावेज़ और सूचनाएँ उपलब्ध कराते हैं, जो अपनी पहचान सार्वजनिक होने पर नौकरी, सुरक्षा या कानूनी कार्रवाई का जोखिम उठा सकते हैं। इनमें सरकारी विभागों के कर्मचारी, व्हिसलब्लोअर और संस्थानों के अंदर की जानकारी रखने वाले लोग शामिल हो सकते हैं।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कानून के तहत सरकार को डेटा रखने वाले संस्थानों से जानकारी माँगने की जो शक्तियाँ दी गई हैं, उनके दायरे और सुरक्षा उपायों को लेकर पर्याप्त स्पष्टता होनी चाहिए। मीडिया संगठनों को आशंका है कि इन शक्तियों के इस्तेमाल से पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों की पहचान उजागर होने का जोखिम बढ़ सकता है।

हालाँकि, यह अभी याचिकाकर्ताओं की आशंका है। अदालत ने इस मुद्दे पर अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।

क्या खबरें हटाने की नौबत आ सकती है?

मीडिया संगठनों की एक और चिंता व्यक्तिगत डेटा मिटाने के अधिकार को लेकर है। कानून के तहत संबंधित व्यक्ति कुछ परिस्थितियों में अपने डेटा को मिटाने की मांग कर सकता है। प्रकाशकों का तर्क है कि यदि इन प्रावधानों का व्यापक इस्तेमाल समाचार अभिलेखों पर किया गया, तो जनहित में प्रकाशित पुरानी खबरों को हटाने या उनमें संशोधन करने का दबाव बन सकता है।

उदाहरण के तौर पर, किसी सार्वजनिक अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच से जुड़ी तथ्यात्मक खबर प्रकाशित हुई हो। यदि बाद में संबंधित व्यक्ति निजी जानकारी हटाने की मांग करता है, तो सवाल उठ सकता है कि उसकी निजता और जनता के जानने के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

यहाँ भी फर्क समझना आवश्यक है: कानून में डेटा मिटाने का अधिकार अपने-आप हर समाचार को हटाने का आदेश नहीं बन जाता। विवाद इस बात पर है कि जनहित में पत्रकारिता को स्पष्ट सुरक्षा न मिलने से भविष्य में इन अधिकारों की व्याख्या किस तरह होगी।

RTI कानून में संशोधन भी विवाद के केंद्र में

इस मुकदमे में सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) से संबंधित संशोधन को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, व्यक्तिगत जानकारी के अपवाद को व्यापक बनाने से सरकारी अधिकारियों और सार्वजनिक संस्थानों की जवाबदेही से जुड़ी जानकारी प्राप्त करना कठिन हो सकता है।

पत्रकारिता और RTI का संबंध महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकारी खर्च, नियुक्तियों, प्रशासनिक फैसलों और कथित अनियमितताओं की पड़ताल में सूचना का अधिकार लंबे समय से उपयोगी साधन रहा है।

दूसरी ओर, व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा भी नागरिकों का अधिकार है। किसी व्यक्ति की संवेदनशील निजी जानकारी को केवल इसलिए सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए कि वह किसी दस्तावेज़ में मौजूद है। असली कानूनी सवाल यह है कि निजता की रक्षा करते हुए सार्वजनिक जवाबदेही और जनहित में सूचना तक पहुँच कैसे सुनिश्चित की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि नागरिकों की निजता और मीडिया की स्वतंत्रता—दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है। अदालत ने प्रकाशकों से यह भी सुझाव देने को कहा कि कानून के दुरुपयोग को रोकने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कौन-से सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं।

इससे संकेत मिलता है कि अदालत के सामने केवल मीडिया की आपत्तियाँ ही नहीं, बल्कि पत्रकारिता और व्यक्तिगत निजता के बीच व्यावहारिक संतुलन स्थापित करने का सवाल भी है।

सरकार का पक्ष क्या है?

केंद्र सरकार ने डिजिटल निजता कानून का उद्देश्य नागरिकों के व्यक्तिगत डिजिटल डेटा को सुरक्षित करना और उसके दुरुपयोग पर रोक लगाना बताया है। 28 अक्टूबर को केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि सरकार मीडिया संगठनों की चिंताओं को सुनेगी और संवैधानिक रूप से संरक्षित पत्रकारिता की स्वतंत्रता को कमजोर करने का उसका कोई इरादा नहीं है। उन्होंने संपादकों और मीडिया संस्थानों से सुझाव देने की अपील भी की।

मीडिया संगठनों का कहना है कि केवल मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं; पत्रकारिता के लिए स्पष्ट और लिखित सुरक्षा प्रावधान होने चाहिए। इसीलिए वे अदालत से विवादित प्रावधानों की संवैधानिक समीक्षा और आवश्यक राहत की मांग कर रहे हैं।

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से 17 नवंबर तक जवाब माँगा है। अगली सुनवाई में कानून की व्याख्या, पत्रकारिता के लिए छूट और अंतरिम राहत की मांग पर आगे की कार्यवाही हो सकती है। अभी यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि अदालत कानून को रद्द करेगी, उसमें बदलाव का निर्देश देगी या किसी अन्य समाधान तक पहुँचेगी।

निष्कर्ष: निजता भी ज़रूरी, प्रेस की आज़ादी भी

डिजिटल युग में नागरिकों की निजी जानकारी की रक्षा करना सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। लेकिन लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता का दायित्व भी उतना ही अहम है—विशेषकर तब, जब सवाल सत्ता, भ्रष्टाचार, सार्वजनिक धन या सरकारी जवाबदेही से जुड़ा हो।

इस मामले का केंद्रीय प्रश्न यही है: क्या ऐसा कानूनी ढाँचा बनाया जा सकता है जो नागरिकों की निजता सुरक्षित रखे, लेकिन पत्रकारों को जनहित के मुद्दों की निष्पक्ष पड़ताल करने से भी न रोके? 17 नवंबर की सुनवाई इस बहस में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव होगी।

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