अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव को कम करने और कूटनीतिक प्रयासों को नई गति देने की कोशिशों के बीच पाकिस्तान ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व को वार्ता के लिए आमंत्रित किया है।
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने सोमवार देर रात जारी बयान में बताया कि विदेश मंत्री इशाक़ डार ने अपने ईरानी समकक्ष अब्बास अराग़ची से टेलीफोन पर बातचीत की। इस दौरान उन्होंने अराग़ची को जल्द से जल्द पाकिस्तान आने का निमंत्रण दिया, ताकि दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय वार्ता आगे बढ़ाई जा सके और क्षेत्रीय हालात पर चर्चा हो सके।
इस बीच, सरकारी सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के स्पीकर अयाज़ सादिक़ ने भी ईरानी संसद के अध्यक्ष और प्रमुख वार्ताकार मोहम्मद बाक़िर क़ालीबाफ़ को पाकिस्तान आने का निमंत्रण दिया है।
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान के ये दोनों वरिष्ठ अधिकारी कब और क्या वास्तव में इस्लामाबाद का दौरा करेंगे।
पाकिस्तान की यह कूटनीतिक पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के नेतृत्व पर शांति वार्ता को लेकर दोहरा रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। ट्रम्प ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर लिखा कि तेहरान पहले बातचीत की इच्छा जताता है, बैठकें तय होती हैं, लेकिन बाद में सार्वजनिक रूप से यह कह देता है कि अमेरिका के साथ कोई वार्ता ही नहीं चल रही।
पत्रकारों से बातचीत में ट्रम्प ने इसे ईरान के लिए “आख़िरी अवसर” बताते हुए कहा कि तेहरान को एक “अच्छे समझौते” पर हस्ताक्षर करने होंगे, अन्यथा उसे गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने एक बार फिर चेतावनी दी कि ईरान के सामने केवल दो ही विकल्प हैं—समझौता या पूर्ण समर्पण।
उधर ईरान ने अमेरिकी दावों को खारिज कर दिया है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ किसी भी तरह की शांति वार्ता नहीं चल रही है। उनके अनुसार, फ़िलहाल ओमान के साथ केवल तकनीकी स्तर पर बातचीत हो रही है, जिसका उद्देश्य रणनीतिक महत्व वाले होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करना है। सामान्य परिस्थितियों में दुनिया के लगभग पाँचवें हिस्से का समुद्री तेल व्यापार इसी जलमार्ग से होकर गुजरता है।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में दोहराया कि अमेरिका-ईरान वार्ता में पाकिस्तान अब भी प्रमुख मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है, जबकि ज़रूरत पड़ने पर क़तर सहयोग देने के लिए तैयार है।
28 फ़रवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से पाकिस्तान का आधिकारिक रुख़ लगभग एक जैसा रहा है। इस्लामाबाद लगातार दोनों पक्षों से संयम बरतने, तनाव कम करने और विवाद का समाधान बातचीत तथा कूटनीति के ज़रिये निकालने की अपील करता रहा है।
इसी कूटनीतिक पहल के तहत अप्रैल में पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच कई दशकों बाद पहली प्रत्यक्ष वार्ता की मेज़बानी की थी। इन वार्ताओं का परिणाम जून में “इस्लामाबाद समझौता ज्ञापन (Islamabad Memorandum of Understanding–MoU)” के रूप में सामने आया, जिस पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हस्ताक्षर किए थे।
हालांकि, तनाव कम करने की हर कोशिश कुछ ही समय बाद विफल होती चली गई। अप्रैल में हुआ युद्धविराम कुछ दिनों में टूट गया, जिसके बाद अमेरिका ने ईरान के दक्षिणी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी फिर शुरू कर दी। वहीं, इस्लामाबाद एमओयू भी मुश्किल से एक महीने ही प्रभावी रह सका और दोनों देशों के बीच दोबारा सैन्य टकराव शुरू हो गया।
जुलाई के दौरान पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी लगातार यह कहते रहे कि इस्लामाबाद एमओयू ही शांति बहाली का सबसे महत्वपूर्ण आधार बना हुआ है, भले ही उसके तहत प्रस्तावित युद्धविराम कई बार टूट चुका हो।
इस सप्ताह ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने भी कहा कि यह समझौता भविष्य में ईरान की विदेश नीति का “केंद्रीय आधार” बनेगा। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि विरोधी पक्ष को इस समझौते का पालन करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे ईरान, पूरे क्षेत्र और उसके सहयोगियों की सुरक्षा मज़बूत होगी।
पाकिस्तान के पूर्व राजदूत आसिफ़ दुर्रानी ने अल जज़ीरा से कहा कि यह समझौता समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि भविष्य की शांति प्रक्रिया की बुनियादी दस्तावेज़ है। उनके अनुसार, पाकिस्तान ने केवल एक ईमानदार मध्यस्थ की भूमिका निभाई है और उसकी इस भूमिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार किया गया है।
वहीं, जर्मन मार्शल फ़ंड की वरिष्ठ शोधकर्ता और अमेरिका की पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी ग्रेस वर्मेनबोल का मानना है कि बार-बार युद्धविराम टूटने की असली वजह दोनों पक्षों के बीच गहराता अविश्वास है। उनके अनुसार, लगातार संघर्ष ने स्थायी शांति के लिए ज़रूरी भरोसे को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया है।
उधर, क़तर स्थित जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मेहरान कमरावा का कहना है कि इन विफलताओं के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता को दोष नहीं दिया जा सकता। उनके मुताबिक़, अमेरिका के पास न तो कोई स्पष्ट रणनीति है, न अंतिम लक्ष्य तय है और न ही वह यह स्पष्ट कर पा रहा है कि इस संघर्ष का अंत किस रूप में चाहता है।
उनका यह भी कहना है कि ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपना रणनीतिक प्रभाव बनाए रखना चाहता है, लेकिन वह यह लक्ष्य ओमान और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के अन्य देशों की सहमति या सहयोग के बिना हासिल नहीं कर सकता।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा गतिरोध की असली वजह मध्यस्थता की विफलता नहीं, बल्कि संघर्ष से बाहर निकलने की स्पष्ट रणनीति का अभाव है।
एक विशेषज्ञ के अनुसार, “समस्या की जड़ मध्यस्थता की नाकामी नहीं, बल्कि इस युद्ध से निकलने के लिए किसी ठोस और स्पष्ट योजना का न होना है।”
हालांकि, तेहरान स्थित अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक सैयद मोजतबा जलालज़ादेह का मानना है कि लगातार असफल होती शांति कोशिशों ने पाकिस्तान की भूमिका को कमजोर किया है। उनके अनुसार, पाकिस्तान अब ऐसे मध्यस्थ के रूप में नहीं देखा जा रहा जो विवाद का समाधान करा सके, बल्कि उसकी भूमिका अब केवल दोनों पक्षों के बीच संपर्क स्थापित कराने वाले एक ‘सुविधाकर्ता (Facilitator)’ तक सीमित होती जा रही है।
जलालज़ादेह का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच प्रत्यक्ष संवाद का कोई प्रभावी माध्यम नहीं होने के कारण पाकिस्तान की यह भूमिका अब भी महत्वपूर्ण है। लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि यह भरोसा हमेशा कायम नहीं रहेगा।
उनके शब्दों में, “अगर पाकिस्तान अपनी क्षमता से अधिक वादे करता है और उन्हें पूरा नहीं कर पाता, तो लंबे समय में उसकी अंतरराष्ट्रीय साख और विश्वसनीयता भी प्रभावित हो सकती है।”
CURTESY: AL Jazeera
