क्या लिखूं ? आप ही बतादो !!

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मुझसे कहा जाता है कि , सब कुछ खराब नही कुछ अच्छा भी हो रहा है , उस पर भी लिखा करो!!! 
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आप ही एक नज़र डाल लें ।।

दबाव में काम कर रहे पत्रकार इस्तीफ़ा दे रहे हैं,सच्ची बात लिखने या बोलने पर क़त्ल कराया जा रहा है ।

आज़ादी से फ़ैसला ना सुना पाने वाले जज प्रेस कॉन्फ्रेंस करने पर मजबूर हैं ।इससे भी आगे इंसाफ़ की बात कहने पर लोया जैसे जज का क़त्ल करा दिया जाता है।

अल्पसंख्यकों को राह चलते मारा जा रहा हैं,लूटपाट की जारही है ।लुटेरों और कातिलो को सरकारी संरक्षण मिल रहा है । अधिकार मांगने वालों को धमकियां मिल रही हैं।

दलितों के साथ अत्याचार हो रहा हैं,घर जलाये जा रहे हैं  ।दलित और पिछड़ा वर्ग के लोगों को मंदिरों में जाने पर पाबंदी लगी हुई है। अधिकार मांगने वालों को लठियाया जारहा है। आप कहते हो सब ठीक चल रहा है।

छात्रों पर लाठीचार्ज हो जाता है,छात्र आत्महत्यायें कर रहे हैं। छात्रों को आये दिन जात धर्म के नाम पर प्रताड़ना दी जाती हैं। आप कहते हो सब ठीक चल रहा है।

देश भर में किसान आत्महत्या कर रहे हैं,देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ की जंतर मंतर पर उत्तरी भारत के किसानो ने नग्न होकर अनशन किया ।किसान क़र्ज़ों में डूबा जारहा है .

पीड़ित महिलाएं मुंडन कराने को मजबूर हैं।दादरी में एक दलित परिवार की महिलाओं ने अपने वस्त्र कयों उतार दिए ,आपने जाकर पूछा उनसे?आप कहते हो सब ठीक चल रहा है।

बच्चियों का जिस्म नोचा जा रहा हैं,शेल्टर होम के नाम पर मासूमो के साथ अमानवीय व्यवहार होरहा है ।आये दिन मासूम बच्चों के साथ मुंह काला करा रहे हैं दरिन्दे।जिसमें खुद सत्ताधारी पार्टी के नेता आये दिन गिरफ़तार होरहे हैं , और दुसरे आम लोग तो जो कररहे हैं वो है ही । आप कहते हो सब ठीक चल रहा है।

बलात्कारियों के खिलाफ कुछ नही बोलकर लोग अप्रत्यक्ष रूप से डिफेंड कर रहे हैं कुछ तो उनके समर्थन में  खुलकर सामने आ रहे है , बलात्कारियों के समर्थन में सत्ता में बैठे लोग सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कररहे हैं , उनको रिहाई के लिए नारे बाज़ी कररहे हैं , और साथ में श्री राम को भी बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं . इसमें क्या अच्छा चल रहा है आप ही बताइये ? ??

 

हमें क्षमा करें , आपके विचारों में या आपके परिवार में सब कुछ ठीक चल रहा होगा किन्तु देश में सब कुछ तो ठीक नहीं चल रहा है। खुद सत्ता धारी पार्टी के समर्थक और कार्येकर्ता आये दिन शिकायत कररहे हैं कि हमारी कोई बात सुनता नहीं , कल तक जो सत्ताधारी पार्टी को अच्छा कहते थे या उनके भक्त भी थे आज वही नीतियों सरकारी कई नीतियों के खिलाफ मुखर होकर बोल रहे हैं ।कई पुराने कद्दावर नेता सत्ताधारी पार्टी छोड़ चुके हैं .ऐसे क्या सब कुछ अच्छा चल रहा है ?हमने माना कुछ स्वार्थी भी होसकते हैं उनमें …

पार्टी में बग़ावत है , हालांकि बाग़ी भी कोई 100 % देश प्रेम में नहीं बल्कि स्वार्थ के चलते भी आवाज़ उठा रहे हैं किन्तु अधिकतर सच्चाई के साथ हैं . इस पूरे घटनाक्रम में एक अच्छी बात यह है देश में 70 % अवाम अभी भी न्यूट्रल है जो बहुत अच्छी बात तो नहीं मगर अच्छी बात ज़रूर है .देश में अक्सर अघोषित आपातकाल की बात उठ रही है .यह स्वम सत्तारूढ़ पार्टी के लिए या NDA घटक के सहयोगियों के लिए भी ठीक नहीं है .

परोक्ष रूप से लोकतान्त्रिक और संवैधानिक आधारों पर 60 वर्षों से चलने वाली कांग्रेस को देश की जनता ने नकार दिया , तो आज अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक कई नीतियों के चलते देश की जनता भला कैसे 10 वर्ष झेल सकती है ।हद्द तो अब यह होगई सत्ताधारी पार्टी के नेता और कुछ समर्थक संस्थाओं ने खुले आम संविधान को न मानने का ऐलान कर दिया , और समाचारों के अनुसार आग लगादी गयी . बताएं जब संविधान को ही आग लगाडी जायेगी तो फिर क्या अच्छा चल रहा है देश में आप ही निष्पक्ष होकर बतादें .

 

अपने लेखों और समाचारों के माध्यम से मेरी पूरी कोशिश होती है कि देश में एकता अखंडता , शान्ति और अम्न का सन्देश पहुँचाया जाए और सरकार की सकारात्मक नीतियों को भी जनता के सामने लाया जाए . किन्तु एक के बाद दूसरी ऐसी घटनाएं हुए जाती हैं की देश की जनता को समझाना मुश्किल लगता है .

हमको जिस काम की ज़िम्मेदारी जनता ने दी है उसको ईमानदारी और निष्ठा के साथ पूरा किया जाए अन्यथा देश और जनता के साथ न इंसाफ़ी होगी .

ऐसी नीतियां जो जनता और देश मुखालिफ होती हों उनकी आलोचना एक पत्रकार कि ज़िम्मेदारी में आता है ,सरकारी योजनाओं और नीतियों के विज्ञापन के लिए सरकारी एजेंसियां और दूर संचार और समाचार पत्रों का माध्यम सक्षम होता है और उनका २४*७ यही काम होता है कि वो जनता तक सकारात्मक ढंग से सरकारी उपलब्धियों को पहुंचाए .यदि निजी चैनल और समाचार पात्र भी यही काम करने लग जाते हैं तो यह पत्रकारिता के शरीर से रूह निकल जाने जैसा होता है और जब जिस्म से रूह निकल जाती है तो जिस्म बदबू दार होजाता है और सड़ने लगता है , लगभग आज यही हाल पूरी दुनिया कि प्राइवेट मीडिया का होगया है.

सरकारी योजनाओं द्वारा जब कुछ फ़र्ज़ी लाभार्थियों से मुनाफा दुगना होजाने का झूठ बुलवाया जायेगा तो इस पर रविश कुमार ,प्रसून वाजपेयी ,अभिसार शर्मा और विनोद दुआ जैसे ईमानदार पत्रकार तो अपनी जुबां खोलेंगे ही , क्योंकि इनका ज़मीर गवारा ही नहीं करेगा इस सबको . अब इनको ससपेंड कराओ, धमकियाँ दिलाओ ,गालियां पड़वाओ या लम्बी छुट्टियों पर भिजवाओ , जो चाहो करो . फ़र्ज़ के तईं इनकी यही वफ़ादारी है .

देश के बुनयादी मुद्दों सेहत , शिक्षा , पानी , बिजली , सड़कें , स्वच्छ वातावरण , सांप्रदायिक सद्भाव , आपसी बराबरी , आदि पर अभी तक सत्ता पक्ष संवेदनशील नज़र नहीं आई है . फ़िज़ूल तर्क वितर्क और क्रिया प्रतिकिर्या का खेल सत्ता और विपक्ष के बीच चल रहा , जनता परेशान है , विकास के नाम पर भोंपू बज रहा है . क़ानून की सरे आम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं . एक धर्म विशेष और जाती विशेष पर ज़ुल्म हो रहे है , संविधान खत्म किया जारहा है .बहाने बहाने से वर्ग और समुदाय विशेष के नौजवानो की गिरफ्तारियां करके डर का माहौल पैदा किया जारहा है .मनमानी हो रही है . यह ज़्यादा दिन तक पार्टियों के सत्ता में बने रहने के लक्षण नहीं हैं .

हम यह बार बार कह रहे हैं कि देश के वर्तमान हालात न सिर्फ देश और जनता के लिए ठीक नहीं हैं बल्कि खुद सत्तारूढ़ पार्टियों के भी पक्ष में नहीं हैं , क्योंकि जहाँ इन्साफ नहीं होता उसके बाद न शान्ति का वुजूद रह पाता है और न विकास का और न ही सत्ताधारी पार्टियों का .Editor ‘ s Desk

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