पाली में 17 साल बाद कांग्रेस की वापसी

पाली, 14 सितंबर । पाली नगर निगम चुनाव 2026 के परिणामों ने शहर की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। करीब 17 साल बाद कांग्रेस नगर निगम में अपना बोर्ड बनाने की स्थिति में पहुंची है। 65 वार्डों में कांग्रेस ने 29 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि भाजपा 21 वार्डों में सिमट गई।

निर्दलीय प्रत्याशियों ने 15 सीटों पर जीत हासिल कर दोनों प्रमुख दलों के बीच सत्ता की चाबी अपने हाथों में रख ली है। बोर्ड बनाने के लिए 33 पार्षदों का समर्थन चाहिए। ऐसे में कांग्रेस को बहुमत से केवल चार सीटों की दरकार है, जबकि भाजपा को 12 निर्दलीय पार्षदों का साथ जुटाना होगा।

आंकड़ों के लिहाज से कांग्रेस का बोर्ड बनना फिलहाल ज्यादा आसान नजर आ रहा है, लेकिन अंतिम सियासी तस्वीर निर्दलीयों के रुख पर निर्भर करेगी।

पाली के चुनाव परिणामों में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि भाजपा को कांग्रेस से अधिक वोट मिले हैं, लेकिन सीटों के मामले में वह पीछे रह गई। भाजपा को कुल 45,911 वोट मिले, जो 35.62 प्रतिशत हैं। कांग्रेस को 43,660 वोट मिले और उसका मत प्रतिशत 33.87 रहा।

निर्दलीय प्रत्याशियों ने 37,910 वोट हासिल किए, जो कुल मतदान का 29.41 प्रतिशत है। इस तरह निर्दलीयों की मजबूत वोट हिस्सेदारी ने चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया और किसी भी प्रमुख दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाया।

यह परिणाम बताता है कि अधिक वोट प्रतिशत हमेशा अधिक सीटों में नहीं बदलता।

भाजपा का मत प्रतिशत बढ़ने के बावजूद वह 21 वार्डों पर रुक गई, जबकि कांग्रेस ने कम वोट प्रतिशत के साथ 29 सीटें जीत लीं। वार्डवार मुकाबलों, स्थानीय समीकरणों और निर्दलीय उम्मीदवारों के प्रभाव ने इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाई।

पाली नगर निगम में महापौर पद महिला के लिए आरक्षित है। कांग्रेस 29 सीटों के साथ बहुमत से चार कदम दूर है। यदि उसे चार पार्षदों का समर्थन मिल जाता है, तो 33 का आंकड़ा पूरा हो जाएगा। दूसरी ओर भाजपा के पास 21 सीटें हैं और उसे बहुमत के लिए 12 निर्दलीयों का समर्थन जुटाना होगा। यही वजह है कि निर्दलीय पार्षद इस चुनाव के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक किरदार बनकर उभरे हैं।

कांग्रेस विधायक भीमराज भाटी ने चुनाव परिणामों के बाद कहा कि 15 निर्दलीयों में भी कांग्रेस से जुड़े लोग हैं और वे कांग्रेस को समर्थन देंगे। कांग्रेस नेता महावीर सिंह सुकरलाई ने भी भाजपा के खिलाफ जनादेश बताते हुए कांग्रेस का बोर्ड बनने का दावा किया।

हालांकि, निर्दलियों के समर्थन को लेकर अंतिम निर्णय और औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही बोर्ड गठन की तस्वीर स्पष्ट होगी। भाजपा भी जोड़-तोड़ के जरिए सत्ता हासिल करने का दावा करती है तो मुकाबला और रोचक हो सकता है।

महापौर पद महिला के लिए आरक्षित होने के चलते कांग्रेस में तीन नाम प्रमुखता से चर्चा में हैं। वार्ड 38 से जीत दर्ज करने वाली राजबाला प्रदीप हिंगड़ को प्रबल दावेदार माना जा रहा है। उन्होंने भाजपा की नयनश्री जैन को 949 वोटों के बड़े अंतर से हराया। राजबाला पूर्व सभापति एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता प्रदीप हिंगड़ की पत्नी हैं। पार्टी में उनके राजनीतिक संपर्क और स्थानीय प्रभाव को देखते हुए उनका नाम महापौर की दौड़ में आगे बताया जा रहा है।

वार्ड 34 से कांग्रेस की सुमित्रा जैन ने जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस से बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले अभिषेक चौपड़ा को 291 वोटों से हराया। चुनाव के दौरान उन पर बाहरी प्रत्याशी होने का आरोप लगा, लेकिन उन्होंने स्थानीय समीकरणों को अपने पक्ष में करते हुए जीत हासिल की। कांग्रेस प्रदेश कार्यकारिणी और जिला स्तरीय संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुकीं सुमित्रा जैन भी महापौर पद की दावेदार मानी जा रही हैं।

वार्ड 39 से कांग्रेस की अनामिका सोलंकी ने भाजपा के पीयूष शर्मा को महज 12 वोटों से हराकर महत्वपूर्ण जीत दर्ज की।

यह वार्ड भाजपा के मजबूत प्रभाव वाला माना जाता है और यहां भाजपा जिलाध्यक्ष सुनील भंडारी भी रहते हैं। पेशे से अधिवक्ता और कांग्रेस शहर अध्यक्ष अनामिका सोलंकी की जीत ने उनकी दावेदारी को मजबूत किया है। कांग्रेस विधायक और जिलाध्यक्ष के करीबी माने जाने के कारण उनका नाम भी महापौर पद की दौड़ में प्रमुखता से लिया जा रहा है।

पाली की निकाय राजनीति में पिछले करीब 53 वर्षों से एक दिलचस्प चुनावी प्रवृत्ति चर्चा में रही है। इसमें लगातार दो बार कांग्रेस और दो बार भाजपा के बोर्ड बनने का क्रम देखा गया है। इस बार कांग्रेस के बोर्ड बनने की स्थिति में पहुंचने से यह सियासी चक्र फिर चर्चा में आ गया है।

इससे पहले भाजपा की ओर से महेंद्र बोहरा और रेखा-राकेश भाटी के दो कार्यकाल रहे हैं। अब कांग्रेस की वापसी को इसी राजनीतिक बदलाव के संदर्भ में देखा जा रहा है।

पाली में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ना पार्टी के लिए सकारात्मक संकेत है, लेकिन 21 सीटों पर सिमटना संगठन के लिए चिंता का विषय भी है। पार्टी के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक ओर बोर्ड बनाने के लिए जरूरी निर्दलीय समर्थन जुटाना और दूसरी ओर अपने बढ़े हुए वोट प्रतिशत को भविष्य में अधिक सीटों में बदलना।

कांग्रेस के सामने भी आसान राह नहीं है, क्योंकि 29 सीटों के बावजूद उसे चार पार्षदों का समर्थन जुटाना होगा। महापौर पद के लिए दावेदारों के बीच संतुलन, निर्दलीयों का भरोसा और पार्षदों की एकजुटता उसके लिए महत्वपूर्ण होगी।

पाली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस 29 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और करीब 17 साल बाद बोर्ड बनाने की स्थिति में पहुंची है।

भाजपा को अधिक वोट मिलने के बावजूद वह 21 सीटों पर सिमट गई। 15 निर्दलीय पार्षदों की मौजूदगी ने सत्ता का अंतिम फैसला उनके हाथों में पहुंचा दिया है। कांग्रेस बहुमत से चार सीटें दूर है, जबकि भाजपा को 12 निर्दलीयों का साथ चाहिए। ऐसे में पाली में अगला महापौर कौन बनेगा, यह केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि आने वाले दिनों की सियासी रणनीति और समर्थन के गणित से तय होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.