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चलो आज हिसाब करलें !

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पार्टीशन के समय की तस्वीर याद आई आपको?

Ali Aadil Khan
Editor

कोरोना की मार के चलते समाज का एक वर्ग घरों के अंदर क़ैद हुआ तो बहुत से लोग भूक की मार से बचने के लिए घरों से बाहर आगये ,भूक से बचने और जान को बचाने के लिए इंसान किसी क़ानून को फॉलो नहीं करता . ऐसा ही देखने को मिला दिल्ली और दुसरे मेट्रो शहरों से पलायन करते हज़ारों लोगों का ग्रुप जो बस अड्डे पर इस आस में आ गया था की उनको अपने अपने शहरों को जाने के लिए बसों के मिलने का आश्वासन दिया गया था .लेकिन उनका इस तरह एक साथ निकल आना और दिल्ली तथा दुसरे मेट्रो शहरों में सरकारी दावों के बावजूद राशन का न मिलना या मिलना तो अपर्याप्त मात्रा में .

इस सम्बन्ध कुछ लोगों से पूछा गया की कहाँ और क्यों जा रहे हैं तो …..इसके बाद उन्होंने कहा कि वे एटा , अलीगढ , देवरिया ,कानपूर, मोरादाबाद , (यूपी) पैदल ही जा रहे हैं. भीड़ में कुछ लोग ऐसे भी थे जो दिल्ली से बिहार तक पैदल चले जाने की बातें कर रहे थे.

शुक्रवार की रात भी कई सौ रेहड़ी-रिक्शे वाले दिल्ली बॉर्डर पार कर गए. हर रेहड़ी पर कुछ सामान और उसके ऊपर बैठे कुछ लोग. कुछ ने अपने रिक्शा में स्कूटर का ही इंजन फिट कर बना लिया था जुगाड़ , आखिर पहुंचना जो था उनको अपनी मंज़िल पे , हालांकि ये लोग अपनी मंज़िल पर पहुँचते पहुँचते कितने लोगों को उस मंज़िल पर पहुंचा देंगे जहाँ वो अभी नहीं जाना चाहते थे .

ये दृश्य पार्टीशन के समय के उन ब्लैक एंड व्हाइट चलचित्रों से बहुत मिलता-जुलता लगा जिनमें हमने मजबूर लोगों के काफ़िलों को एक से दूसरी जगह कूच करते तस्वीरों में अक्सर देखा था .पलायन का एक वो दौर था जब लोग मर्ज़ी से अपना देश चुन रहे थे , एक आजका भी पलायन है जब लोग मजबूरी से अपने घरों को चुन रहे हैं . विभिन्नताओं के बावजूद बहुत कुछ सामान था ,और पार्टीशन के समय की पीड़ा और कश्मीर के lockdown तथा पंडितों के पलायन को भी महसूस करने का अवसर लगभग देश के हर नागरिक को महसूस करने अवसर कोरोना के बहाने ही सही , पर मिल गया .

लेकिन दोस्तों जिन हालात में, जिन रास्तों पर ये लाखों लोग लोग निकल पड़े हैं, इन्हें तो रोकना बहुत मुश्किल लगता है , लेकिन अगर कोरोना वाक़ई हाथ तक मिलाने से संक्रमित कर देता है तो फिर जहाँ ये पहुंचेंगे वहां तो कोरोना संक्रमण का सैलाब सा आजायेगा ..तो उस वक़्त हमारी सर्कार क्या करेगी वहां तो न दवा और न मशीन कुछ भी नहीं .मुझे लगता है और मेरी दुआ भी है की ऐसा नहीं होगा , क्योंकि मेरा रब मज़दूर और मेहनत कश के साथ होता है तो जिसके साथ वो रहता है उसको भयानक मौत नहीं देगा .

पर महामारी से लोगों को बचाने का प्रयास कर रहीं सरकारों को जल्द से जल्द इन ज़िंदगियों के बारे में कुछ करना होगा ताकि इनके सफ़र को अंजाम तक पहुँचाया जा सके.

कोरोना वायरस से देश और दुनिया को जानी नुकसान तो जितना होगा होजायेगा ,लेकिन इसके बाद माली ((Economic) नुकसान की चर्चा जो अब शुरू होगई है , इसका बड़ा खतरा दुनिया पर मंडराने लगा है , और आपको बता दें दुनिया को अपने ढंग से चलने वाले लोग एहि चाहते हैं की आम इंसान और वहां की हुकूमतें हमारी क़र्ज़दार रहें , और हम जैसा उनसे कर वाना चाहें वो करें .

और उन लोगों की यह सोच दुनिया को new world order की तरफ ले जा रही है , जिसकी बात समय समय पर अमेरिकन सीनेट और EU की पार्लियामेंट से भी उठती रहती है .आपको New World Order की हलकी सी एक झलक भी दिखा देते हैं .

लेकिन सवाल यह है की क्या इस चर्चा से फौरी तौर पर देश के असंगठित मज़दूर और निम्न वर्गीय व्यापारी को कोई लाभ होगा ? जवाब है नहीं , मगर इस चर्चा से एक बात साफ़ होगी की देश में अमीर की क्या क़ीमत है और ग़रीब की क्या गत बनेगी . यानी देश मज़हब और जाती के नाम पर ही नहीं बल्कि देश अमीर और ग़रीब के बीच बता हुआ है .

रोज़ मज़दूरी कर परिवार का पालन पोषण करने वाले मज़दूर के लिए आज सबसे बड़ी समस्या उसकी 2 वक़्त की रोटी की है पेट भरने की है . सैंकड़ों मज़दूर भूके पेट पुलिस के डंडे खाते हुए अपने परिवार के पोषण के लिए अपने पैतृक गाँवों की ओर पलायन पर मजबूर हैं और ये वही मज़दूर हैं जिनको अपने गाँव में पेट भरने की कोई आस दिखती है .

देश के बड़े शहरों में लाखों मज़दूरों और छोटे दस्तकारों की तादाद ऐसी है जिनके पास वापस जाने का भी विकल्प (Option) नहीं है . या यूँ कहें उनके पास 2 ही विकल्प हैं या भूक से मौत या कोरोना का खौफ , बस पापी पेट के लिए दिन की कमाई पर जीवन वयतीत करने वाले वाले इन मज़दूरों को आसमान के नीचे फुटपाथ पर ज़िंदगी गुज़ारने की चाहत भी जब छिनने लगेगी तो उनके लिए मौत को चुनना बेहतर विकल्प होगा .

दरअसल मौत का डर या दुनिया से मोहब्बत उसी को होती है जिसके पास दुनिया में पर्याप्त संसाधन होते हैं , और जहाँ रहने को घर न हो दोपहर के बाद शाम को खाना मिलेगा या नहीं इसका भी यक़ीन न हो तो उसको जीने की आस नहीं होती बल्कि वो ज़िंदगी से वफ़ा करते हुए जी रहा होता है .

और देश में ऐसे बेघरों और बे सहारा नागरिकों की संख्या करोड़ों में है , जिनको NRC का कोई खतरा है और न ही कोरोना का , बस उनको २० रुपया का वो नशा जिससे वो रात और दिन का कुछ हिस्सा गुज़ार लें और जैसे ही होश मैं आये तो चाहे कचरे से ही सही पेट भरने को कुछ भी मिल जाए , चलेगा .यह तो हाल है हमारे प्यारे देश के नागरिकों का . ये कुछ कड़वी सच्चाइयां हैं दवा समझकर निगल लें नफा देगी ,

मगर फ़र्क़ उस वर्ग को ज़्यादा पड़ेगा जो अपने गाँव से शहर कुछ सपने लाया था या वादे पूरे करने के लिए आया था और समाज में उसको 4 लोग इज़्ज़त से देखते थे . अब जब उसके पास लगातार 2 माह सामूहिक सरकारी भोजन की लाइन में आधा अधूरा खाना रह जाएगा तो उसको यह फ़िक्र तो सताएगी की घर किस मुंह से जाएगा .

केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की तरफ से Registered (पंजीकृत ) मज़दूरों को कुछ राशि की बात चली है , उड़ीसा ने इसपर अमल शुरू कर दिया है जबकि कई सरकारें वादों के भरोसे कितने रोज़ तक ग़रीब के भरोसे और विश्वास का इम्तहान लेगी , कहा नहीं जा सकता , जबकि ख़ासा समय भारत के मूल नागरिक को औपचारिकताएं पूरी करने में ही निकल जाएगा ,और इस बीच कितने मौत के घात चले जाएंगे इसका भी कोई ठिकाना नहीं है . उसके बाद भी कितने प्रतिशत मज़दूर सरकार के इस तेल को अपने पल्ले में ले पाएंगे जिसमें पहले ही से कई छेद हैं .मगर यक़ीन रखें कुछ को तो ज़रूर कुछ मिलेगा .

दरअसल देश अभी कोरोना की जंग के पहले पड़ाव से अधूरी तैयारी के साथ लड़ रहा है , देश और दुनिया के सामने बड़ी लड़ाई कोरोना को हराने के बाद शुरू होगी , जो अर्थववस्था को ढर्रे पर लाने की होगी . कोरोना से लड़ते लड़ते दुनिया इतना पीछे जा चुकी होगी कि दुनिया में अफरा तफरी का माहौल क़ायम होजाने की आशंका है. हालांकि मुझे उम्मीद है की कोरोना से दुनिया में ज़्यादा मौतें नहीं होंगी , लेकिन corona के खौफ से दुनिया का कारोबार बंद करके वही Group जो दुनिया को New World order की तरफ ले जा रहा है अपने लक्ष्य को ज़रूर हासिल कर सकता है .

वैसे संकट की इस घडी में अगर हमारे तमाम 542 सांसद और सभी 4120 विधायक तथा सभी 20 बड़े व्यापर घराने के CEOs अपनी अपनी सिर्फ 2 महीने की Salaries देश को हुए इस घाटे की पूर्ती के लिए देश के fixed account में दाल दें , (जो वर्तमान सरकार निकाल चुकी है) तो हमारा हर ग़रीब अगले 3 वर्षों तक ३ वक़्त की रोटी भर पेट खा सकता है .

एक सांसद की १ माह की Salary =2 , 70 ,000 *542 =146340000 rupees *2 =292680000 / Rupees

एक विधायक के 1 माह की salary =125000 *4120 MLA =515000000 *2 =1030000000 / Rupees

Corporate house CEO की salary / month 41666666 *2 =83333333 * 20 घराने =1666666666

292680000 +1030000000 +1666666666 =2989346666 यानी कुल 2 माह की सैलरी 2 अरब 98 करोड़ 93 लाख 45 हज़ाएर 666 Rupees

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