Poetry/Literature

और अधूरी ज़िंदगी ही जी पाते हैं

  यह रही हम फूलों की तक़दीर* किसी के प्यार के इज़हार के तौर पर किताबों के वर्क़ॊ में घुटते रहने पर मजबूर ! या किसी की आस्था की...

उस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं

उस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं मुतमइन ऐसा है वो जैसे हुआ कुछ भी नहीं अब तो हाथों से लकीरें भी मिटी जाती हैं उस को...

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