BRICS में ईरान ने कैसे मारी बाज़ी?

BRIKS में ईरान की एक ईंट का रोल, महल गिर भी सकता है

BRICS में ईरान ने कैसे मारी बाज़ी? चीन और रूस का क्या रहा रोल?

BRICS Summit New Delhi में ईरान, रूस और चीन में से भारत के लिए सबसे अहम् देश कोनसा है ? इन तीनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भारत के बारे में क्या कहा? और उनके बयानों के पीछे असली रणनीति क्या है?

BRICS SUMMIT यूँ तो कई वजह से काफी IMPORTANT कई लेकिन जिस चीनी PRESIDENT की भारत आमद पर जिस क़दर मीडिया में चर्चा हुई और जिस अंदाज़ में हुई वो हमारे देश की मानसिकता का दर्पण है. यानी जिस देश का मीडिया जो लिखता या दिखाता है उसमें उसी देश की तस्वीर छुपी होती है.

चीन कम्युनिस्ट मानसिकता वाला देश है वहां CCP की हुकूमत है, जबकि भारत की वर्तमान सरकार के IDEAL और गुरु ” गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में भारत की सुरक्षा और संस्कृति को नुकसान पहुँचाने वाले तीन मुख्य आंतरिक खतरों का जिक्र किया था.

उन्होंने मुसलमानों और ईसाइयों के साथ-साथ कम्युनिस्टों को भी रखा था।” खैर ये वैचारिक सोच की बात है मगर आज चर्चा कूटनीति की है और BRICS देशों के विकास और MULTILETERAL रिश्तों की है.

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद भारत के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करने की ख्याहिश ज़ाहिर की। हालांकि ईरान अमेरिका इजराइल वॉर के दौरान भारत का रवैया ईरान के प्रति मायूसकुन रहा था जिसका ख़मयाज़ा भारत को भी STRIAT OF HORMUZ पाबन्दी के दौरान उठाना पड़ा.

फिलहाल ईरान ने भारत के साथ व्यापार, अर्थव्यवस्था, टेक्नोलॉजी और विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की बात की है । साथ ही राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने फिलिस्तीन और इज़राइल से जुड़े मुद्दे पर स्पष्ट रूप से BRICS की भूमिका स्पष्ट करने की मांग की। उनके मुताबिक फिलिस्तीन का सवाल और फिलिस्तीनी जनता के अपने फैसले का अधिकार और GLOBAL GOVERNANCE की RELIABILITY का इम्तहान है।

यानी यह कहना ज्यादा सही होगा कि PRESIDENT मसूद ने भारत को सीधे यह तो नहीं कहा कि “आप इज़राइल का समर्थन क्यों कर रहे हैं।” लेकिन BRICS के मंच पर ईरान ने अपने हितों और क्षेत्रीय संकट को उठाया, जबकि इस दौरान चौंकाने वाली बात यह रही कि सभी BRICS देशों ने ग़ज़ा और फिलिस्तीन पर अपना सामूहिक समर्थन दर्ज किया। जिससे मोदी थोड़ा असहज नज़र आये, क्यों वो तो इसराइल को बाप और भारत को माँ कह चुके हैं.

लेकिन भारत के लिए ईरान की अहमियत सिर्फ कूटनीतिक रिश्तों तक सीमित नहीं है। चाबहार पोर्ट भारत को अफगानिस्तान और Central Asia तक पहुंच का रास्ता देता है। ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री संपर्क और पश्चिम एशिया में भारत के रणनीतिक हितों के लिए भी ईरान बेहद महत्वपूर्ण है। जबकि इजराइल से भारत के मुसलमानो पर ज़ुल्म करने की रणनीतिक योजना के सिवा दूसरा कोई लाभ नज़र नहीं आता. जिसका ज़िक्र खुद वेस्ट बंगाल के मुख्यमंत्री कर चुके हैं . यहाँ उसका वो बयान चलाया जा सकता है ……………..

BRICS Business Forum में ईरानी PRESIDENT ने यह भी कहा कि देशों के legitimate trade यानी वैध व्यापार को बाधित नहीं किया जाना चाहिए और payment तथा financing channels को diversify करने की जरूरत है।

यानी ईरान का इशारा है कि वो उस भारत के लिए SUPPORTER और महत्वपूर्ण है जो अपनी विदेश नीति को किसी एक शक्ति के दबाव से मुक्त रखना चाहता है।

BRICS Business Forum में अपनी बात रखते हुए ईरानी president मसूद पेज़ेश्कियान ने अमेरिकी डॉलर पर वैश्विक निर्भरता को कम करने (De-dollarization) और पश्चिमी प्रतिबंधों के असर से निपटने के लिए ब्रिक्स देशों (जैसे भारत, रूस, चीन आदि) के बीच अपनी-अपनी राष्ट्रीय करेंसी में लेन-देन करने का प्रस्ताव रखा है। जिसके बाद डोनाल्ड ट्रम्प की बेचैनी और बढ़ गई है.

पुतिन ने भारत के साथ trade, defence, energy, space, infrastructure और technology में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। दोनों देशों ने 2030 तक bilateral trade को करीब 100 billion dollar तक ले जाने की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही। पुतिन ने मोदी को रूस आने का निमंत्रण भी दिया, जिसको मोदी ने क़ुबूल कर लिया.

सुनने में सब अच्छा है। लेकिन यहाँ सवाल पूछना भी जरूरी है। क्या रूस के साथ दोस्ती का मतलब रणनीतिक निर्भरता भी होनी चाहिए?

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की अपनी मजबूरियां हैं और चीन के साथ उसकी नजदीकी भी बढ़ी है। इसलिए भारत के लिए रूस जरूरी है, लेकिन Blind Faith नहीं किया जा सकता। अब आते हैं चीन पर जहाँ तस्वीर ज्यादा जटिल है।

शी जिनपिंग का BRICS में शामिल होने के लिए दिल्ली दौरा सात साल बाद काफी ड्रामाई तरीके से हुआ है, मोदी-शी मुलाकात में long-term relations, cooperation और मतभेदों को बातचीत से manage करने की पहल हुई है ।

लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी अब शी जिनपिंग के शब्दों से प्रभावित नहीं होंगे। 2020 के गलवान संघर्ष को भारत भूल नहीं सकता। सीमा विवाद खत्म नहीं हुआ है और सीमावर्ती इलाकों को लेकर चीन के दावे तथा गतिविधियां आज भी भारत केलिए चिंता का विषय हैं।

इसलिए BRICS में चीन की दोस्ताना भाषा अच्छी बात है, लेकिन भारत को सही जिनपिंग के शब्दों से ज्यादा उसकी जमीनी रणनीति पर नजर रखनी होगी। ऐसे में यहाँ ईरान की अहमियत और बढ़ जाती है।

चीन के साथ सीमा का सवाल है, रूस के साथ बदलते geopolitical समीकरण हैं; लेकिन ईरान भारत को एक महत्वपूर्ण strategic alternative देता है—चाबहार, Central Asia connectivity, energy और West Asia में strategic access। यह सब भारत को ईरान से मिल सकता है. कह सकते हैं कि, ईरान ब्रिक्स देशों के ताक़तवर महल में ऐसी ईंट है जिसके निकलते ही दुसरे देश प्रभावित हों या न हों मगर भारत की दीवार के गिरने का पूरा खतरा बन सकता है .

इसलिए ईरान को सिर्फ BRICS के एक सदस्य के रूप में देखना भारत की अपनी strategic possibilities को छोटा करके देखने जैसा होगा। हमारा मानना है ईरान, भारत के लिए एक अच्छे पार्टनर की हैसियत से ज़्यादा फायदेमंद रहेगा

तीनों नेताओं के बयानों को साथ रखकर देखें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है — ईरान भारत के साथ economic cooperation बढ़ाना चाहता है। रूस strategic partnership और trade को मजबूत करना चाहता है। और चीन भारत के इलाक़े को लगातार दबाने के साथ साथ relations को long-term perspective में देखने की बात भी कर रहा है।

लेकिन सवाल है—क्या चीन और रूस के बयान ब्रिक्स राष्ट्रों के साथ और अपने national interests से अलग हैं? बिल्कुल नहीं। इसीलिए भारत को दोस्ती जरूर रखनी चाहिए, लेकिन किसी भी शक्ति पर आंख बंद करके निर्भर नहीं होना चाहिए।

जबकि ईरान, भारत की विदेश नीति में वह strategic space दे सकता है, जो चीन और रूस नहीं दे सकते? इलसिए BRICS की चमकदार तस्वीर के पीछे भारत के strategic choices बहुत अहम् है।

और भारत को तय करना है कि क्षेत्र में अम्न और देश में विकास तथा पेट्रोलियम और गैस की आपूर्ति के लिए ईरान के साथ रिश्ते मज़बूत करने हैं या मुस्लिम दुश्मनी में इजराइल से दोस्ती, फैसला सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रीय हित में होना चाहिए नाकि किसी समुदाय या विचारधारा की दुश्मनी में।

जिस नेतन याहू के खिलाफ नवंबर 2024 में, (International Criminal Court) ने गिरफ्तारी वारंट जारी किया हुआ है उसके साथ भारत की वर्तमान सरकार के रिश्तों को मुस्लिम वर्ल्ड हज़म नहीं कर पा रहा है. आपने देखा ,…. यूरोपीय देशों का इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की गाजा और फिलिस्तीन नीति पर रुख काफी सख्त और आलोचनात्मक रहा है.

मोदी सरकार की विदेश नीतियों की नाकामियों के बावजूद, फिलहाल यह भी मानना होगा कि मोदी सरकार ने BRICS को भारत की कूटनीतिक ताकत के मंच के रूप में इस्तेमाल करते हुए अलग-अलग शक्तियों के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की एक कोशिश ज़रूर की है।

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