कपिल बर्मन (जागृत भारत)
कंगना की टिप्पणी ने खोला सत्ता की राजनीति का चेहरा; भाजपा-NDA से सवाल-असहमति लोकतंत्र है या अपराध?
युवा आक्रोश, संसदीय मर्यादा और सत्ता की मौन सहमति: भारतीय लोकतंत्र का गहराता संकट
भारत की संसद जनता की आवाज़ का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। यहाँ बैठा प्रत्येक सांसद केवल किसी राजनीतिक दल का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं और संवैधानिक अधिकारों का प्रतिनिधि होता है। इसलिए जब कोई जनप्रतिनिधि देश के युवाओं या युवा महिलाओं के बारे में अपमानजनक और सामान्यीकृत भाषा का इस्तेमाल करता है, तो मामला केवल एक व्यक्ति की टिप्पणी तक सीमित नहीं रहता-वह राजनीतिक संस्कृति और लोकतांत्रिक मर्यादा का प्रश्न बन जाता है।
भाजपा सांसद कंगना रनौत की हालिया सोशल मीडिया टिप्पणियों ने इसी सवाल को जन्म दिया है। उन्होंने Gen-Z प्रदर्शनकारियों और विशेष रूप से युवा हिंदू महिलाओं के बारे में बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने युवा महिलाओं को ‘Generation Gutter’ तक कहा और उनके निजी जीवन को लेकर आरोप लगाए।
युवा सवाल पूछे तो उसे अपमानित किया जाएगा?
युवाओं का आंदोलन गलत हो सकता है। किसी आंदोलन की भाषा, तौर-तरीके या मांगों पर कठोर आलोचना भी लोकतंत्र में पूरी तरह जायज़ है। लेकिन आलोचना का उत्तर तर्क से होना चाहिए, चरित्र-हनन से नहीं।
आज देश का युवा रोजगार, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था और पेपर लीक जैसे सवालों को लेकर सड़कों पर है। हाल के छात्र आंदोलनों में NEET परीक्षा से जुड़े कथित अनियमितताओं और जवाबदेही की मांग प्रमुख रही है। दिल्ली में हुए प्रदर्शन को लेकर युवाओं की बड़ी भागीदारी दर्ज की गई और आंदोलन ने राष्ट्रीय बहस का रूप लिया।
ऐसे समय में युवाओं को ‘गटर’, ‘कचरा’ या ‘कुरूप’ जैसे विशेषण देना समस्या का समाधान नहीं है। युवा को गाली नहीं – जवाब चाहिए।
भाजपा नेतृत्व मौन क्यों?
यहाँ भाजपा से भी कठिन सवाल पूछा जाना चाहिए। क्या पार्टी अपने सांसद की भाषा से सहमत है? क्या युवा महिलाओं के बारे में इस प्रकार की व्यापक और अपमानजनक टिप्पणियाँ भाजपा की राजनीतिक भाषा का हिस्सा हैं? यदि नहीं, तो पार्टी नेतृत्व की स्पष्ट आपत्ति सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं दिखाई देती?
और सवाल केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। NDA में शामिल दलों को भी तय करना होगा कि वे संसद और सार्वजनिक जीवन की मर्यादा को राजनीतिक सुविधा से ऊपर रखते हैं या नहीं।
RSS भी स्वयं को राष्ट्र और समाज निर्माण से जुड़ा संगठन मानता है। इसलिए युवाओं, महिलाओं और लोकतांत्रिक असहमति के प्रति ऐसी भाषा पर उसका नैतिक दृष्टिकोण भी जनता जानना चाहेगी।
युवा ‘वोट बैंक’ नहीं, संविधान के रक्षक हैं
भारत का युवा किसी पार्टी की जागीर नहीं है। वह संविधान से मिले अधिकारों के साथ देश का नागरिक है। उसे शिक्षा चाहिए, रोजगार चाहिए, निष्पक्ष परीक्षा चाहिए, सुरक्षित भविष्य चाहिए और सरकार से सवाल पूछने का अधिकार भी चाहिए।
सरकार से प्रश्न करना देशद्रोह नहीं है। आंदोलन करना अपने-आप में अपराध नहीं है। सत्ता की आलोचना करना लोकतंत्र-विरोध नहीं है। बल्कि सत्ता से सवाल करने की स्वतंत्रता ही लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण पहचान है।
हाँ, आंदोलनकारियों की भी जिम्मेदारी है कि वे शांतिपूर्ण रहें, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें और अपनी बात संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक तरीके से रखें। लेकिन सत्ता और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी इससे कहीं बड़ी है – उन्हें आलोचना सुननी होगी और जवाब देना होगा।
RSS और भाजपा के सामने असली परीक्षा
राजनीतिक संगठन तभी बड़े होते हैं जब वे अपने समर्थकों की तालियों से नहीं, बल्कि अपने भीतर के अनुशासन और आलोचना स्वीकार करने की क्षमता से पहचाने जाएँ।
यदि कंगना की भाषा गलत है तो भाजपा को स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि ऐसी भाषा स्वीकार्य नहीं है। यदि सही है तो पार्टी को जनता के सामने उसका नैतिक और राजनीतिक आधार बताना चाहिए।
मौन सबसे सुविधाजनक रास्ता हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र में मौन भी एक संदेश देता है।
सामाजिक बहिष्कार नहीं, लोकतांत्रिक प्रतिरोध
किसी सांसद की आपत्तिजनक टिप्पणी के विरोध में जनता को आवाज उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन लोकतांत्रिक विरोध का रास्ता धमकी, हिंसा या व्यक्तिगत उत्पीड़न नहीं हो सकता।
सबसे ताकतवर जवाब है – सवाल, तथ्य, सार्वजनिक बहस और मतदान।
जनता किसी नेता को भगवान नहीं बनाती। वह प्रतिनिधि चुनती है और जरूरत पड़ने पर उसे बदल भी सकती है। इसलिए भाजपा, RSS और NDA के लिए संदेश स्पष्ट है-
क्योंकि संसद की असली गरिमा ऊँची आवाज़ में भाषण देने से नहीं, देश के सबसे कमजोर, सबसे असहमत और सबसे बेचैन नागरिक की आवाज़ सुनने से कायम होती है।
और याद रखिए:
लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती-जनता स्थायी होती है।