Home Editorial & Articles उठ कि अब बज़्मे-जहाँ का और ही अन्दाज़ है

उठ कि अब बज़्मे-जहाँ का और ही अन्दाज़ है

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Kalimul Hafeez Social Reformer & Educationist
Kalimul Hafeez Social Reformer & Educationist

ज़मीन, सूरज और सितारों की गर्दिश से दिन-रात बदलते हैं। दिन-रात के बदलने से तारीख़ें बदलती हैं और तारीख़ें बदलने से महीने और साल बदलते हैं, यूँ साल पे साल गुज़र जाते हैं। वक़्त की रफ़्तार तेज़ होने के बावजूद सुनाई नहीं देती। बुज़ुर्ग कह गए कि वक़्त दबे पाँव निकल जाता है। कल के बच्चे आज जवान और कल के जवान आज बूढ़े हो गए। कायनात का ये सिलसिला न मालूम कब से जारी है और कब तक जारी रहेगा।

waqt guzarta gaya

बदलते वक़्त के साथ-साथ इन्सान के हालात भी बदलते रहे, जो लोग वक़्त की रफ़्तार का साथ देते रहे वक़्त भी उनको काँधों पर बैठा कर उड़ाता रहा। जो वक़्त के साथ न चले उन्हें वक़्त ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। कितनी ही क़ौमें वक़्त के साथ गुज़री हुई कहानियाँ बनकर रह गईं। कितने ही रुस्तम व सिकन्दर ख़ाक में मिल गए।

एक इन्सान और क़ौमों की ज़िन्दगी के ये उतार-चढ़ाव फ़ितरत के ठीक मुताबिक़ आते-जाते रहे। यूँ तो मुसलमानों की तारीख़ हज़रत आदम (अलैहि०) से शुरू होती है, क्योंकि वो भी मुसलमान ही थे। लेकिन मौजूदा तारीख़ हमें उस वक़्त से गिनती और हमारा हिसाब रखती है जबसे हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) को आख़िरी नबी बनाकर भेजा गया।


हमारी तारीख़ बहुत रौशन है। ज़माना पढ़ता है तो दाँतों-तले ऊँगली दबा लेता है। हम मालूम दुनिया के तीन-चौथाई हिस्से के हुक्मराँ थे। क्या शान थी हमारी, दुनिया की सुपर पावर ताक़तें हमारे नाम से काँप जाती थीं। हर तरफ़ हरा इस्लामी झण्डा लहरा रहा था। सारी दुनिया के हम इमाम थे।

मगर ये वो वक़्त था जब हमारा ख़लीफ़ा रातों को इसलिये गश्त करता था कि उसकी प्रजा को कोई तकलीफ़ तो नहीं है, जब एक अमीरुल-मोमिनीन को बैतुल-माल का इतना ख़याल था कि दोस्त से बात करते हुए सरकारी तेल से जलते हुए चिराग़ को बुझा देता था। ये वो वक़्त था जब इस्लामी सल्तनत ने तमाम दुनिया से इल्म व फ़न (Education और Art & Culture) के माहिरों को अपने यहाँ बुलाकर तहक़ीक़ और रिसर्च की सुहूलियात दिया करते थे।

हमारी मुहब्बत, अमानतदारी और सच्चाई का डंका बजता था। जब एक बच्चा भी गुदड़ी में छिपी हुई अशरफ़ी को इसलिये ज़ाहिर कर देता था कि उसकी माँ ने कह दिया था “बेटा झूट किसी हाल में मत बोलना।” ये उस वक़्त की बात है जब हम दिन को बन्दों की ख़िदमत करते थे और रातों को अपने रब के हुज़ूर माफ़ी माँगते थे। हमारा उरूज हमारे चिल्ला खींचने, अल्लाह के नाम की माला जपने का नतीजा नहीं बल्कि रब को राज़ी करने के लिये इन्सानों (न कि सिर्फ़ मुसलमानों) के काम आने और उनके दुःख-दर्द बाँटने का नतीजा था।


ख़िलाफ़त ख़त्म हो जाने के बाद मिल्लत जिन उतार-चढ़ावों के दौर से गुज़री है अगर कोई दूसरी क़ौम होती तो उसका नाम व निशान मिट जाता। वो मेजोरिटी में गुम होकर रह जाती। ये काम बड़ी बात नहीं है कि हिन्दुस्तान समेत पूरी दुनिया में मिल्लत अपनी पहचान और रिवायतों के साथ ज़िन्दा है। हर क़ौम के अन्दर अच्छाइयाँ और बुराइयाँ दोनों होती हैं। फ़िरक़े और मसलक भी हर मज़हब में हैं।

इस हक़ीक़त को तस्लीम करने के साथ-साथ कि मुसलमानों में अच्छाइयाँ कम हो गई हैं। लेकिन ये उम्मत ख़ैरे-उम्मत है यानी इसे लोगों की भलाई के लिये निकाला गया है। ये उम्मत ख़ैर और भलाई से कभी ख़ाली नहीं होगी। मसलकी व जमाअती इख़्तिलाफ़ देखनेवालों को कम से कम ये तो देखना चाहिये कि एक मसलक के लोग अपने इमाम पर मुत्तफ़िक़ हैं, ज़ात और ब्रादरी की अस्बियतों के बावजूद एक ही सफ़ में महमूद व अयाज़ खड़े हैं, उम्मत में इख़्तिलाफ़ की लिस्ट पढ़नेवालों को ये भी देखना चाहिये कि ये अकेली क़ौम है जो अपने बुनियादी अक़ीदों में एक मत है। ये उम्मत बाँझ नहीं है। आज भी ऐसे सपूतों से मालामाल है जिनपर फ़ख़्र किया जाता है। कितने ही नायाब हीरे ऐसे हैं जिनपर ज़माने की धूल पड़ गई है।


गुज़रा वक़्त तो कभी वापस नहीं आता, मगर तारीख़ ख़ुद को दोहराती रहती है। वक़्त मौक़े देता रहता है। बस ज़रूरत इस बात की है कि इतिहास से सबक़ लेकर हम आगे बढ़ें। फिर उस क़ौम को क्या डर जिसके लिये “तुम ही सरबुलन्द रहोगे” की ख़ुशख़बरी सुनाई गई हो। जिसके लिये पेशनगोई की गई हो कि इसको तरक़्क़ी ज़रूर हासिल होगी। जिसके लिये हार जाने में भी अज्र और सवाब बताया गया हो। फ़रिश्ते जिसके लिये दुआएँ करते हों। अल्लाह का नाम लेकर उठिये।

अपनी कम इल्मी पर अफ़सोस मत कीजिये, इसलिये कि इन्सानों की ख़िदमत करने के लिये किसी डिग्री की ज़रूरत नहीं है। अपनी कम सलाहियतों का मातम मत कीजिये कि माल और अस्बाब का देनेवाला कोई और है। अपने-आपको तनहा महसूस मत कीजिये क्योंकि आपको दरिया ने भी रास्ते दिये हैं। अपने आपसे शुरुआत कीजिये, फिर घर, ख़ानदान, हमसाये और पूरी बस्ती की ख़िदमत कीजिये।

जहालत, बीमारी, ग़ुरबत और बेवक़अती को तालीम, सेहत, तिजारत और पॉलिटिकल एम्पावरमेंट की स्ट्रैटेजी से दूर कीजिये (चारों टॉपिक्स पर मेरे लेख इन्क़िलाब के पिछले कुछ अंकों में पब्लिश हो चुके हैं। जल्द ही किताबी शक्ल में पब्लिश होने वाले हैं। किताब में मीडिया, मस्जिद, मदरसा से मुताल्लिक़ भी कुछ बातें शामिल रहेंगी) किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है। फिर आपको डर किस बात का है? आपके पास खोने को तो कुछ भी नहीं। काम शुरू कीजिये फिर देखिये तारीख़ ख़ुद को किस तरह दोहराती है।

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