
कभी-कभी इतिहास संसद की कुर्सियों पर बैठकर नहीं बल्कि सड़क पर बैठी भीड़ के सब्र, अहिंसा, त्याग और क़ुर्बानी के क़लम से भी लिखा जाता है।
जुनेद के परिवार को हिरासत में लेने वाली सरकार के खिलाफ क्या क़दम उठाया जा रहा है? उन्होंने दावा किया कि मेरठ में रहने वाली उनकी बहन के ससुर और देवर को भी पुलिस उठाकर गाजियाबाद ले आई……
दिल्ली का जंतर-मंतर… जहाँ कुछ छात्रों के हाथों में तख्तियाँ थीं, आँखों में उम्मीद और आवाज़ में सरकार से सवाल थे । शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह आवाज़ कुछ ही दिनों में दिल्ली की सीमाएँ लाँघकर देश के कई राज्यों तक पहुँच जाएगी।
फिलहाल यह बहस बेमानी और फ़िज़ूल होगी कि राहुल की मेहनत और युथ कांग्रेस या विपक्ष की रणनीति रंग लाइ या कॉकरोच पार्टी ने इस लड़ाई में मैदान मारा. यह कहना ज़्यादा उचित रहेगा कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की लड़ाई विपक्ष की एकजुटता और युवाओं की लगन और dedication का नतीजा रही.
लेकिन एक मंत्री का इस्तीफ़ा जो नैतिकता के आधार पर उनको खुद ही देदेना चाहिए था, इसके लिए पूरे देश के युवाओं को अलग अलग जगहों पर सड़कों पर आना पड़ा. विपक्ष के नेताओं और ख़ास तौर से LOP लोकसभा को प्रधानमंत्री आवास पर आम नागरिक की तरह अनशन करना पड़ा. राहुल गाँधी जैसे नेता को पुलिस के ज़रिये से ज़मीन पर घसीटा गया, शायद सरकार इसको भी अपनी कामयाबी के रूप में सोच सकती है.
पिछले 4 दिनों में विश्वविद्यालयों और कोचिंग Centres पर , शहरों की गलियों और छोटे-बड़े कस्बों में और देश की राजधानी से लेकर मेट्रो Cities में युवाओं के हाथों में तिरंगा और ज़बान पर इंक़लाब सुनाई देने लगा था।
और ये दृश्य किसी एक विषय पर विरोध के लिए नहीं, बल्कि उस बेचैनी के थे जो ऐसे वक़्त में जन्म लेते है, जब मेहनत करने वाला युवा थाली , ताली और चवन्नी वाले TROLLERS की परवाह किये बग़ैर अपने भविष्य और देश की एकता अखंडता,अस्मिता और सम्प्रभुता को लेकर चिंता महसूस करने लगता है।
दरअसल धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब यह आंदोलन इस बात का साक्षी बना है कि अगर युवा सर्कार कि जवाबदेही तय करने की ठान ले तो फिर इस्तीफ़ा नहीं बल्कि पूरी सत्ता के सिहांसन खाली कराये जा सकते हैं.
साथ ही प्रदर्शन कर रहे युवाओं ने दूसरा message भी दिया, अगर भविष्य में किसी भी पार्टी की सरकार जनता की सेवा से खिलवाड़ करेगी और देश प्रेम का झूठा नाटक करेगी तो Genz , विपक्ष का इंतज़ार किये बिना सरकार में बैठे स्वार्थियों को उनकी ज़िम्मेदारियों का एहसास कराएगी और उनकी औक़ात याद दिलाएगी, और बताएगी तुम जनता के सेवक हो मालिक नहीं. और शायद जनता ने यह भी याद दिलाया है कि अब सियासत में सच्ची सेवा के लिए तपस्या में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं छोड़नी है.
देश के साथ सर्कार में बैठी पार्टियों का लगातार विश्वासघात और जनविरोधी नीतियों ने लाखों करोड़ों युवाओं और छात्रों को सड़क पर उतरने केलिए मजबूर किया, और नतीजे में शिक्षा मंत्री को कुर्सी से उतरना पड़ा. इसका मतलब शिक्षा मंत्री पेपर लीक के लिए ज़िम्मेदार थे, इसी लिए तो कुर्सी छोड़ी.
इस प्रदर्शन से यह भी साबित करने की कोशिश की गई, देश में आने वाले किसी भी हालात के लिए सिर्फ जनता को ही क़ुरबानी का बकरा नहीं बनाया जायेगा. और आत्म निर्भर के नाम पर मासूम जनता कि बलि नहीं दी जायेगी, देशभक्ति के नाम पर जनता को मूर्ख नहीं बनाया जाएगा. बल्कि देश के किसी भी सामजिक,राजनितिक, आर्थिक या प्राकृतिक आपदा केलिए भी सरकारों को ही ज़िम्मेदार ठराया जायेगा.
इस आंदोलन से एक बार फिर भारत जोड़ी यात्रा कि तरह देश जुड़ने लगा था , सभी समुदायों, वर्गों और पार्टियों से समर्थन की आवाज़ें उठ रही थीं । छात्र संगठन, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और कई नागरिक समूह अपनी-अपनी तरह से इस आंदोलन का हिस्सा बन रहे थे।
इसके बाद सरकार के विरुद्ध अविश्वास और Inobediency का माहौल बनने जा रहा था , जिसको सरकार ने भांप लिया, और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा ले लिया गया. वही प्रधान कल तक प्रदर्शनकारियों को देश के विरुद्ध काम करने वाली शक्ति का हिस्सा बता रहे थे.
अगर वास्तव में ऐसा ही था तो प्रधान को इस्तीफ़ा नहीं देना चाहिए था, इसका मतलब सत्ता में बने रहने के लिए कभी भी कुछ भी ब्यान दिया जा सकता है, और कभी भी किसी को भी आरोपी अपराधी या आतंकी बनाया जा सकता है.
एक पुलिस वाले कि वो video वायरल हो रही है जिसमें वो कार में बैठे युवाओं से कहते सुनाई दे रहे हैं कि अगर तुमने हमारी बात नहीं मानी तो चरस की पुड़िया साथ लगाकर ज़िंदगी बर्बाद कर दूंगा.
यह भी सच है कि सड़कों पर उतरने वाला हर युवा नेताओं या पार्टी का दुश्मन नहीं होता बल्कि नीतियां और सरकारी व्यवस्था जनता को सड़कों तक पहुंचाती हैं। कई बार युवा उसी व्यवस्था से यह पूछने आता है कि जिस भविष्य का सपना दिखाया गया था, जो वादे चुनाव से पहले किये गए थे उनका क्या हुआ ?
आज तो लगातार बढ़ती मंहगाई और बेरोज़गारी ने देश की आम जनता की कमर तोड़ दी है. इसके साथ Petrol में Ethenon, जंगलों की कटाई और सामाजिक सुरक्षा जैसे बड़े मुद्दे अभी देश के सामने खड़े हैं.
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद पूरे देश में चर्चा है कि, क्या अब हर दोषी मंत्री का इस्तीफ़ा होगा और अंततय: प्रधानसेवक को भी देशहित में इस्तीफ़ा देना होगा??
Gen Z जिसे अक्सर मोबाइल या internet जीवी कहा गया सत्ता की मनमानी से बेपरवाह समझा गया। लेकिन आज उसी युवा ने सत्ता के नशे में चूर और घमंडी सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया. अब सवाल सिर्फ़ किसी एक मुद्दे का नहीं रह गया, बल्कि यह लोकतंत्र, संविधान और डेमोक्रेसी की धड़कनों की आवाज़ बन गया है ।
हर नारा एक सवाल … हर ख़ामोशी एक दस्तावेज़… और बच्चों पर बरसी अहंकार की हर लाठी का हर डंडा क्रान्ति और इंक़लाब की एक नई आवाज़ बनकर उभरता दिखाई दिया. संसद की ओर बढे छात्रों और युवाओं का लश्कर और संसद से मुंह छुपाकर भागते यशस्वी लोग इस बात की तरफ इशारा कर रहे थे हुकूमत में बैठे लोगों पर खौफ के बादल गरज रहे हैं. और हाँ देश सर्वोपरि है सरकार नहीं, देश के लोग सर्वोपरि हैं चिता रुपी सिंहासन पर बैठे बेज़मीर और वतनफरोश नेता तो हरगिज़ नहीं.
कुल मिलाकर इस बात की उम्मीद की जा सकती है, कि देश की राजनितिक और विभागीय वयवस्था को सुधारने में छात्रों की बड़ी भूमिका रहने वाली है. लेकिन शर्त यह है कि उसकी कमान ऐसे हाथों में हो जो झुके नहीं डरे नहीं और निस्स्वार्थ भी हों .
साथ ही एक बड़ा सवाल कि इस पूरे आंदोलन में लगभग 40 दिन तक निस्स्वार्थ मानवता की सेवा करने वाले जुनेद के परिवार को हिरासत में लेने वाली सरकार के ख़िलाफ़ क्या क़दम उठाया जा रहा है? और इसके लिए अब तक कितने युवाओं ने ग़ाज़ियाबाद के DM या प्रदेश के मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिया है?
जुनैद गाजियाबाद के मसूरी थाना क्षेत्र के तहत आने वाले गांव नाहल के निवासी हैं. लल्लनटॉप से बातचीत में जुनैद ने दावा किया कि 23 जुलाई को गाजियाबाद के मसूरी थाने की पुलिस उनके पिता को घर से उठाकर ले गई. इसके बाद देर रात पुलिस ने उन्हें छोड़ा.
जुनैद के मुताबिक, अगले दिन यानी 24 जुलाई की सुबह उनके पिता को फिर से उठाया गया. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी दावा किया कि मेरठ में रहने वाली उनकी बहन के ससुर और देवर को भी पुलिस उठाकर गाजियाबाद ले आई.
उनका आरोप है कि पुलिस ने उनके परिवार के लोगों की पासबुक और आधार कार्ड भी जब्त कर लिए हैं. जुनैद के मुताबिक, पुलिस का कहना है कि अगर वह खुद थाने पहुंच जाएंगे तो परिवार के लोगों को छोड़ दिया जाएगा.
लल्लनटॉप के मुताबिक़ गाजियाबाद के मसूरी सर्किल के असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर (ACP) सुनील कुमार ने बताया, “जुनैद के पिता या उनके किसी भी रिश्तेदार को पुलिस हिरासत में नहीं लिया गया . उनसे पूछताछ की गई थी पूछताछ के बाद वे चले गए.”
यह पूछने पर कि किस आधार पर इनको पूछताछ के लिए थाने लाया गया ? इस पर ACP सुनील कुमार ने बताया कि ‘जुनैद के बारे में पूछताछ की गई थी .सवाल पूछा गया ’ क्यों पूछताछ की गई? इसका उन्होंने कोई साफ जवाब नहीं दिया और कहा गाजियाबाद पुलिस मीडिया सेल से संपर्क करो. लेख लिखे जाने तक पुलिस का कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.
याद रहे ज़ंजीर उतनी ही मज़बूत होती है जितनी एक कमज़ोर कड़ी, अगर ज़ंजीर में कोई कड़ी कमज़ोर है तो आपकी ज़ंजीर कमज़ोर है . और जुनैद इस पूरे आंदोलन की एक मज़बूत कड़ी के तौर पर काम कर रहे थे लेकिन इसको सरकार द्वारा कमज़ोर साबित करने की कवायद शुरू कर दी गई है, जो ज़ाहिर है पूरे आंदोलन की कमज़ोरी का संकेत हो सकती है.
इतिहास गवाह है… हर बड़े बदलाव और क्रांति की शुरुआत सरकारों के दमन और अन्याय से ही उठती है. कुछ मतवाले और सच्चे देशभक्तों की क़ुर्बानी के बाद आज़ादी मिलती है, चाहे वो साम्राज्य्वादी शक्तियों से हो या ज़ालिम बादशाहो से इस बार जंतर-मंतर पर उभरी तस्वीर, आने वाले भारत की नई इबारत लिखने की तरफ बढ़ रही है।
जब युवा जागते हैं… तो सिर्फ़ आंदोलन नहीं होते, बल्कि युग बदलने की रुत छा जाती है। और जो बादल से वहां से उठते हैं वो सारी फ़िज़ा में छा जाते हैं.