
आजकल कुछ देशी- विदेशी चैनलों पर यही गंभीर बहस है। मेरे ख्याल से इस सवाल को गैर-चिकित्सीय नज़रिए से देखना चाहिए। राष्ट्रपति का मन भी इंसानी मन ही होता है।
ट्रंप का बहका मन? एक बिगड़ैल बच्चा – या फिर एक राजा वाला मन जो अपने लोगों और बाकी दुनिया से कटा हुआ है।
बिगड़ैल, अहंकारी राजा पुरानी और बेकार व्यवस्था में विश्वास रखता है:
“मेरा राज्य मेरी सोच के हिसाब से चलेगा।”
जिस तरह एक बिगड़ैल बच्चा असीमित खिलौनों से भी संतुष्ट नहीं होता – रोता रहता है –
हमारे ग्लोबल किंग को चाहिए: यूक्रेन, ग्रीनलैंड, ईरान, वेनेजुएला, कनाडा, क्यूबा… और आगे भी।
लेकिन एक बात हम भूल जाते हैं:
अलग-अलग देशों के राष्ट्रपतियों को अपने महलों में बेहतरीन डॉक्टरों की टीम का विशेषाधिकार मिलता है।
डॉक्टरों की टीम उस चेहरे के शरीर और मन की फिटनेस का ख्याल रखती है – जो देश की छवि होता है।
तो शायद हमें ट्रंप के दिमागी व्यवहार पर सहानुभूति रखनी चाहिए।
क्यों? क्योंकि वह कम से कम अपने गुस्से और तानों को ईमानदारी से व्यक्त करता है।
पिछले अस्सी साल के अमेरिकी राष्ट्रपतियों के विपरीत – जो अपना पागलपन चमकीले भाषणों के पीछे छिपाते थे।
असली बात:
बदलती विश्व व्यवस्था। बढ़ता कर्ज़। ग्लोबल पुलिसवाले के रूप में अमेरिका की गिरती ताकत।
यह सब एक अकेले शैतान के मन पर दबाव डाल रहा है – जो अपनी चुनिंदा खुशी की आकांक्षाओं के अनुसार अपना काम अच्छे से कर रहा है 🤣।
“पहले मुझे महान बनाओ, मुझे खुश करो। फिर खुशी तुम्हारे पास टपकेगी।”
यही है हमारे बिगड़ैल पुलिसवाले की इतिहास के एक राजा या भगवान वाली शैली।
हम सब एक ग्लोबल गाँव में आपस में जुड़े हैं। तो फिर केवल एक बुरे राजा को दोष देने से काम नहीं चलेगा – जो संविधान से, अपने मंत्रियों से और नागरिकों से सलाह नहीं लेता।
हमें यह भी समझना होगा कि मध्यमवर्गीय परिवारों में ‘ट्रंप ट्रेंड्स’ – यानी “दिमाग खराब” या बिगड़ैल बच्चों की यह अल्पसंख्यक प्रवृतियां क्यों दिखती हैं।
हमें एक पारदर्शी समाज चाहिए – स्थानीय परिवार से लेकर वैश्विक परिवार तक –
जहाँ फैसले सामूहिक मानव डीएनए से लिए जाएँ।
बिना निष्पक्ष नियमों के –न तो कोई परिवार चल सकता है, न ही कोई विश्व व्यवस्था!👏🫡