सियासत का अदालतों में दख़ल इंसाफ़ की फांसी

Wasim Akram Tyagi ✍✍

अक्षरधाम बम धमाके के आरोप में आदम अजमेरी, मुफ्ती अब्दुल क़य्यूम समेत जिन चार अन्य लोगों को निचली अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई थी। 16 मई 2014 को इन तमाम आरोपियो को सुप्रीम कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया था , साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि इन्हें इनके धर्म की वजह से गुजरात गृहमंत्रालय ने फंसाया था । यहां यह बताना जरूरी है कि गुजरात के अक्षरधाम मंदिर में 24 सितंबर 2002 को बम ब्लास्ट हुए थे। उस वक्त नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे, उन्होंने गुजरात गृहमंत्रालय अपने ही पास रखा था। कोर्ट ने इन बेगुनाहों को फंसाने में गुजरात के गृहमंत्रालय को जिम्मेदार बताया था।यानी अदालत के इस फैसले से यह बात साफ़ होजाती है की देश या राज्यों के ग्रह मंत्रालय जिसे चाहें आरोपी बना सकते हैं .

मुझे ज्यादा कुछ नहीं कहना सिर्फ इतना बताना है कि बटला हाउस एनकाउंटर आज तक सवालों के घेरों मे है, इस एनकाउंटर की जांच की मांग को लेकर अक्सर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं, विरोध प्रदर्शन का यह सिलसिला उस वक्त शुरु हुआ जब आज़मगढ़ को आतंकगढ़ कहा जाने लगा, आज़मगढ़ से लखनऊ और लखनऊ से दिल्ली तक हर साल इस एनकाउंटर की जांच की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। लेकिन इसकी जांच नहीं कराई गई, इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा को गोली कैसे लगी इसकी भी जांच नहीं हो सकी, अब निचली अदालत ने मोहन शर्मा की हत्या के लिए आरिज खान को दोषी पाया है।

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निचली अदालत के फैसले के बाद से भाजपा और मौजूदा कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद विपक्ष को घेर रहे हैं और मीडिया अपना ऐजेंडा चलाने मे लगा हुआ है। हमारे सामने ऐसे एक नहीं बल्कि कई मामले मौजूद हैं, जिसमें निचली अदालत ने किसी को आतंकी साबित कर सजा सुनाई हो, और फिर वही फैसला हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट ने पलटते हुए आतंकवाद के आरोप में निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए तथाकथित आतंकवादियों को बरी किया है।

फिलहाल रविशंकर प्रसाद, उनकी पार्टी और उनका मीडिया आरिज को दोषी ठहराए जाने पर ‘जश्न’ मना सकते हैं, लेकिन जश्न का माहौल वहां भी है जो लोग दो दिन पहले ही बीस साल की लंबी लड़ाई लड़ने के बाद आतंकवाद के आरोप में अदालत से बरी हुए हैं। आरिज को दिल्ली की साकेत कोर्ट ने दोषी ठहराया तो भाजपा एंव मीडिया समेत सबको नया ‘शिकार’ मिल गया, विपक्षी पार्टियो मुख्यतः कांग्रेस, टीएमसी पर निशाना लगाने का नया मुद्दा मिल गया।

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लेकिन उन 122 बेगुनाह ‘आतंकी’ की जिंदगी बर्बाद करने के लिए किसे दोषी ठहराए जिनके ऊपर लगा क्लंक 20 साल बाद साफ हुआ है। क्या सत्ताधारी दल के नेता एंव मीडिया इनकी बर्बादी की दास्तां देश को बताएगा? क्या इनके लिए मुआवज़े की मांग करेगा? क्या इन्हें फंसाने वाले गुजरात पुलिस के अफसरों के खिलाफ कार्रावाई की मांग उठेगी? शायद नहीं! क्योंकि यह सत्ताधारी दल और मीडिया की राजनीति को सूट नहीं करता, फिलहाल सत्ताधारी दल और मीडिया निचली अदालत के फैसले पर जश्न मनाएंगे, लेकिन निचली अदालतों का किरदार किसी से छिपा नहीं है।

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आतंकवाद के मामलों में निचली अदालतों के अक्सर फैसले बड़ी अदालत में पलटे गए हैं। सबसे बड़ा उदाहरण तो भारतीय संसद पर 13 दिसंबर 2001 को हुए आतंकी हमले का है। जिसका आरोप दिल्ली यूनिवर्सिटी के अरबी प्रोफेसर एस.ए. आर गिलानी पर भी लगा, गिलानी पर न सिर्फ आरोप लगा बल्कि उनकी गिरफ्तारी के बाद पुलिस द्वारा जो यातनाएं दीं गईं वे पुलिस की बर्बरता का जीता जागता सबूत था। प्रोफेसर गिलानी पर मुकदमा चला, निचली अदालत ने उन्हें भी फांसी की सजा सुनाई इस सज़ा के ख़िलाफ़ गिलानी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया।

जिस शख्स को निचली अदालत फांसी की सजा सुना रही हो, वही शख्स बड़ी अदालत से बाइज्जत बरी हो जाए, तो निचली अदालत के किरदार को आसानी से समझा सकता है। कुल मिलाकर इतना समझ लीजिए कि सिर्फ इक्का दुक्का मामले ही ऐसे हैं जिसमे निचली अदालत से ही न्याय मिल गया हो, बाक़ी आतंकवाद के आरोप में फंसाए गए अधिकतर मामलों में दस, बीस, पच्चीस वर्षों तक जेल काटने के बाद ही बड़ी अदालतों से झूठा ही सही लेकिन ‘न्याय’ मिला है।

Disclaimer (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं। इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति टाइम्स ऑफ़ पीडिया उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार टाइम्स ऑफ़ पीडिया के नहीं हैं, तथा टाइम्स ऑफ़ पीडिया उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है।

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