तीन सीटों से शुरू होकर 89 सीटों तक पहुँचने का सफ़र, दशकों की रणनीति, धैर्य और निरंतर संघर्ष का परिणाम है। 44 वर्षों की लंबी प्रतीक्षा और अनेक राजनीतिक परीक्षाओं के बाद भारतीय जनता पार्टी को बिहार में अपना पहला मुख्यमंत्री मिला। 15 अप्रैल को सम्राट चौधरी ने राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत की, जो नीतीश कुमार के 21 वर्षों के शासनकाल के बाद संभव हो सका।
यह क्षण ऐतिहासिक रहा, क्योंकि एक ओर नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय राजनीति की ओर कदम बढ़ाया, तो दूसरी ओर सम्राट चौधरी ने बिहार की सत्ता संभालते हुए भाजपा के दशकों पुराने सपने को साकार किया। बिहार भाजपा के लिए सदैव एक महत्वपूर्ण राज्य रहा है, जहाँ गठबंधन में अधिक सीटें जीतने के बावजूद लंबे समय तक पार्टी अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी।
यह उपलब्धि अचानक नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे वर्षों की मेहनत, संगठनात्मक विस्तार और रणनीतिक दूरदृष्टि रही है। कैलाशपति मिश्र, के.एन. गोविंदाचार्य और सुशील कुमार मोदी जैसे नेताओं ने जनसंघ के दौर से लेकर आधुनिक भाजपा तक संगठन को मजबूत आधार प्रदान किया। सुशील मोदी ने विशेष रूप से गठबंधन राजनीति में संतुलन स्थापित कर पार्टी को एक विश्वसनीय सहयोगी के रूप में स्थापित किया।
बिहार की राजनीति तीन प्रमुख चरणों से गुज़री—कांग्रेस का प्रभुत्व, गैर-कांग्रेसी शक्तियों का उदय, और मंडल व सामाजिक न्याय की राजनीति। इन दौरों से गुजरते हुए भाजपा ने धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाई। 1996 में समता पार्टी के साथ गठबंधन और 2005 में सत्ता में साझेदारी ने पार्टी के विस्तार को नई दिशा दी।
2017 और 2020 के चुनावों में भाजपा के बढ़ते प्रभाव ने नेतृत्व की दावेदारी को मजबूत किया, जिसका परिणाम 2025 में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के रूप में सामने आया।
निस्संदेह, बिहार में भाजपा का अपना मुख्यमंत्री बनना एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। हालांकि, भविष्य की चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। अब पार्टी के सामने अपनी नीतियों, नेतृत्व और विकास के वादों पर जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की बड़ी जिम्मेदारी है।

