बकरा फिसल गया….. वो गिर पड़ा

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वो तो क़ुर्बान होगये ………..

ईदुल अदहा या बक़रा ईद फिर आगई , और आकर चली जायेगी , इसी तरह से मुसलमान हज़ारों साल से इस पर्व(त्यौहार) को मनाते चले आरहे हैं , लगभग २ माह और १० दिन पहले ही रमज़ान का माह गुज़र कर चला गया , जो मिस्कीनों , भूकों और प्यासों के साथ हमदर्दी की याद दिलाता है ,क्या हम रमदान के उस त्यौहार से कुछ सबक़ लेपाये ,दोस्तों त्योहारों का का यह चक्र इंसान की ज़िंदगी में चलता रहेगा . मगर समाज में इसके सकारात्मक या मुस्बत नतीजे आये या नहीं यह सवाल भी बना रहेगा .

एक सवाल बड़ा यह है कि क्या इन त्योहारों का मक़सद सिर्फ एंटरटेनमेंट या नफ्सपरस्ती और अच्छे खानो का लुत्फ़ उठाना है ? और कुछ लोग त्योहारों को चंद टके कमाई का धंदा बना ले और बस फिर छुट्टी . इन त्योहारों के माध्यम से इंसान को कुछ सबक़ लेना चाहिए ?

दरअसल सभी मज़हबी त्यौहार या मज़हबों और धर्मों की प्रैक्टिस , इन्सान को उसके कर्तव्यों को याद दिलाने के लिए होते हैं और इंसान से हमदर्दी पैदा करने के लिए . हम फ़िलहाल बकरा ईद या ईदुल अज़हा की बात करेंगे .

यह फेस्टिवल इंसान को अपनी क़ीमती चीज़ें रब की राह में क़ुर्बान करने की याद दिलाता है .अगर अपने रब के लिए अपनी मेहबूब चीज़ क़ुर्बान करने का जज़्बा इस त्यौहार को मानाने के बाद नहीं आता , तो इसका मतलब यह समझ लेना चाहिए की हमारी क़ुरबानी क़ुबूल नहीं हुई , भले टूटा फूटा फ़र्ज़ पूरा होगया हो ….

रब की मंशा अपने नबी इब्राहीम (अ०स०व्०) को उनके बेटे इस्माइल की क़ुरबानी की नहीं थी बल्कि यह एक आज़माइश थी , जिसमें इब्राहीम (अ०स०व्०) पूरे पूरे कामयाब हुए .उनकी इस क़ुर्बानी को क़यामत तक आने वाली तमाम मुस्लिम नस्ल के लिए एक फ़र्ज़ क़रार दे दिया गया .

ताकि उसको यह याद रहे कि मुस्लमान से जब भी उसकी पसंदीदा चीज़ को रब की राह में क़ुर्बान करने के कहा जाए तो वो बा हुस्नो खूबी उसको क़ुर्बान करदे . मगर सच्चाई यह है की मुसलमान के अंदर से अपनी मेहबूब चीज़ को अपने रब के लिए क़ुर्बान करने का न सिर्फ जज़्बा निकल गया है , बल्कि उसका लालच और चीज़ों को अपने नफ़्स की रज़ा के लिए जमा करके रखने का मिज़ाज बन गया है .

खुद क़ुरबानी के गोश्त जिसको मिस्कीनों (निर्धन और ज़रुरत मंद ) लोगों में तक़सीम करने का हुक्म था उसको अगले २ माह तक अपने ही लिए फ्रिज में भर कर रख लेना आम बात बन गयी है .और अगर मिस्कीनों को मुस्लमान देता भी है तो घटया क़िस्म का गोश्त खुदा की राह में देता है और अच्छी क्वालिटी का खुद अपने लिए रख लेता है जबकि यह अमल इस त्यौहार के मक़सद के बिलकुल विपरीत (मुखालिफ) है . यहाँ तो अपनी पसंदीदा चीज़ खुदा की राह में देने का नाम ही क़ुरबानी है .

अब आप ही बताएं की इस नियत के साथ की गयी क़ुरबानी का आख़िरत में कुछ बदल मिल पायेगा ?
बुरे करतब भी करने और तवक़्क़ो नेक नामी की

आख़ीर में एक और ख़ास बात ,हदीस ए नबवी है “सफाई और पाकी आधा ईमान है , मगर अक्सर लोग इस मौके पर सफाई का ध्यान नहीं रखते , जिसके नतीजे में हमारे मोहल्लों और गलियों में क़ुरबानी के जानवरों के बाक़ियत को कुत्ते और परिंदे खींचते फिरते हैं जो खुद एक नापसंदीदा अमल है . और यह अमल समाज में उस वक़्त झगडे और फ़साद का भी ज़रिया बन जाता है जब समाज दुश्मन अनासिर (तत्व) को माहौल बिगाड़ने का सिर्फ इशारा चाहिए होता है .

हालांकि असामाजिक तत्व तो बिना किसी वजह के फ़साद का कोई भी बहाना तैयार करलेते हैं , चूंकि वो उनका धंदा होता है , लेकिन मुसलमान को अपनी तरफ से हदीस ए नबवी पर अमल की नीयत से सफ़ाई का ख़ास ख्याल रखना चाहिए और जानवरो के बाकियात(waste) को दफ़न करदेना चाहिए .अगर शहर के लोगों के पास इसके लिए ज़मीन का इंतज़ाम न हो तो वो मिनिस्पिल्टियों से इसकी डिमांड रखें ताकि उसका इंतज़ाम सरकारी तौर पर किया जाए , और कहीं कहीं सरकार इसका इंतज़ाम कराती भी है .

उम्मीद है इस बार हम क़ुर्बानी के गोश्त की सही तक़सीम के साथ साथ अपने अपने इलाक़ों में सफाई का ख़ास ख्याल रखेंगे और क़ुरबानी के इस त्यौहार से सबक़ हासिल करेंगे .शुक्रिया
आपका मुख्लिस
अली आदिल खान
एडिटर टाइम्स ऑफ़ पीडिया ग्रुप

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