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वो बैठे रहें , भले यह उठ जाएँ …

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क्या राज्यपाल बने रहेंगे ?

कोई आम आदमी जब संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ काम करे तो उसको सजा का प्रावधान है किन्तु जब महामहिम राजयपाल कोई असंवैधानिक और लोकतंत्र के ख़िलाफ़   काम करें तो उनकी सजा का क्या नियम है कर्नाटका के नाटक के बाद इसको जानना ज़रूरी होगया है .लेकिन यह आप खुद जान्ने की कोशिश करें चूंकि हमारे पास फिलहाल इस सम्बन्ध में जानकारी नहीं है .

 

अव्वल तो राष्ट्रपति या गवर्नर से यह उम्मीद ही नहीं की जासकती की वो कोई असंवैधानिक या लोकतंत्र की मर्यादा के ख़िलाफ़ कोई ग़ैर क़ानूनी काम करसकते हैं ,लेकिन यदि कर्नाटका जैसे कुछ उदाहरण आते हैं तो ऐसे में राजयपाल पर कोई मुक़द्दमा नहीं चलाया जासकता , दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भ्रष्टाचार के एक मामले में निचली अदालत द्वारा अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर खारिज करने का अनुरोध करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय में दलील दी कि एक राज्यपाल के खिलाफ इस तरह की कार्यवाही नहीं की जा सकती है।

दीक्षित के वकील महमूद प्राचा ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 361 (2) के तहत राज्यपाल के खिलाफ आपराधिक मामले की सुनवाई पर रोक है।

 

अनुच्छेद 361 (2) के तहत ‘कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल के खिलाफ किसी भी अदालत में कोई भी आपराधिक मामला नहीं चलाया जा सकता है।’

 

याद दिलादें की 2014 में जब शीला दीक्षित केरल की राजयपाल थीं तब शिकायतकर्ता विजेंद्र गुप्ता ने आरोप लगाते हुए एक शिकायत दर्ज कराई थी कि दीक्षित प्रशासन ने 2008 विधानसभा चुनाव के पहले विज्ञापन अभियान में 22.56 करोड़ रुपये के सार्वजनिक फंड का दुरुपयोग किया और निचली अदालत ने उनके खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया था।

 

इसके बाद तत्कालीन दिल्ली सरकार ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय का रुख किया जिसने इस पर रोक लगा दी थी ।

आज यदि हम कर्नाटक के परिपेक्ष में Governor विजुभाई वाला द्वारा बीजेपी को सरकार बनाने के लिए दिए गए आमंतरण की बात करें तो इस पर देश में जो चर्चा है उसमें यह निकलकर आता है की यह मोदी जी और अमित शाह के दबाव में उठाया गया क़दम था जो राजयपाल की मर्यादा , संविधान तथा लोकतंत्र के भी ख़िलाफ़  था , ऐसे में यदि कांग्रेस राजयपाल के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई करना चाहे तो उसका कोई लाभ नहीं होगा ,

 

लेकिन नैतिकता के आधार पर विजुभाई वाला को स्वम ही इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. फिलहाल वो ऐसा कोई क़दम उठाने नहीं जारहे हैं होसकता है अमित शाह और साहिब इनसे कोई और काम राज्य में लेना चाहते हों . इतना ही नहीं, आमतौर पर किसी  दल  को स्पष्ट  बहुमत नहीं होने की स्थिति में राज्यपाल 7 दिनों में नई सरकार को बहुमत साबित करने का समय देता है. लेकिन वाला ने येदियुरप्पा को 15 दिन का समय दिया. इस बीच कांग्रेस और जेडीएस, सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुकी थीं लेकिन इसका संज्ञान न लेते हुए राज्यपाल ने पहला मौका पाते ही बीजेपी की येदियुरप्पा सरकार को शपथ ग्रहण करा दी.

दिल्ली में पूर्व LG नजीब जंग और वर्तमान LG द्वारा केंद्र सरकार की शह पर दिल्ली सरकार को समय समय पर उनकी विकासशील योजनाओं में बाधा डालने का आरोप केजरीवाल और उनकी पार्टी लगाती ही रही है, जिसका मक़सद Public में यह सन्देश देना है की सरकार जनता की ज़रूरतों को पूरा करने और प्रगतिशील कार्यों को पूरा करने में नाकाम रही है, ऐसा माहौल बनाकर जनता को वर्तमान सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाने का काम किया जाता रहा है , ऐसा ही कुछ उन सभी राज्यों में कराया जासकता है जहाँ बीजेपी का शासन नहीं है ,जबकि यह प्रक्रिया देश के लोकतंत्र और संविधान को कमज़ोर करने के सिवा कुछ नहीं , केंद्र सरकार में बैठे नेताओं की अंतरात्मा खुद बता रही होगी की वो कितना ईमानदारी से अपना धर्म निभा रहे है .

 

आज जब केंद्र में बीजेपी की सरकार है, या मोदी जी की सरकार है.असल में यह भी आजतक तय नहीं है की सरकार है किसकी ? मोदी सरकार , बीजेपी सरकार या आरएसएस सरकार , जो भी हो हमारे लिए तो सरकार ही है ,देश में जनता की अज्ञानता और निरक्षरता उस वक़्त साफ़ झलकती है जब नेता अपने गुनाह दूसरे पर डालने का आरोप लगाते रहते हैं और ये जनता नेता जी के ज़िंदाबाद के नारे लगाती रहती है , जब नेता अपनी ज़बान जनता के मुंह में डालकर हाँ और ना का इक़रार कराता रहता है ,जब नेता झूठे वादों के नाम पर 5 – 5 वर्ष गुज़ारकर दुबारा जनता के सामने आता है और जनता फिर भी रट्टू तोते की तरह ज़िंदाबाद ही बोलता रहता है .

 

असल में जनता को ही जागरूक और साक्षर होना होगा और नेताओं के भाषण नहीं सुनने  बल्कि  उनसे संवाद करना होगा और पिछले वर्षों का लेखा जोखा लेना होगा , साथ ही उनके वादों की लिस्ट सामने रखकर बात करनी होगी , तभी देश के सियासी ढर्रे को बदला जासकता है वार्ना जनता खाती रहे 5 किलो प्याज या 100 जूते …

आज सुप्रीम कोर्ट के Judges घुटन महसूस कररहे हैं , judges का मर्डर होरहा है , judges पब्लिक की अदालत यानी मीडिया के सामने अपना दर्द ब्यान कर रहे हैं , यह स्वतंत्र देश के इतिहास में पहली बार ही हुआ .और अब एक के बाद दूसरी कर्नाटक काजीसी घटनाएं , राजयपाल अपने पद की परवाह किये बिना व्यक्ति विशेष या पार्टी के कहने पर असंवैधानिक क़दम उठा रहे हैं . देश में अराजकता का माहौल है . लोकतंत्र और संविधान की खुले आम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, पत्रकारों और लेखकों का क़त्ल आम बात हो गया  है ..देश में फिलहाल कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है ,और कितना खराब होगा इसका कोई अनुमान भी नहीं है .editor’s desk

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