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दिल्ली की सड़कें क्यों हुई लाल

दिल्ली की सड़कें क्यों हुई लाल

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राजधानी दिल्ली की सड़कें लाल रंग से भर गईं

New Delhi :नारे लग रहे थे ‘दिल्ली को लाल कर देंगें’ , “लेकिन खून से नहीं “.और राजधानी की सड़कें और गलियां कुछ घंटों के लिए लाल रंग से पट सी गईं.लाल रंग की टोपियां और क़मीज़ें पहने मज़दूर-किसान-कामगार, लाल रंग की ही साड़ी-ब्लाउज़ में महिला प्रदर्शकारियों ने आज बुधवार को दिल्ली की सड़कों पर अपनी मौजूदगी दर्शाते हुए केंद्र सरकार का मानो खून खुश्क करदिया हो .

इन प्रदर्शनकारियों ने रोज़गार, मंहगाई, किसानों के उगाए अनाज का बेहतर मूल्य और दूसरी मांगों को लेकर रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक मार्च किया.

इस प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग दिल्ली पहुंचे थे.

केरल से राजेश रामचंद्रन और मुमताज़ ,राज अनम्मा , मनोज पिल्लई , सुंसुम थॉमस कासरगोड से ख़ासतौर पर प्रदर्शन के लिए आए थे तो ज्योति महेश खैरनार ने महाराष्ट्र के धुलिया से यहां तक का लंबा सफ़र तय किया था. शुभम , मेराज , भुसन बोस , राजेश सेन , कोलकाता के एक कॉलेज में पढ़ते हैं, उन्होंने कहा हमको लगा की देश में बढ़ती साम्प्रदायिकता , बेरोज़गारी , असहिष्णुता , मोब लिंचिंग जैसे केसों को देखकर लगा कि उन्हें इस प्रदर्शन में शामिल होना चाहिए.

वामपंथी नेता और ऑल इंडिया किसान सभा के नेता हन्नान मोल्ला ने भी बात करते हुए दावा किया था कि तीन मज़दूर और किसान संगठन- सीटू, ऑल इंडिया किसान सभा और ऑल इंडिया एग्रीकल्चरल वर्कर्स एसोसिएशन; के नेतृत्व में निकाली जा रही ‘मज़दूर-किसान संघर्ष रैली’ में तक़रीबन तीन लाख लोग शामिल होंगे.

हालांकि तादाद को आंकना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन बुधवार को आयोजित संघर्ष रैली घंटों तक लुटयंस दिल्ली (जो नई दिल्ली का सेंट्रल हिस्सा है) की कई सड़कों पर एक अंतहीन पंक्ति के समान दिखी , जिसको लाखों की तादाद से ताबीर किया जा सकता है .

रैली के समापन के बाद संसद मार्ग पर भाषण में शामिल हन्नान मोल्ला ने कहा कि “यह रैली जो कि किसान-खेतिहर मज़दूर और मज़दूरों के आंदोलन के तीसरे चरण का हिस्सा थी, बहुत सफल रही.”

रैली में केरल से आये शिक्षक राजेश राजचंद्रन ने मोदी सरकार से डीज़ल और पेट्रोल की बढ़ती क़ीमतों को लेकर बेहद नाराज़गी जताई , उन्होंने कहा वे कहते हैं, “बुनयादी ज़रूरत की सारी चीज़ें इतनी मंहगी हो गई हैं कि आम आदमी का देश में जीना मुहार लगता है 4 वर्षों में लगभग 4 गुना हुए दाम की कीमतों का अगर एहि हाल रहा तो जनता आत्म हत्या पर आजायेगी , जिसका राशिओ अभी काम है .आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपय्या .


मंहगाई, पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती क़ीमतों, रोज़गार के घटते अवसर, सरकारी नौकरियों में रिक्त पदों के न भरे जाने, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य न मिलने जैसे मुद्दों को लेकर किसान-मज़दूर संगठनों ने जो हस्ताक्षर अभियान और धरने-प्रदर्शन किए थे, राजेश रामचंद्रन उसमें भी शामिल थे.

रामचंद्रन ने दावा किया कि उनके राज्य से कम से कम छह हज़ार लोग ख़ासतौर पर इस रैली में शामिल होने के लिए आए हैं .

महाराष्ट्र में धुलिया के नडाना गांव से आई नन्दा देवी सोनाल को शिकायत थी कि उन्हें स्कूल में खाना पकाने के काम के इतने कम पैसे मिलते हैं कि उससे उनका गुज़ारा नहीं हो पाता और वो चाहती हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य में मौजूद अपनी पार्टी की सरकार को ये निर्देश दें कि उन जैसे लोगों की सरकार बेहतर देखभाल करे.उनकी शिकायत थी कि इतने कम पैसे भी उन्हें कई महीनों तक नहीं मिलते.

रैली में हिस्सा लेने आए मदन लाल और विनोद सिंह पंजाब के लुधियाना में इन्कम टैक्स विभाग में पिछले 25 सालों से काम कर रहे हैं, लेकिन आजतक उनकी नौकरी पक्की नहीं हो पाई है जिसकी वजह से उन्हें बहुत सारी सुविधाएं जैसे छुट्टियां वग़ैरह नहीं मिल पाती हैं.

उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर से आए आज़ाद के साथ बड़ी तादाद में औरतें भी इस रैली में शामिल थीं. आज़ाद का कहना है कि वो आदिवासी हैं और वन विभाग के लोग उन्हें वहां से बेदख़ल कर देते हैं.जिससे हमारे परिवार का पालन पोषण मुश्किल होता है . आज़ाद और उनके सभी साथियों की मांग है कि उन्हें ज़मीनों का पट्टा दिया जाए.

रैली में शामिल होने आए तमाम लोगों की मांगें काफ़ी हद तक अलग-अलग सी नज़र आईं. रैली को कवर करने आए एक पत्रकार ने कहा भी कि रैली में मांगें कुछ बिखरी-बिखरी सी लगती हैं और इस रैली को आयोजित करने वाले नेताओं को चाहिए था कि इन्हें कुछ मुद्दों पर फ़ोकस करते.

पूर्व राज्य सभा सांसद हन्नान मोल्ला का कहना था कि ‘आज कि रैली में वो किसी तरह की मांग सरकार या किसी के सामने नहीं रख रहे हैं और इस रैली के ज़रिए वे बस हुकूमत को चेतावनी देना चाहते है कि अगर वो किसानों-मज़दूरों-कामगारों की आवाज़ को नहीं सुनेगी तो उसे सत्ता से बेदख़ल कर दिया जाएगा.

वामपंथी मज़दूर नेता ने कहा कि देश के 200 से अधिक किसान संगठन साथ आए हैं और उन्होंने फ़ैसला किया है कि 28, 29 और 30 नवंबर को वो किसान लॉन्ग मार्च निकालेंगे जो कई अलग-अलग रास्तों से दिल्ली में प्रवेश करेगी और 100 किलोमीटर के पैदल मार्च के बाद 30 नवंबर को सरकार को किसानों की मांग को लेकर विज्ञप्ति देगी.

आज की इस रैली में जहाँ एक ओर प्रदर्शन कार्यों की भारी भीड़ नज़र आई वहीँ इनको लीड करने वाले नेताओ की कमी दिखाई दी.अच्छी बात यह थी प्रदर्शनकारी उग्र नहीं थे और न ही आपत्तिजनक नारे बाज़ी कर रहे थे जबकि कुछ संगठनों के 50 प्रदर्शनकारी यदि इकठ्ठा होते हैं तो आपत्तिजनक नारों से उनकी रैली का आरम्भ होता है ऐसा लगता है जैसे उनका एक सूत्री कार्यक्रम एहि होता की एक ख़ास जाती या धरम के लोगों को उकसाकर दंगे कराये जाएँ .

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