गंगा मैया के सुपुत्र मोदी से गंगा का सवाल ,3 वर्ष से कहाँ रहा ग़ायब ?

गंगा की सफाई के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय गंगा परिषद की एक भी बैठक नहीं हुई,नियमों के उल्लंघन के साथ गंगा का भी किया अपमान ,नियम है कि परिषद की साल में एक बैठक ज़रूर होनी चाहिए.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली ‘राष्ट्रीय गंगा परिषद’ (नेशनल गंगा काउंसिल या NGC) गंगा सफाई के लिए बनाई गयी कौंसिल की आज तक एक भी बैठक नहीं हुई है. इसका खुलासा द वायर न्यूज़ पोर्टल द्वारा दायर किए गए सूचना का अधिकार आवेदन से हुआ है. नियम के मुताबिक साल में कम से कम एक बार इस परिषद की बैठक होनी चाहिए.
याद रहे अक्टूबर 2016 में नेशनल गंगा कौंसिल (NGC) का गठन किया था. जिसका मक़सद गंगा का संरक्षण, सफाई और प्रबंधन करना था . सात अक्टूबर 2016 को जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि राष्ट्रीय गंगा परिषद अपने विवेक से हर साल कम से कम एक या एक से अधिक बैठकें आयोजित कर सकती है.
हालांकि 8 जनवरी 2019 को आरटीआई आवेदन के ज़रिये जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय के अधीन संस्था राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) से मिली जानकारी से खुलासा हुआ है कि इसके गठन के 30 माह समय बीत जाने के बाद भी आज तक राष्ट्रीय गंगा परिषद की एक भी बैठक नहीं हुई है. गंगा सफाई की दिशा में हो रहे कार्यों को देखने के लिए राष्ट्रीय गंगा परिषद संभवत: सबसे बड़ी समिति है.और जिसकी अध्यक्षता की ज़िम्मेदारी खुद प्रधान सेवक यानी गंगा सुपुत्र यानी नरेंद्र मोदी की है .
बता दें कि राष्ट्रीय गंगा परिषद के गठन से पहले यह राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण (NGRBA) हुआ करती थी और इस समिति के भी अध्यक्ष प्रधानमंत्री हुआ करते थे.

NGRBA का गठन कांग्रेस की अगवाई वाली UPA 2nd सरकार के साल 2009 में किया गया था. इसकी पहली बैठक तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में पांच अक्टूबर 2009 को हुई थी.
2009 से लेकर 2012 तक में एनजीआरबीए की कुल तीन बैठके हुई थीं और मनमोहन सिंह ने तीनों बैठकों की अध्यक्षता की थी. इसके बाद 2014 और 2016 के बीच तीन बैठकें हुई थीं, जिसमें से दो बैठकों की अध्यक्षता तत्कालीन जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने की थी. 26 मार्च 2015 को हुई एनजीआरबीए के बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी.
पर्यावरण चिंतक रवि चोपड़ा ने कहा कि इससे पता चलता है कि प्रधानमंत्री गंगा नदी की सफाई को लेकर कितना serious हैं. उन्होंने कहा, ‘गंगा को लेकर यह आख़िरी निर्णायक बॉडी है. इसकी कम से कम साल में दो बैठक होनी चाहिए थी. अगर प्रधानमंत्री एक भी बैठक नहीं कर पा रहे हैं तो इससे सवाल उठता है कि क्या वाकई में ये कोई निर्णायक बॉडी है या सिर्फ जुमला है ?
राष्ट्रीय गंगा परिषद में प्रधानमंत्री के अलावा जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री उपाध्यक्ष के पद पर होते हैं. इसके अलावा पांच राज्यों- बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री समेत केंद्रीय पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री, वित्त मंत्री, केंद्रीय शहरी विकास मंत्री, नीति आयोग के उपाध्यक्ष आदि इसके सदस्य होते हैं.

याद रहे दिसंबर 2017 में जारी राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) पर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की ऑडिट रिपोर्ट में सरकार द्वारा इस दिशा में सही से काम न करने के कारण फटकार लगाई गई थी. रिपोर्ट में नदी की सफाई, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की स्थापना और घरों में शौचालयों के निर्माण से संबंधित देरी और गैर-कार्यान्वयन पर प्रकाश डाला गया है.
मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली प्राक्कलन समिति (Estimates Committee) ने गंगा संरक्षण के विषय पर अपनी पंद्रहवीं रिपोर्ट (16 वीं लोकसभा) में गंगा सफाई को लेकर सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर घोर निराशा जताई थी और इस कार्य के लिए एक व्यापक और अधिकार प्राप्त प्राधिकरण का निर्माण करने की सिफारिश की थी.
खास बात ये है कि सरकार ने इस सिफारिश पर समिति को दिए जवाब में ये दावा किया था कि गंगा सफाई के लिए जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर एक पांच स्तरीय तंत्र तैयार किया है जिसमें से राष्ट्रीय गंगा परिषद सबसे प्रमुख है.
हालांकि कैग और संसदीय समिति समेत कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा गंगा सफाई को लेकर चिंता जताने के बाद भी राष्ट्रीय गंगा परिषद की एक भी बैठक न करना नरेंद्र मोदी सरकार के गंगा सफाई के दावे पर सवालिया निशान खड़ा करता है.
