
सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि धार्मिक आधार पर ‘वंदे मातरम्’ न गाने पर आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए.
2026 के नए कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है, इस याचिका में ‘बिजो इमैनुएल’ फैसले का हवाला दिया गया था
‘वंदे मातरम्’ का मतलब है “हे माँ, मैं तुझे नमन करता हूँ” या “माँ, आपको प्रणाम है।” राष्ट्रगीत के संदर्भ में “माँ” का सरल मतलब मातृभूमि से लिया जाता है। दरअसल वन्दे मातरम् के इस पूरे सियासी खेल में Controvercy आस्था की नहीं बल्कि सत्ता के आसान की है.
मुसलमान भारत की धरती पर दिन में 60 मर्तबा अपना माथा टेकता है. लेकिन फ़र्क़ यह है कि यह धरती के बनाने वाले के हुक्म से माथा टेका जाता है, और इसके बिना नमाज़ जैसी इबादत पूरी नहीं होती. जबकि ‘वंदे मातरम्’ के पीछे धरती को मान का रूप देकर उसका साक्षात्कार नमन, उपासना या इबादत की कल्पना की जाती है, या नहीं भी की जाती हो इसका कोई आध्यात्मिक प्रमाण नहीं है . बल्कि यह पूरा विषय ही राजनितिक और धार्मिक भरम की स्थिति बना हुआ है.
अब ऐसे में ‘वंदे मातरम्’ कि बहस देश के विकास के लिए कितना ज़रूरी है यह जनता अच्छी तरह जानती है. लेकिन आस्था का अपना मक़ाम होता है अब वो किसी भी मज़हब के मानने वालों की हो….. लेकिन जब किसी लोकतान्त्रिक देश में आस्था पर सियासत को सत्ता में आने के लिए लादा जाता है तो विकास का दम घुटने लगता है. और अगर ऐसा दुनिया में हर मुल्क करने लगे तो धरती का निज़ाम दरहम बरहम हो जायेगा.
आपको बता दें विदेशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की कुल संख्या लगभग 3.5 करोड़ (35.4 मिलियन) है, जो दुनिया में सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है. सबसे अधिक भारतीय प्रवासी संयुक्त अरब अमीरात (UAE), अमेरिका और सऊदी अरब में रहते हैं.
अगर इन सब प्रवासियों पर वहां के देशों की धार्मिक आस्था और शरीयत को लागू की जाए तो यह कूटनीतिक यानी Diplomatic रिश्तों के साथ मानधिकारों का भी हनन कहलायेगा और वैश्विक संबंधों के लिए घातक होगा.
फिलहाल ‘वंदे मातरम्’ को लेकर देश में चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि जो व्यक्ति धार्मिक विश्वास यानी मज़हबी अक़ीदे या अंतरात्मा की आवाज़ के कारण ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाता, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह अभी अंतिम फैसला नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और आगे की सुनवाई के लिए मामला सुरक्षित रखा है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टी.एम. कृष्णा की उस याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें उन्होंने 2026 में किए गए उस कानूनी संशोधन को चुनौती दी है, जिसके तहत ‘वंदे मातरम्’ से मुताल्लिक़ कुछ गतिविधियों को दंडनीय अपराध माना गया है। इसके अलावा, कृष्णा की याचिका में गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को भी चुनौती दी गई है, जिनमें आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सभी छह अंतरे गाने को कहा गया है.
याचिका में 1971 के Prevention of Insults to National Honour Act में किए गए 2026 के Amendment यानी संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
याचिका का एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अगर कोई नागरिक अपनी धार्मिक मान्यता या अंतरात्मा की आवाज़ के कारण ‘वंदे मातरम्’ की एक दो या सभी पंक्तियाँ गाने से इनकार करता है, तो उसे आपराध कैसे माना जा सकता है? आपको बता दें, 2026 में किए गए संशोधन के बाद कानून में वन्दे मातरम को लेकर भी दंडात्मक प्रावधान जोड़े गए हैं।
इस क़ानूनी संशोधन के तहत किसी भी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने या ऐसे गायन में बाधा डालने पर जेल, जुर्माने या दोनों का प्रावधान है। रिपोर्टों के अनुसार अधिकतम सजा तीन वर्ष तक की जेल हो सकती है।
यही प्रावधान अब सुप्रीम कोर्ट के सामने संवैधानिक सवाल बनकर आया है। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने 1986 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक Bijoe Emmanuel बनाम State of Kerala फैसले का हवाला दिया।
कोर्ट ने संकेत दिया कि उस फैसले में स्थापित कानून को मौजूदा मामले में भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। अदालत की टिप्पणी का सार था कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक विश्वास या अंतरात्मा की आपत्ति के कारण ‘वंदे मातरम्’ के एक या सभी अन्तरे गाने से इनकार करता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
एक रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा कि उसे उम्मीद है कि Bijoe Emmanuel मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून इस मामले पर भी लागू होगा।
क्या था Bijoe Emmanuel मामला?
यहां सुप्रीम कोर्ट का 1986 का फैसला बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। Bijoe Emmanuel बनाम State of Kerala मामले में तीन स्कूली बच्चों ने अपने धार्मिक विश्वास के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन राष्ट्रगान बजने के दौरान वे सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे।
सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में कहा था कि केवल राष्ट्रगान न गाने को, जब व्यक्ति सम्मानपूर्वक व्यवहार कर रहा हो, अपने आप में राष्ट्रगान का अपमान नहीं माना जा सकता। लिहाज़ा राष्ट्रगान को या गीत को गाना नहीं बल्कि उसका सम्मान महत्वपूर्ण है. इसका मतलब गान या गीत के लिए किसी को भी मजबूर नहीं किया जा सकता.
इसी संवैधानिक सिद्धांत को मौजूदा ‘वंदे मातरम्’ मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहां एक बड़ा अंतर सामने आता है. यानी राष्ट्र गान या गीत का सम्मान एक बात है और किसी व्यक्ति को किसी विशेष तरीके से अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए मजबूर करना दूसरी बात। सुप्रीम कोर्ट फिलहाल इसी संवैधानिक सवाल की जांच कर रहा है, और सरकार से इसपर विचार करने का भी इशारा दे रहा है।
‘वंदे मातरम्’ का सम्मान देशभक्ति का विषय हो सकता है, लेकिन उसे कानून के जरिए थोपना लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। भक्ति…देश और धरती के बनाने वाले की होती है जबकि प्रेम देश से होना चाहिए. भक्ति का संबंध धार्मिक आस्था और प्रेम का संबंध क़ुर्बानी से है. इसके लिए क़ानून बनाने की ज़रुरत नहीं होती. विडंबना यह है जिनकी देश के लिए कोई क़ुर्बानी नहीं वो देशप्रेम का पाखंड करते हैं। किसी नागरिक की धार्मिक आस्था और अंतरात्मा की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए राष्ट्रप्रेम को कानून की बाध्यता में बदलने से बचना चाहिए।