ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है,बढ़ता है तो मिट जाता है

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उत्तर प्रदेश में नागरिक अधिकार का उल्लंघन और लॉ एंड ऑर्डर सिस्टम का दुरुपयोग

पिछले दिनों लखनऊ में UP सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ The National Confederation of Human Rights Organisations (NCHRO) द्वारा संयुक्त प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया . जिसमें देश की कई नामचीन हस्तियों ने भाग लिया , तथा मुल्क में संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करने वाले लोगों और संस्थाओं पर राज्य सरकारों और केंद्र सरकार द्वारा की जा रही मनमानी कार्रवाई को Unconstitutional बताया , और इस कार्रवाई को सरकार की Failure पर पर्दा डालने की कोशिश कहा .


अब लॉकडाउन के हालात का दुरुपयोग राज्य के सभी विरोधियों से इंतकाम लेने के लिए किया जा रहा है। पुलिस आए दिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, नेताओं, छात्रों और निर्दोष लोगों को डरा-धमका रही है और उन्हें परेशान कर रही है। उन्हें फर्ज़ी मुकदमों में फंसाकर उन पर काले कानून थोपे जा रहे हैं। गैर-अदालती हत्याओं, गैरकानूनी गिरफ्तारियों और निर्दोषा लोगों को परेशान करने की घटनाएं खतरनाक हद तक बढ़ रही हैं।


ज़रूरी है कि कानपुर और यूपी के अन्य हिस्सों में हुई कुछ अपराधियों की गैर-अदालती हत्या पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में न्यायिक जांच कराई जाए।


यूपी पुलिस सामाजिक कार्यकर्ताओं को दंगाई का नाम देकर उनकी धरपकड़ कर रही है। पुलिस के अत्याचार को सही ठहराने के लिए लोगों की जायज़ आवाज़ों को देश-विरोधी बताया जा रहा है। हाल ही में सरकारी अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यायल (एएमयू) के छात्र कार्यकर्ता शर्जील उस्मानी को फर्ज़ी मुकदमों में गिरफ्तार किया गया।

Popular Front Of India (PFI) की प्रदेश एड्हाॅक कमेटी के सदस्य मुफ्ती मोहम्मद शहज़ाद को इसलिए गिरफ्तार किया गया, क्योंकि उन्होंने हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें यह दरख्वास्त की गई थी कि उत्तर प्रदेश में 19 दिसम्बर 2019 को और उसके बाद सीएए/एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के किसी मौजूदा या पूर्व जज के नेतृत्व में निष्पक्ष न्यायिक जांच कराई जाए।

डॉक्टर कफील की गिरफ्तारी इंतकामी राजनीति का खुला सुबूत है, जिसके तहत बीजेपी सरकार उनकी जिं़दगी को तबाहो बर्बाद करने के लिए हर रास्ता अपना रही है। ऐसे कई कार्यकर्ताओं को फर्ज़ी मामलों में जेलों में डाला और उन्हें लगातार परेशान किया जा रहा है। इन कार्यकर्ताओं के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) एक्ट (यूएपीए) और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका या एनएसए) जैसे काले कानून इस्तेमाल किए जा रहे हैं।


विडम्बना यह है कि उन कार्यकर्ताओं के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंग्स्टर व समाज विरोधी गतिविधियां (रोकथाम) एक्ट, 1986 (गैंग्स्टर एक्ट) और यूपी गुंडा (रोकथाम) एक्ट, 1970 (गुंडा एक्ट) जैसे काले कानून इस्तेमाल किये जाते हैं, जिन्होंने देश में जीने के अपने अधिकार के लिए लोकतांत्रिक तरीके से लड़ाई लड़ी, जबकि असल गुंडे, गैंग्स्टर और समाज विरोधी तत्व पूरे राज्य में आज़ाद घूम रहे हैं और उन्हें माफी हासिल है। इसके अलावा उन सामाजिक कार्यकर्ताओं पर एक के बाद एक फर्ज़ी मुकदमे लगाए जा रहे हैं, जो पहले से ही जेल में हैं या जो ज़मानत पर रिहा हो चुके हैं।


यूपी प्रशासन ने अब सीएए-विरोधी प्रदर्शनों के दौरान हुई कथित तोड़फोड़ का हर्जाना वसूल करने के बहाने लोगों की संपत्तियां कुर्क करने की एक और नई अत्याचारी कार्यवाही शुरू कर दी है।

किसी पर भी दंगों में शामिल होने का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया जा सकता है और उसकी संपत्ति को कुर्क किया जा सकता है। यह लोगों को जेलों में डालकर न केवल उनकी ज़िंदगी बर्बाद करने, बल्कि उनकी संपत्तियों से उन्हें बेदखल करके उनके भविष्य को हमेशा के लिए तबाह करने की एक नई रणनीति है।

राज्य सरकार ऐसी अलोकतांत्रिक तथा हिंसक कार्यवाहियों द्वारा राज्य में हर तरह के विरोध को नेस्तनाबूद कर देना चाहती है। दुर्भाग्य की बात है कि राज्य की बड़ी अपोज़िशन पार्टियां इन मुद्दों पर खामोश हैं और इस तरह वे राज्य सरकार को इन कार्यवाहियों को अंजाम देने का खुला रास्ता दे रही हैं।


यह संयुक्त प्रेस वार्ता यूपी सरकार की तानाशाही कार्यवाहियों की कड़ी निंदा करती है। हम समझते हैं कि सांप्रदायिक राजनीति को खारिज करने वाले सभी राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे आगे आएं और उत्तर प्रदेश में मानवाधिकार के उल्लंघन के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करें।

साथ ही संवैधानिक मूल्यों पर यकीन रखने वाले देश के हर नागरिक और नागरिक समाज को शांतिपूर्ण तरीके से इसके खिलाफ कदम उठाना चाहिए। हमारा यह भी मानना है कि उत्तर प्रदेश में राजकीय अत्याचार के पीड़ितों को हर तरह की कानूनी एवं लोकतांत्रिक मदद देना देश की लोकतांत्रिक ताकतों का कर्तव्य है।

प्रेस वार्ता में भाग लेने वाले प्रतिनिधिः

  1. रवि नायर, ऐसएएचआरडीसी, दिल्ली
  2. उबेदुल्ला ख़ान आज़मी, पूर्व सांसद, उत्तर प्रदेश
  3. सीमा आज़ाद, संपादक, दस्तक, इलाहाबाद
  4. एडवोकेट शरफुद्दीन अहमद, उपाध्यक्ष, एसडीपीआई
  5. एडवोकेट के.के. राॅय, इलाहाबाद हाई कोर्ट
  6. ई.एम. अब्दुल रहमान, वाइस चेयरमैन, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया
  7. राजीव यादव, महासचिव, रिहाई मंच, उत्तर प्रदेश
  8. एडवोकेट ए. मोहम्मद यूसुफ, राष्ट्रीय सचिव, एनसीएचआरओ

एडवोकेट ए. मोहम्मद यूसुफ
प्रेस कॉन्फ्रेंस कन्वीनर
मो॰ 9489871185, 9600222930
ईमेलः yusuffmadurai@gmail.com

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