श्रद्धा के राम बनाम सत्ता के राम

कपिल बर्मन (जागृत भारत)

श्रद्धा के राम बनाम सत्ता के राम: धर्म की शुचिता और नीति का धर्मसंकट

भारतीय सांस्कृतिक चेतना के मूल में मर्यादा पुरुषोत्तम राम एक ऐसी धुरी हैं, जिनका महात्म्य महलों के वैभव से नहीं, बल्कि जंगलों के त्याग, शबरी के जूठे बेरों के अनुराग और केवट के प्रति समभाव से निर्मित हुआ है। राम शब्द की व्युत्पत्ति ही ‘आराम’ (आत्मिक शांति) से है, जिसका स्मरण मात्र मनुष्य को आंतरिक संतोष और नैतिक बल देता है। यह ‘श्रद्धा के राम’ हैं, जो अहंकार, घृणा और हिंसा से कोसों दूर हैं।

किंतु, समकालीन परिदृश्य में ‘श्रद्धा के राम’ के समानांतर ‘सत्ता के राम’ की एक नई अवधारणा खड़ी कर दी गई है। यहाँ राम आस्था और नैतिकता के प्रतीक न होकर, राजनीतिक लाभ, ध्रुवीकरण और सत्ता प्राप्ति का साधन बना दिए गए हैं। जब धर्म का उपयोग जनमानस की भावनाओं के दोहन के लिए होने लगता है, तब समाज का ध्यान उन बुनियादी नैतिक और तथ्यात्मक मुद्दों से भटक जाता है जो किसी भी राज्य की रीढ़ होते हैं।

आस्था का आवरण और संसाधनों की लूट

‘सत्ता के राम’ का सबसे बड़ा संकट यह है कि यह जनभावनाओं को इतना उद्वेलित कर देता है कि आम नागरिक अपने वास्तविक अधिकारों और व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को देख नहीं पाता। इसका सबसे सटीक और ज्वलंत उदाहरण कृषि प्रधान व्यवस्थाओं में देखने को मिलता है, जहाँ एक ओर धर्म का जयघोष होता है, तो दूसरी ओर ‘धान चोरी’ (कृषक उपज की कालाबाजारी और संस्थागत लूट) जैसे गंभीर आर्थिक और नैतिक अपराध फलते-फूलते हैं।

तथ्यात्मक विश्लेषण बताता है कि जब सत्ता धर्म को ढाल बनाती है, तब प्रशासनिक जवाबदेही (Accountability) समाप्त होने लगती है। उदाहरण के लिए, मंडियों में किसानों के हक के धान की चोरी, बिचौलियों द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का हड़पा जाना और तौल में हेराफेरी जैसी घटनाएं केवल आर्थिक नुकसान नहीं हैं; ये उस रामराज्य की परिकल्पना की हत्या हैं जहाँ “न कोउ दुखी न दीन न हीना” की बात कही गई थी।

जब व्यवस्था ‘धान की चोरी’ जैसी जमीनी हकीकतों को धर्म के शोर में दबा देती है, तब वह सीधे तौर पर उस शबरी के राम का अपमान करती है जो वंचितों और शोषितों के रक्षक थे।

धर्म आधारित राजनीति बनाम तथ्यात्मक सत्य

धर्म आधारित विमर्श अक्सर अमूर्त (Abstract) होता है, जो भावनाओं पर चलता है। इसके विपरीत, सुशासन और लोक-कल्याण ‘तथ्यों’ पर चलते हैं।

  • श्रद्धा के राम: न्याय, ईमानदारी और प्रजा के प्रति समर्पण सिखाते हैं।

  • सत्ता के राम: प्रतीकों की राजनीति करते हैं, जहाँ अस्पतालों, स्कूलों, रोजगार और किसानों की बदहाली जैसे वास्तविक आंकड़े (Data) राष्ट्रवाद और धार्मिक अस्मिता के विमर्श के पीछे धकेल दिए जाते हैं।

यदि किसी समाज में राम के नाम पर गगनचुंबी जयकारे तो लग रहे हों, लेकिन उसी समाज का अन्नदाता अपनी ही फसल की चोरी रोकने के लिए मंडियों में लाचार खड़ा हो, तो यह मान लेना चाहिए कि वहाँ श्रद्धा पर सत्ता हावी हो चुकी है। यह सत्ता द्वारा आस्था का वह क्रूर दोहन है, जहाँ धर्म का नाम तो लिया जाता है लेकिन धर्म के मूल्यों (जैसे सत्य और न्याय) को ताक पर रख दिया जाता है।

निष्कर्ष: चुनाव हमारा है

लेखक और विचारक अज्ञेय की पंक्तियों की प्रतिध्वनि “तय करो किस ओर हो तुम, आदमी हो या आदम” आज के दौर का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न है। आदम होना मात्र जैविक अस्तित्व है, लेकिन ‘आदमी’ होना नैतिक चेतना का प्रमाण है।

हमें यह तय करना होगा कि हमारे राम कौन से हैं? क्या हमारे राम वे हैं जो हमें न्याय के पक्ष में खड़ा होना सिखाते हैं, जो हमें व्यवस्था से यह पूछने का साहस देते हैं कि गरीब का धान किसने चुराया? या हमारे राम वे हैं जो हमें सत्ता के अहंकार, घृणा और विभाजनकारी नीतियों का मूक दर्शक बना देते हैं?

सच्ची धार्मिकता वही है जो सत्ता के गलियारों से मुक्त होकर मनुष्यता, करुणा और सामाजिक न्याय के धरातल पर उतरे।

यदि हम आज भी ‘धान चोरी’ जैसी वास्तविक और दमनकारी व्यवस्थाओं पर चुप रहकर केवल प्रतीकात्मक राम के पीछे भाग रहे हैं, तो हम आदमी होने की कसौटी पर विफल हो रहे हैं। राम सत्ता के सिंहासन पर नहीं, बल्कि न्यायप्रिय समाज की आत्मा में निवास करते हैं।

 

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