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सरकार लोगों को संगठित कर समस्याओं का समाधान करे :एस.एस.ए

सरकार लोगों को संगठित कर समस्याओं का समाधान करे :एस.एस.ए

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5 अप्रैल 2021 को नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में जारी किया गया वक्तव्य

Maulana K R Sajjad Nomani (Islamic Scholar)
, Justice B G Kolse Patil (Former Judge, Mumbai High Court )
, Raj Ratan Ambedkar (President, The Buddhist Society of India), Muhammad Shafi (National General Secretary, SDPI)
, Bhadant Anand, Bodh Guru, P. I Jose, Advocate Supreme Court

नई दिल्ली 5 अप्रैल 2021/ Press Release : संवैधानिक मूल्यों और अधिकारों के संरक्षण के लिए भारतीय नागरिकों का एक संयुक्त मंच – संविधान सुरक्षा आन्दोलन (एस.एस.ए.) ने राय सिन्हा रोड स्थित Press Club में एक प्रेस संगोष्ठी का आयोजन किया , जिसमें देश के सुप्रसिद्ध पूर्व नयायधीश और धर्म गुरुओं तथा समाज सेवियों ने अपनी बात रखी. भारत सरकार से विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम (को वापस लेने और आगामी 2021 जनगणना की प्रक्रिया से राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एन.पी.आर.) को हटाने का ज़ोरदार आग्रह किया ।

‘आन्दोलन’ के सभापतिमंडल की ये भी मांग हैं कि सरकार देश को एक स्पष्ट आश्वासन दे कि वह राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एन.आर.सी.) के काम को आगे नहीं बढ़ाएंगी।

सीएए-एनआरसी-एनपीआर के संयुक्त कदम ने भारतीय नागरिकों के एक बड़े वर्ग के बीच गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं और कोविड-19 महामारी के प्रकोप से पहले, पूरे साल भारत के सभी हिस्सों में बेहद तनाव और अशांति पैदा कर दी थी। सीएए को लागू करने, जनगणना में एनपीआर को शामिल करने और एनआरसी के बारे में केंद्र सरकार की ओर से आयेदिन भ्रमित करने वाले बयानों ने भारतीय अमन पसंद समाज में गहरी चिंता और खौफ़ पैदा किया है।

एस.एस.ए के सभापतिमंडल ने कहा , इस परिस्थिति ने गरीबों, कमजोर वर्गों, दलितों, आदिवासियों, सांस्कृतिक और धार्मिक अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों जैसे संभावित पीड़ितों को भारी संख्या में सड़कों पर उतरने पर मजबूर कर दिया. आजादी के बाद पहली बार न केवल देश और राज्यों की राजधानियों में बल्कि भारत के दूरदराज़ के गली कूचों में भी अपनी नागरिकता बचाने के लिए जनता का सिलसिलेवार विरोध देखा गया। ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार ने अपने ही नागरिकों की समस्याओं को सुनने की बजाय शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाने के लिए बल का उपयोग किया।

केंद्र सरकार और कुछ राज्य सरकारें अभी भी आन्दोलन कि पहली पंक्ति में खड़े होकर लोहा ले रहे व्यक्तियों और संगठनो के खिलाफ राजनीतिक और सांप्रदायिक प्रतिशोध का एजेंडा चला रहीं हैं। अब भी, सैकड़ों लोकतांत्रिक प्रदर्शनकारी जेल में हैं और अधिक से अधिक व्यक्तियों को झूठे मामलों में फंसाया गया है। इन दमनकारी हथकंडों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को भी धूमिल किया है। ‘आन्दोलन’ पुनः केंद्र सरकार को उसकी संवैधानिक ज़िम्मेदारी याद दिलाता है और आग्रह करता है कि सीएए-एनआरसी-एनपीआर सरीखे विवादास्पद क़दमों को वापस ले और भारत के नागरिकों की बिना किसी भेदभाव के रक्षा करें।

‘आंदोलन’ देश की जनता का आह्वान करता है कि अगर नागरिकता विरोधी कानूनों को लागू करने से सरकार बाज नहीं आती तो लोग नागरिकता आंदोलन के अगले पड़ाव के लिए तैयार हो जाएं।

देश इस वक्त आर्थिक तंगी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है जहां महामारी की दुश्वारियों के साथ साथ आवश्यक वस्तुओं के दाम सातवें आसमान पर हैं और बेरोजगारी बढ़ रही है. संकट की इस घड़ी में सरकार लोगों को संगठित कर समस्याओं के समाधान करने की बजाय संवैधानिक संस्थाओं, जांच एजेंसियों और दमनकारी कानूनों का दुरुपयोग कर लोगों को जाति धर्म में बाटकर आंदोलनकारियों को निशाना बना रही है. इस संदर्भ में संविधान सुरक्षा आंदोलन ऐसे विभिन्न कानूनों और नीतियों का संज्ञान लेता है जो भारतीय नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन कर रहे हैं:

कृषि कानून

तीनों कृषि कानून संबंधित हितधारकों से विचार विमर्श किए बिना ही पारित कर दिए गए। तीनों कृषि कानूनों को निरस्त कराने के लिए आंदोलन कर रहे किसानों के प्रति केंद्र सरकार का रवैया ना केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है बल्कि बेहद निंदनीय है।

धर्म परिवर्तन विरोधी कानून

शादी ब्याह के लिए धर्म परिवर्तन का हवाला देते हुए कई भाजपा शासित राज्यों ने धर्म परिवर्तन विरोधी कानून पारित कर लिए हैं। इन कानूनों की भूमिका तैयार करने के लिए संघ परिवार ने सुनियोजित साजिश के तहत “लव जिहाद” और “घर वापसी” के काल्पनिक प्रोपेगेंडा तैयार कर लिए हैं।

यूएपीए और देशद्रोह कानून

आजादी के बाद लागू कानूनों में से गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए केंद्र सरकार द्वारा लागू किया गया सबसे दमनकारी कानून है। 2008 से 2019 के बीच यूएपीए कानून में सरकार ने कई संशोधन किए ताकि वे आसानी से वैचारिक मतभेद वाले किसी भी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी और अवैध घोषित कर सकें। यह बेहद निंदनीय है कि सरकार इस काले कानून यूएपीए और देशद्रोह कानून का दुरुपयोग कर रही हैं जो कि स्वतंत्रता संग्राम का गला घोटने के लिए अंग्रेजी हुकूमत द्वारा बनाया गया एक दमनकारी कानून है।

इन कानूनों को बड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं, कवियों, वकीलों, शिक्षाविदों कलाकारों और ऐसे सभी व्यक्तियों पर इस्तेमाल किया जा रहा है जिन्होंने समाज के हाशिए पर पड़े तबके के उत्थान लिए अपना जीवन समर्पित किया और फासीवादी सरकार के खिलाफ विरोध के स्वर बुलंद कर रहे हैं। ‘आंदोलन’ यूएपीए देशद्रोह और अन्य कानूनों को निरस्त करने के लिए एक संयुक्त जन आंदोलन तैयार करना चाहता है।

राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ केंद्र सरकार की एजेंसियों का दुरुपयोग मोदी के दूसरे कार्यकाल में एक आम बात हो गई है। एनआईए, सीबीआई, ईडी और आईटी विभाग सत्तारूढ़ दल के हाथ की कठपुतली बन गए हैं। सरकार की जनविरोधी लोकतंत्र विरोधी नीतियों, कानूनों और कदमों का विरोध करने वाले व्यक्तियों और संगठनों के खिलाफ दमनकारी यूएपीए और देशद्रोह कानून इस्तेमाल करने के अलावा इन एजेंसियों का भी दुरुपयोग किया जाता है।

सरकार की जनविरोधी योजनाओं का विरोध कर रहे नागरिकों पर केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का संविधान सुरक्षा आंदोलन कड़ा एतराज जताता है। ‘आंदोलन’ देश भर के सभी जागरूक सामाजिक संगठन, राजनीतिक दल एवं अन्य समूह से आग्रह करता है कि वे भाजपा सरकार के निरंकुश फासीवादी और सांप्रदायिक रवैया के खिलाफ आवाज बुलंद करें और एकजुट होकर इस देश के विविधता में एकता की मूल भावना को सुरक्षित रखें।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाग लेने वाले सभापतिमंडल के सदस्य:

1 मौलाना के आर सज्जाद नोमानी; इस्लामिक स्कॉलर

2 जस्टिस बी जी कोलसे पाटिल; पूर्व न्यायाधीश मुंबई उच्च न्यायालय

3 राज रतन अम्बेडकर; अध्यक्ष द बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया

4 मुहम्मद शफी; राष्ट्रीय महासचिव एसडीपीआई

5  भदंत आनंद, बोध गुरु

6. पी आई जोसे एडवोकेट सुप्रीम कोर्ट

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