नफ़रत का घिनोना खेल देश को निगल जाएगा

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नफ़रत का घिनोना खेल
राष्ट्रवाद ,आस्था और भावना के आँगन में

“मोहब्बतों से कहाँ मिलती है फ़ुर्सत मुझको वर्ना
नफ़रत की सियासत,हमसे बेहतर कौन करता “ अली आदिल अली

आपसे ही शुरू करता हूँ , क्या आपको नफ़रत पसंद है ? क्या आपको बदअमनी पसंद है ? आपको अगर कोई बे ईमान कहे तो अच्छा लगता है ? आपको कोई गाली दे तो मज़ा आता है ? आपकी माँ , बहिन , बाप या किसी और क़रीबी को कोई बुरा कहे या गाली गलोच करे तो अच्छा लगता है ?
ज़ाहिर है इन सभी सवालों का जवाब आप सभी का नहीं में ही होगा ,लेकिन फिर भी जो लोग ये सब करते हैं वो कौन लोग होते हैं . एक इंसान चाहे कितना ही असभ्य क्यों न हो फिर भी इन सब असभ्य बातों को अपने लिए पसंद नहीं करता .

अब सवाल यह पैदा होते है की उपरोक्त सब काम करने वाले क्या जानवर होते हैं .क्या वो इंसान नहीं होते ?…. आइये इसको समझते हैं … इंसान से नफ़रत , समाज में बदअमनी ,बेईमानी और भ्रष्टाचार , गालम गलोच और ज़ुल्म ज़्यादती करने वाले दरअसल वही लोग होते हैं जो धार्मिक नहीं होते , अब यह धर्म क्या है . हमारे पाढक जानते हैं की अधिकतर सियासी व् समाजी चर्चाओं में धर्म को दूर रखने की अक्सर बात कही जाती है .चलो पहले इसी को समझ लेते हैं .

सरल भाषा में अगर हम कहें तो “आत्मा और परमात्मा या ख़ालिक़ और बन्दे के बीच अंतरात्मा से दृढ़ विश्वास (यक़ीन ए मोहकम ) को धर्म कहते हैं .

अब होता यह है की जब किसी इंसान को दबाया ,सताया या उसके साथ पक्षपात किया जाता है तो यह सीधे तौर पर परमात्मा के साथ ही विशवास को तोड़ देता है , एहि अधर्म है . अब जो लोग यह कहते हैं की सियासत और समाज से धर्म को अलग रखा जाए दरअसल वो लोग अधर्म करना चाहते हैं .

जलाल ए बादशाही हो या जम्हूरी तमाशा हो ।
जुदा हो दीं सियासत से तो रह जाती है चंगेज़ी ॥

मतलब साफ़ है , चाहे बादशाहत हो या जम्हूरियत अगर इसमें से धर्म निकाल दिया गया तो बचेगी चंगेज़ियत , यानी तबाही और ज़ुल्म .और आज दुनिया में चारों तरफ जो चंगेज़ियत है उसकी बड़ी वजह है सियासत से दीं का निकल जाना . Actually जो देश या ग्रुप्स , संस्थाएं या जमातें खुद को मज़हबी होने का दावा करती हैं या उनको मज़हबी समझ लिया जाता है ,लेकिन उनके यहाँ इंसाफ़ , सादगी , बराबरी और इंसानियत नहीं है तो वो सब ढकोसला है और धोका है .यह समझ लेना चाहिए

दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं अपनी मौत के बारे में सोचते है इसीलिए जीवन में पाखण्ड और नफ़रत नहीं करते ,मौत को याद करने का मतलब धार्मिक होने की पहचान है ,एहि लोग हर बुरी बात और काम को बुरा भी समझते हैं , यही लोग आध्यात्मिक या धार्मिक कहलाते हैं , और इनकी संख्या किसी भी समाज या दौर में बहुत कम होती है .

अब यहाँ एक सवाल पैदा होता है की आध्यात्म से भौतिक और सामजिक लाभ क्या होता है , तो समझ लें जो लोग भी सच्चे धार्मिक होते हैं , (चूंकि पाखंडी और नौटंकी लोगों की कमी नहीं है ), उनको दोनों लोकों यानी दुनिया और आख़िरत की ख़ैर (सफ़लता) का मिलना तैय है .याद रहे किसी भी भलाई का फल दुनिया में मिलना यह सूरज के चमकने जैसा सच है .जो Practice में हैं उनको इसका आभास (एहसास) होगा .

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ करलें
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए

धरती पर फ़साद और नफ़रत फैलाने वाली क़ौम या संस्था कभी धार्मिक हो ही नहीं सकती .
सारांश यह है कि अगर हम किसी इंसान के दुःख को दूर कर सकते हैं ,और समाज में अम्न और मोहब्बत ला सकते हैं तो यही इबादत है , यही धर्म है .

चलिए थोड़ा और आगे बढ़ते हैं ….

आस्था और भावना का भी ज़िक्र कर लेते हैं , क्योंकि ये दोनों ही शब्द समाज में आजकल काफ़ी प्रचलित (आम ) हैं .इसके बाद हमको शहादत और देश भक्ति पर भी समझना होगा .

आस्था दरअसल प्रभु (रब ) के प्रति एक अडिग विश्वास (यक़ीन ) और निष्ठां का नाम है .आम तौर पर आस्था का चलन धर्म के ही परिपेक्ष (context) या “तनाज़ुर ” में हुआ करता है .और धर्म क्या है इसपर ऊपर चर्चा हो चुकी है .

लेकिन एक चीज़ जो सभी धर्मों में कॉमन है वो है ,हम सबका मालिक एक है , इस बारे में सबका एक ही मत है . क़ुदरत की बनाई सभी मख्लूक़ से प्यार करना , सच्चाई से बात करना और पाप या गुनाह के कामों से बचना , भूके को खाना खिलाना , भटके को रास्ता दिखाना , नंगे को कपडा पहनाना और प्यासे को पानी पिलाना , ज़ुल्म न करना इत्यादि , यह सभी धर्मों में कॉमन है .

दूसरी ओर ज़ालिम को ज़ुल्म से रोकना उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना यह इंसानियत भी है और धर्म भी , जो ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाये , वो बे ईमान है या वो राक्षस है ,अधर्मी है ,इसका कोई धर्म नहीं ।अब ज़ुल्म चाहे अपनों पर हो या अजनबी या ग़ैरों पर .

राष्ट्रवाद आजकल एक छलावा बन गया है , राष्ट्रवाद , नारों या स्लोगन और तिरंगा रैली का नाम नहीं है .बल्कि देश के प्रति सच्ची निष्ठां ,सीमाओं की हिफ़ाज़त के लिए खुद को पेश करना , सभी नागरिकों के साथ बराबरी की बात करना , इंसाफ़ ,अम्न शांति और सद्भाव के साथ दंगा मुक्त व् नशा मुक्त माहौल बनाये रखना राष्टवाद है .

देश की धरोहर , संपत्ति ,सड़कों ,बिजली ,पानी ,और पर्यावरण तथा सांप्रदायिक माहौल को संवारना और इनकी रक्षा करना राष्टवाद है .बहादुर , निस्स्वार्थ व् निष्पक्ष , सच्चा व निष्ठावान नागरिक बनकर सरकारों से उनकी ज़िम्मेदारियों के सम्बन्ध में सवाल करते रहना , नागरिकों के अधिकारों के हनन होने पर सरकारों की जवाब देहि तय करना इत्यादि शामिल है .

लेकिन आज राष्ट्रवाद की परिभाषा इसके एकदम विपरीत है .साथ ही देश की सीधी सादी जनता की भावनाओं को भड़का कर अपने स्वार्थ के लिए उपयोग करना एक आम बात है और यह सभी समुदायों के लीडरों का मामला है .

देश में नफ़रत ,डर और साम्प्रदायिकता एवं जातिवाद का माहौल बनाकर ,आस्था के नाम पर भोली जनता की भावनाओं को भड़का कर सत्ता भोगने वाले नेता और पार्टियां वक़्त रहते संभल जाएँ और जनता की शिक्षा , स्वास्थ्य , सामाजिक सुरक्षा और सम्मान को सुनिश्चित करें .वरना जनता अब 50 वर्ष पुरानी वाली सोच की नहीं है सब कुछ जानती और समझती है .बस वक़्त का इंतज़ार करती है .

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