निर्वाचित तानाशाही’ की अभेद्य दीवार में छेद

- राम पुनियानी
प्रो. राम पुनियानी

निर्वाचित तानाशाही’ की अभेद्य दीवार में छेद, युवाओं ने दिखाया रास्ता

कॉकरोच जनता पार्टी की स्थापना और जंतर मंतर पर उसके हालिया जबरदस्त विरोध प्रदर्शन के बारे में हम सब जानते हैं. वर्दीधारी पुलिस और गैर-वर्दीधारी शंकास्पद व्यक्तियों ने दिल्ली और अन्य स्थानों पर युवाओं पर लाठीचार्ज किया और उनके खिलाफ पैलेट गन और यहां तक कि एके-47 राइफल तक का इस्तेमाल किया गया.

यह सब लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रजातान्त्रिक तरीकों के एकदम खिलाफ था. विरोध प्रदर्शन का दूसरा पहलू था नाचते-गाते युवाएक साथ मिलकर पोस्टर बनाते युवा, हँसते-गाते युवा जो हमें कार्ल मार्क्स के प्रसिद्ध कथन की याद दिलाते हैं कि “क्रांति आमजनों का उत्सव होती है”.

हालांकि जंतर मंतर और देश के अन्य भागों में हुए विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि और आकार-प्रकार किसी क्रांति से पूरी तरह अलग था.

तानाशाही प्रवृत्ति की सरकारजो जनता की जायज़ मांगों की ओर जरा सा भी ध्यान नहीं देती थीबहुत लंबे समय के बाद झुकी. कारण यह कि विरोध नए-नए शहरों में फैलता जा रहा था और तानाशाह सरकार का डर पिघलता जा रहा था.  

हमने पहले देखा है कि किसानों के 12 महीने तक चले आंदोलन के दौरान सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगीं और चुनाव नजदीक आने पर ही उसने तीन कृषि कानून वापिस लिए.

सरकार ने शाहीन बाग में चल रहे विरोध प्रदर्शन में बाधा डालने के लिए असामाजिक तत्वों को प्रोत्साहन दिया. पेपर लीक के खिलाफ समय-समय पर उठाई गई आवाजों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया.

इस बार स्थिति अलग थी. सरकार ने आंदोलन की उपेक्षा करने की कोशिश की लेकिन आखिरकार उसे मांगे मानने पर मजबूर होना पड़ा. इसमें सबसे प्रमुख मांग थी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा.

उनकी जगह प्रहलाद जोशी को शिक्षा मंत्री बनाया गया, जोशी भी संघी पृष्ठभूमि के हैं. उनके व्यक्तित्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने  बिलकीस बानो के साथ  दुष्कर्म करने वालों को रिहा किए जाने का समर्थन किया था.   

पेपर लीक के मसले पर विचार करने और इसे रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों के बारे में सुझाव देने के लिए एक समिति का गठन किया गया है. यहां यह बताना दिलचस्प होगा कि प्रियंका गांधी के अनुसार इस समिति में एक ऐसे सज्जन को भी शामिल किया गया है जो गौमूत्र विशेषज्ञ हैं और कई ऐसे लोगों को भी जो शिक्षा  प्रणाली का कख ग भी नहीं जानते.

अभी जहां छात्र नेता यह सुनिश्चित करने में जुटे हैं कि सरकार अपने लिखित आश्वासनों को पूरा करेवहीं  यह जरूरी है कि हम इस छात्र आंदोलन की ‘कामयाबी‘ को समझें.

यह आंदोलन कहीं से भी फ्रांस में 1968 में हुए छात्र आंदोलनया हमारे पड़ोसी देशों श्रीलंकाबांग्लादेश या नेपाल में हुई छात्र विद्रोहों जैसा नहीं था. लेकिन फिर भी यह भाजपा के आईटी मीडिया सेल द्वारा निर्मित धारणाओं में काफी कुछ बदलाव लाने में कामयाब रहा.

इसने उस प्रोपेगेंडा के प्रभाव को भी कुछ कम किया जो गोदी मीडिया और संघ परिवार द्वारा अपनी शाखाओंहजारों स्कूलों और अन्य अनुषांगिक संगठनों के माध्यम  से  किया जाता है. सरकार के खिलाफ हिम्मत से बोलने का साहस धीरे-धीरे लोगों में वापिस लौटेगाऐसी संभावना है.

जहां कॉकरोच जनता पार्टी और उसके नेता अभिजीत दीपके इस प्रदर्शन के केन्द्र में थे वहीं इसकी नींव पिछले कई सालों से तैयार हो रही थी. बढ़ती बेरोजगारीजीवनयापन का लगातार महंगा होते जाना और बढ़ते अभावों के कारण यह आंदोलन खड़ा हुआ.

अभिव्यक्ति की आजादीधार्मिक स्वतंत्रताभूख और आनंद के सूचकांकों पर भारत के लगातार नीचे गिरते जाने को भले ही सरकार खारिज करती रही हो मगर यह समाज के बिगड़ते हालातों को प्रतिबिंबित करता था.

मुख्यधारा के मीडिया ने अपनी भूमिका सत्ताधारियों के स्तुतिगान और प्रतिपक्ष की आलोचना करने तक सीमित कर ली है. इस चौथे स्तंभ का किस कदर अधःपतन हुआ है और उसकी छवि कैसी बन गई हैयह इससे साफ़ है कि लोगों ने गोदी मीडिया के पत्रकारों को हूट किया.

हालांकि यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं थालेकिन इससे पता लगता है कि आम लोगों में गोदी मीडिया की कितनी बुरी छवि बन गई है. यह इसलिए क्योंकि वह अपनी  सही भूमिका त्यागकर सत्ताधारियों की सेवक बन गई है. ऐसे वातावरण में लोकतांत्रिक आजादियों पर पाबंदियों के खिलाफ लड़ने में युवाओं का जोश बहुत ख़ुशी का सबब है.

क्या इस आन्दोलन ने अपना लक्ष्य पूरी तरह हासिल कर लिया हैइसका उत्तर इस बात पर निर्भर है कि “पूरी तरह” की परिभाषा क्या है. हालांकि शिक्षा मंत्री को बदले जाने से नॉन बायोलॉजिकल’ का अहं काफी हद तक चकनाचूर हुआ.

लेकिन इससे कोई बड़ा बदलाव आने वाला नहीं है क्योंकि नागनाथ को हटाकर सांपनाथ को बिठा दिया गया है. पेपर लीक होने की मुख्य वजह – समाज में  फैले भ्रष्टाचार – का बाल बांका भी नहीं हुआ है.

भ्रष्टाचार में कमी केवल अधिक पारदर्शी और समाज द्वारा जांची-परखी जा सकने वाली व्यवस्था लागू करने पर ही आ सकती है. हालांकि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आरएसएस ने अन्ना आंदोलन की रूपरेखा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिसके चलते बाद में कांग्रेस को चुनौती देने के लिए आम आदमी पार्टी का गठन हुआ.

मगर एनडीए सरकारों ने भ्रष्टाचर उन्मूलन के लिए कोई कदम नहीं उठाया. ना ही सत्ताधारियों को इसकी चिंता थीं. सड़कों और पुलों के निर्माण पर खर्च की गई भारी भरकम रकम बारिश और बाढ़ में इनके बह जाने से बर्बाद हो गई क्योंकि संभवतः भाजपा सरकार के दौरान हुए इन निर्माणों में जमकर भ्रष्टाचार हुआ था.

यह तो मानना ही पड़ेगा कि जो भी कामयाबी हासिल हुईउसके लिए जमीन तैयार करने में राहुल गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका थी. उन्होंने सामाजिक मुद्दों के प्रति सकरार के उपेक्षापूर्ण रवैये की कलई खोलकर रख दी.

यह कहना मुश्किल है कि क्या आरएसएस-भाजपा द्वारा किया गया धर्म-आधारित ध्रुवीकरण जंतर मंतर पर हुए आन्दोलन से कम हुआ है. हमारे तंत्र में क्या खराबी है इसे एक व्यापक समझ के ज़रिये ही जाना जा सकता है. क्या यह आंदोलन लंबे समय तक चुनावी राजनीति से दूर रहा पाएगा और क्या वह यह मूल मुद्दा उठा पायेगा कि किस तरह साम्प्रदायिक शक्तियों ने देश को शांति और उन्नति की राह से दूर कर दिया है.

आजादी की लड़ाई के दौरान और हमारे संविधान में जिस भारत का सपना देखा गया था उसे अत्यंत कुटिलता से पीछे कर देश को हिन्दू राष्ट्र के विचार की ओर धकेल दिया गया है. राष्ट्र निर्माण के मुद्दे की जगह मस्जिदों और विश्वविद्यालयों को ढहाए जाने के मुद्दे को केन्द्र में ला दिया गया है.

राज्य सत्ता में धीरे-धीरे उन लोगों की घुसपैठ बढ़ती जा रही है जिन्होंने आरएसएस शाखाओं में विभाजकनारी प्रशिक्षण लिया है या जो गोदी मीडिया और सोशल मीडिया की मदद  से फल-फूल रहे हैं और जिन्हें व्हाटस एप् यूनिवर्सिटी कहा जाता है.

यह विरोध प्रदर्शन ताजी हवा के एक झोंके की तरह था. जरूरत इस बात की है कि उसकी यह यात्रा जारी रहे और दुबारा हमारी पहचान हिंदू या मुस्लिम की होने के बजाए भारतीय नागरिक की बने.

यह देश उसमें रहने वालों का हैउसमें रहने वाले सभी लोगों का. जबकि साम्प्रदायिक राजनीति मनुस्मृति पर आधारित हिन्दू राष्ट्र के निर्माण पर जोर देती हैं. उनका पूरा एजेंडा ब्राम्हणवादी मूल्यों को लादने का है जिसमें मुसलमानईसाईआदिवासीदलितश्रमिक और महिलाएं दूसरे दर्जे के नागरिक होंगें

इस समय तो विरोध आन्दोलन की सफलता की वजह से उत्साह एवं प्रसन्नता का माहौल है. यह मानना भूल होगी कि उसने अपने सारे लक्ष्य हासिल कर लिए हैं. हम जब तक साम्प्रदायिक शक्तियों को पूरी तरह परास्त नहीं कर देतेया कम से उनली ताकत को बहुत हद तक क्षीण नहीं कर देतेतब तक मौजूदा सत्ताधारी हमारे साथ एक के बाद एक तरह-तरह के अन्याय करते रहेंगे.

हम युवाओं/छात्रों की सराहना करते हैं और उन्हें सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी वे संविधान पर अपरोक्ष आक्रमण की चुनौती का अच्छे से मुकाबला करेंगे. (अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)

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