म्यांमार नरसंहार और दुनिया की खामोशी, किसी अज़ाब का इशारा

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यूँ तो दुनिया में हमेशा से ज़ुल्म और अत्याचार होते ही रहे हैं , इंसानो का क़त्ल इ आम भी अक्सर तारीख़ की किताबों में मिल जाता है ।दुनिया के अलग अलग देशों में हालात के अनुसार माइग्रेशन (पलायन ) भी होता रहा है और आजतक यह सिलसिला जारी है ।यूनाइटेड नेशन नोटिफिकेशन में रेफूजीस के अधिकारों के सम्बन्ध में काफी तफ्सील है जिसमें रेफूजीस के अधिकारों को विस्तार से बताया गया है ।ऐसे में जब कुछ लोग अपनी मर्ज़ी से एक से दुसरे देश को पलायन करते हैं तो इसका मतलब यह होता है की वो उस देश की पालिसी या लॉ ऑफ़ थे लैंड से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं ,यदि किसी क़ौम या धर्म के लोगों को यह मालूम होजाये की जिस देश में हम पलायन कररहे हैं कुछ साल के बाद हमको वहां जनता या सरकार द्वारा इसलिए क़त्ल करदिया जाएगा की तुम किसी दुसरे देश से आये हो ,मिसाल के तौर पर यदि पाकिस्तान से आने वाले रेफ्यूजीज या मीग्रेंट्स को इसलिए क़त्ल करदिया जाए की तुम तो पाकिस्तान से आये हो तो यह उनके अधिकारों का हनन होगा और इंसानियत के आधार पर इसको ज़ुल्म और अत्याचार ही कहा जाएगा ।।

यहाँ एक सवाल यह पैदा होता है की लोग धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक होते है और उनके देश में अधिकार उसी आधार से तै होते हैं ,हमारे ख्याल से यह धारणा ग़लत है majority और minority का concept ही ग़लत है .one nation one citizen का फार्मूला होना चाहिए ,  रहा धार्मिक धारणा .आस्था और धार्मिक पूजा पाठ का सवाल इसमें हर एक को अपने मज़हब और आस्था के मुताबिक़ आज़ादी होनी चाहिए मगर ख्याल रहे मानवता या मख्लूक़ का हनन धर्म की आड़ में नहीं होना चाहिए ,रहा इस बात का सवाल की हर एक मज़हब की अपनी अपनी रीत और रस्म होती हैं तो याद रहे धर्म basically मानव द्वारा बनाये गए क़ानून या आस्था का नाम नहीं होता , धर्म का मतलब है ईश्वरीय क़ानून को ज़मीन पर बन्दों में follow कराना और करना .धरती पर इंसानी क़ानून हर एक देश के अलग होसकते हैं मगर ईश्वर (रब )  के द्वारा बनाये गए क़ानून पूरी दुनिया में बसने वाले हर इंसान के लिए एक ही होगा , तो हर इंसान यदि अपने बनाने वाले रब के क़ानून को मानता है तो कहीं कोई झगड़ा ही नहीं .और न ही माइनॉरिटी ,मेजोरिटी का मसला .

मिसाल के तौर पर एक फैक्ट्री का मालिक अपने उसूल और क़ानून बनता है , यहाँ काम करने वाले हर एक नौकर को इन क़ानूनों या नियमों को मानना होता है चाहे वो किसी मज़हब या जाती से आटा हो .तो ऐसे में फैक्ट्री का प्रबंध अच्छा चलता है .अब यदि कोई इंसान अपने मज़हब या आस्था के हिसाब से यहाँ नौकरी करेगा तो मतभेद पैदा होंगे और नतीजे में फैक्ट्री में अफरा तफरी मच जायेगी ,. इसी प्रकार यह संसार रुपी फैक्ट्री का मालिक हम सब का एक ही रब है उसके बनाये क़ानून सबके लिए सामान हैं उसकी नज़र में , काला गोरा , अमीर ग़रीब , देहाती शहरी , सब बराबर हैं इसलिए उसने सबके लिए एक ही क़ानून बनाये हैं उनको मानने में ही इंसान की भलाई है वर्ण सरासर नुकसान है ।

आज हम बात म्यांमार में होरहे नरसंहार पर करना चाहते हैं जहाँ खुले आम मानवाधिकारों का हनन होरहा है और हम खामोश तमाशाई बने बैठे हैं जबकि बार बार UN इस तरफ दुनिया का ध्यान केंद्रित कररहा है लेकिन यहाँ भी बड़ा सवाल पैदा होता है की UN इराक़ , ईरान , अफ़ग़ानिस्तान , क्यूबा , लीबिया , सीरिया , मिस्र , निजिरिया , और कई अन्य देशों पर आनन् फानन पाबंदियां लगा देता है उसका पालन न होने पर संयुक्त फ़ौज  हमले करके तबाही मचा देती हैं , पिछले २० वर्षों से म्यांमार में मानवाधिकारों का हनन होरहा है क्यों नहीं उसपर संयुक्त राष्ट्र की फौजें हमला करके म्यांमार सर्कार को बर्खास्त करतीं या पाबंदी नहीं लगाई जातीं , ये सब ऐसे ान सुलझे मसले हैं जिनका हल मज़लूम क़ौमों को निकालना होगा या मज़लूम क़ौम के लीडरान को , वार्ना जिस क़ौम की पूरी दुनिया आज दुश्मन हो उसको इन्साफ के लिए आलमी संस्थाओं या लीडरों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए .

आज  म्यांमार  के  मासूम इंसानो पर होने वाले ज़ुल्म और तशद्दुद के खिलाफ अगर अमन पसंद सरकारें और क़ौमें इसी तरह खामोश बैठी रहीं तो वो भी अपने पर होने वाले ज़ुल्म और अज़ाब का इंतज़ार करें जो जल्द आने वाला है . ख़ास तौर से हमारा इशारा मुस्लिम दुनिया के रेहनामाओं की तरफ है जो खुद को खैर ए उमम कहलाने का दावा करते हैं जो सब झूट है  । अफ़सोस तो जब होता है की पूर्वाग्रह से ग्रहस्त कुछ लीडरान और नेता इस प्रकार के नरसंहार को उचित ठहराते नज़र आते हैं ।और ऐसे देशों के साथ अपने कूटनीतिज्ञ रिश्तों को मज़बूत बनाने के लिए प्रेरित करते हैं , और सफऱ भी करते हैं ।

क़ुव्वत ए फ़िक्र ओ अमल पहले फ़ना होती है !

फिर किसी क़ौम की शौकत पे ज़वाल आता है!!

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