मुसलमानों के बिना हिंदू राष्ट्र अधूरा? मोहन भागवत

Ali Aadil khan
Ali Aadil Khan Editor’s Desk

न्यूयॉर्क में मोहन भागवत का ‘सर्वधर्म’ संदेश, के बाद अमेरिका में RSS की विचारधारा पर उठे तीखे सवाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा चर्चा के केंद्र में है, हालांकि न्यूयॉर्क में उनके कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक और सामाजिक विवाद चल रहा है। कार्यक्रम का नाम भले ही “Universal Oneness Celebration” रखा गया हो, यानी सार्वभौमिक एकता का उत्सव, या یونیورسل یکجہتی کا جشن ,,,,,लेकिन सवाल यह है कि क्या हिंदू राष्ट्र का Concept , वास्तव में सभी धर्मों को बराबर जगह देती है या फिर ‘एकता’ की यह परिभाषा हिंदू पहचान के इर्द-गिर्द ही घूमती है?

भागवत के पुराने बयानों को देखें तो उनका संदेश कई बार निस्बतन समावेशी यानी Relatively inclusive दिखाई देता है। 2018 में उन्होंने साफ कहा था कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ यह नहीं है कि उसमें मुसलमान नहीं चाहिए। उनका तर्क था कि जिस दिन यह कहा जाएगा कि भारत में मुसलमान नहीं चाहिए, उस दिन हिंदुत्व ही नहीं रहेगा। अब यह बयान भी अपने आप में भ्रमित करने वाला ही है …..लेकिन बज़ाहिर बड़ा अच्छा लगता है

2022 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी के साथ बातचीत के दौरान जब उनसे पूछा गया कि हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों की क्या स्थिति होगी, तो भागवत ने कथित तौर पर जवाब दिया—“हम मुसलमानों के बिना हिंदू राष्ट्र की कल्पना भी नहीं कर सकते।” उन्होंने मुसलमानों को समान नागरिक बताते हुए देश के विकास में मिलकर काम करने की बात कही थी।

लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है. कि अगर हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों की बराबर नागरिक के रूप में जगह है, तो फिर “हिंदू राष्ट्र” की जरूरत ही क्या है ? वैसे भी हिन्दुओं को धार्मिक स्तर पर दुसरे समुदायों से कहीं ज़्यादा आज़ादी और प्रोत्साहन है .

भारत का संविधान पहले ही प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और नागरिक अधिकारों की गारंटी देता है। ऐसे में आलोचकों का सवाल है कि जब नागरिकता का आधार धर्म नहीं है, तब राष्ट्र की पहचान को किसी एक धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने की ज़रुरत क्या है? इसका मतलब साफ़ है कि धर्म मोक्ष के लिए नहीं बल्कि सत्ता केलिए इस्तेमाल किया जाता है.

यही वह बिंदु है जहां भागवत के ‘समावेश’ वाले संदेश और हिंदू राष्ट्र की वैचारिक अवधारणा के बीच विरोधाभास की बहस खड़ी होती है।

भागवत लंबे समय से यह विचार रखते आए हैं कि सत्य तक पहुंचने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं और किसी एक विश्वास या धर्म को श्रेष्ठ बताने से टकराव पैदा होता है। भागवत जी टकराव तो होगा क्योंकि भौतिक लक्ष्य तक पहुँचने के रास्ते अलग हो सकते हैं परन्तु आध्यात्मिक और सत्य का रास्ता एक ही होगा, और वो है एकईश्वरवाद और सच्चे ईश्दूत के निर्देशों का पालन. अब इसको साबित करने के लिए संवाद का रस्ता हमेशा खुला रहना चाहिए .

मोहन भगवत जी अगर हर रास्ता मंजिल तक पहुंचता है, तो फिर राष्ट्र की पहचान के लिए किसी एक धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा को केंद्रीय स्थान देने की जरूरत क्यों पड़ रही है? यही विरोधाभास इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

RSS द्वारा न्यूयॉर्क में कार्यक्रम के आयोजकों के अनुसार इसका मक़सद अमेरिकी में हिन्दू समुदाय को एकजुट करना, साझा विरासत और अंतरधार्मिक संवाद को बढ़ावा देना है। RSS के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने भी इसे विविध और बहुधार्मिक समाज के साथ संवाद तथा भारतीय ethos की समावेशी परंपरा से जोड़ा है।

लेकिन न्यूयॉर्क के मेयर इस व्याख्या से सहमत नहीं हैं। मेयर ने कहा कि वह इस कार्यक्रम का समर्थन नहीं करते और भारत की ऐसी कल्पना करते हैं जिसमें हर व्यक्ति को समान अधिकार मिलें और भारत एक pluralistic यानी बहुलवादी और secular republic के रूप में कायम रहे।

यहां एक दिलचस्प तथ्य यह है कि न्यूयॉर्क का मेयर एक अप्रवासी भारतीय मुस्लिम अमेरिकी हैं। इसलिए भागवत की मौजूदगी को लेकर उठी बहस केवल RSS के आलोचकों की बहस नहीं रह गई है; बल्कि यह सवाल अब भारतीय मूल के अमेरिकी समुदाय के भीतर भी उठ रहा है कि भारतीयता की परिभाषा क्या होगी—धर्म आधारित, संस्कृति आधारित या संविधान आधारित?

अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की आपत्ति

अमेरिका में ” United States Commission on International Religious Freedom (USCIRF) ने RSS पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ असहिष्णुता यानी Intolarance को बढ़ावा देने के आरोप लगाए और भागवत की यात्रा को लेकर कड़े कदम उठाने की सिफारिश की। (USCIRF) ने RSS से जुड़े संगठनों के सदस्यों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसक हमलों में शामिल होने की बात कही, जिनमें ईसाई, दलित, मुस्लिम और सिख समुदायों का उल्लेख किया गया है। याद रहे USCIRF के अलावा कई दुसरे संगठनों ने भी भागवत का वीज़ा और कार्यक्रम रद्द करने की मांग उठाई थी।

भागवत के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह रहा कि वह मुसलमानों को भारत से बाहर करने वाली सोच को स्वीकार नहीं करते और यह उनके पुराने बयानों से भी ज़ाहिर होता है। लेकिन RSS की दोहरी नीति का भी आलोचक ज़िक्र करते रहे हैं, बल्कि देश की एकता और अखंडता को खंडित करने के इलज़ाम भी RSS पर लगते रहे हैं. हालाँकि अखंड भारत का नारा भी आरएसएस का ही है.

लेकिन आलोचकों की आपत्ति इससे आगे जाती है,वे पूछते हैं, क्या किसी समुदाय को केवल इसलिए स्वीकार किया जा रहा है कि वह हिंदू राष्ट्र का हिस्सा बन सके, या इसलिए कि वह एक समान नागरिकता का अधिकार भी रखते हैं ? हालाँकि आज भारत का मूलनिवासी जिसको अम्बेडकरवादी समाज के नाम से जाना जाता है वो खुद को हिन्दू मानने और कहलवाने से भी परहेज़ करता है. और यही बिंदु हिंदू राष्ट्र की पूरी बहस का केंद्रीय प्रश्न बनते हैं।

भागवत ने 2025 में कहा था कि हिंदू एक inclusive यानी समावेशी शब्द है और भारत में रहने वाले विभिन्न समुदाय एक साझा Civilisational विरासत का हिस्सा हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि मुसलमान और ईसाई भी उन्हीं पूर्वजों के वंशज हैं और उनका अलग होना अलगाव या Isolation को नहीं दर्शाता है। लेकिन यहां फिर वही गंभीर सवाल उठता है: कि

अगर कोई अल्पसंख्यक स्वयं को केवल भारतीय मानता है और ‘हिंदू’ शब्द, संस्कृति या रीत रिवाज को अपनी धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान नहीं मानता, तो क्या उसकी असहमति के बाद भी हिन्दू राष्ट्र में उसके अधिकारों की रक्षा की जायेगी?

यही वह सवाल है जिस पर हिंदू राष्ट्र की समावेशी व्याख्या यानी ” interpretation of inclusiveness ” की असली परीक्षा होती है।

क्योंकि किसी व्यक्ति को ‘आप भी हिंदू हैं’ कहना तभी समावेशी होगा, जब उस व्यक्ति को यह कहने की भी पूरी आज़ादी हो कि “मैं हिंदू नहीं हूं, लेकिन मैं उतना ही भारतीय हूं जितना की हिन्दू ।”

मोहन भागवत के न्यूयॉर्क कार्यक्रम के बाद आलोचक पूछ रहे हैं, कि संघ ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, संवाद, विविधता और सभी धर्मों के सम्मान की बात तो करता है किन्तु भारत में हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की राजनीतिक और सामाजिक व्याख्या व्यवहार में कितनी समावेशी है??? यानी मोहन भगवत के न्यूयॉर्क में दिए भाषण की असली परीक्षा भारत में समावेशी तथा समानता और बराबरी के क़ानून को सख्ती से लागू करवाने से शुरू होती है. लेकिन यह बात हमेशा कही गई है कि RSS की कथनी और करनी में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ रहा है.

मोहन भागवत का न्यूयॉर्क में भारतीय अप्रवासियों के बीच यह कहना कि मुसलमानों के बिना हिंदू राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती, निश्चित रूप से उस कठोर हिंदू राष्ट्रवादी धारणा से अलग संदेश देता है जिसमें मुसलमानों को भारत की राष्ट्रीय पहचान से बाहर रखने की बात की जाती है।

लेकिन लोकतंत्र में सवाल केवल इतना नहीं होना चाहिए कि “अल्पसंख्यक और दलित भारत में रह सकते हैं या नहीं?”
बल्कि सवाल यह है कि क्या अल्पसंख्यक , दलित और आदिवासी भारत की सम्पदा में बराबर के हिस्सेदार हैं या नहीं ? या फिर उनको नागरिकता साबित करने के लिए हिन्दू सांस्कृतिक पहचान को स्वीकार करना पड़ेगा?

और दूसरा बड़ा सवाल बक़ौल मोहन भगवत के “अगर सभी रास्ते ईश्वर तक जाते हैं, तो क्या नागरिकता का रास्ता भी सभी नागरिकों के लिए बराबर है?

न्यूयॉर्क में भागवत का संदेश अगर सचमुच ‘Universal Oneness’ यानी सार्वभौमिक एकता का है, तो उसकी सबसे बड़ी कसौटी यही होगी कि सांप्रदायिक भेदभाव की भाषा से ऊपर उठकर समान नागरिक अधिकारों को सुनिश्चित किया जाए …..। क्योंकि किसी राष्ट्र की महानता और विकास इस बात से तय नहीं होती कि उसमें बहुसंख्यक कितने शक्तिशाली हैं—बल्कि इससे तय होती है कि अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित, सम्मानित और बराबरी के अधिकार रखते हैं।

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