मैंने NDTV से इस्तीफ़ा दे दिया है

Date:

Ali Aadil Khan

EDitor’s Desk

जब इरादा बना लिया ऊंची उड़ान का
फिर देखना फ़ुज़ूल है क़द आसमान का

ऐसे में जब पत्रकारिता नीलाम हो रही है उस वक़्त रवीश ने पत्रकारिता की रूह की हिफ़ाज़त की है 

 

पत्रकारिता अब संस्थानों और Media Houses में नहीं बची है , बल्कि पत्रकारिता ख़ास क़िस्म के दर्शकों के आँगन में ज़िंदा है और वो आँगन आपका है . लेकिन यहाँ मैं एक दूसरी बात भी कहता हूँ पत्रकारिता संस्थानों में तो नहीं बल्कि रवीश कुमार और उनके जैसे चंद जुझारू और ग़ैरतमन्द पत्रकारों में देखा कीजे ……

लोकतंतंत्र को ख़त्म करने की लाख कोशिश हो ,,, मगर उसकी चाहत कुछ लोगों में हमेशा ज़िंदा रहती है और उन ही में से आप भी हैं ….याद रहे Media के किरदार को समझने की यह चेतना और शऊर आपके अंदर कुछ ग़ैरतमन्द पत्रकारों ने पैदा किया है , उन ही में से एक पत्रकार हैं रवीश कुमार ..

यह भी सही है , हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी पत्रकारिता की आँखों में आँखें डालना रवीश ने सिखाया है . पत्रकारिता की रौशनी में सच को झूठ पर ग़ालिब करना रवीश ने सिखाया , रवीश ने जान पर खेलकर ईमानदार पत्रकारिता की जीत को सुनिश्चित किया है .सच्चे पत्रकारों के लिए प्रेरणा स्रोत बने हैं रवीश कुमार . ऐसे में जब पत्रकारिता नीलाम हो रही है उस वक़्त रवीश ने पत्रकारिता की रूह की हिफ़ाज़त की है .

हिंदी पत्रकारिता में रवीश ने बुलंदियों को छुआ है . ऐसे में ……जब सहाफ़त और journalism हुक्मरान के महल्लात की लौंडी बन गयी हो , रवीश उस वक़्त झूठी और नफ़रती हुक्मरानी को ऊँगली पर नचा रहे थे . Actual पत्रकारिता का विशवास जनता में जगा रहे थे रवीश . जब जनता नफ़रती Media के सैलाब में बही जा रही थी तब रवीश सजगता , सहजता , विनम्रता और पवित्रता का मज़बूत Pillar बनकर खड़े हो गए . और सैलाब के रुख को मोड़ने का काम किया .

जब झूठों के बीच सच बोलना गुनाह हो तब रवीश सच ही बोल रहे थे ,और दर्शकों को नागरिक अधिकारों के बारे में बोलने का हुनर सिखा रहे थे , बोलने की प्रेरणा दे रहे थे . जब देश में जज्ज साहिबान ज़मानत देने पर Target किये जाने का डर जता रहे हों ऐसे में रवीश इन्साफ की बात करने में क़तई नहीं झिजक रहे थे .

नोटों पर लक्ष्मी और गणेश का मुद्दा होता तो ……

https://timesofpedia.com/noton-par-ganesh-aur-laxmi-ka-mudda-hota-to/

क़ानून की आड़ में जब मानव अधिकार कुचले जा रहे हों , अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनी जा रही हो , right to speech right to privacy को ख़त्म किया जा रहा हो ऐसे में रवीश चीख और उनके साथ कई और उनके सहयोगी वही बोल रहे थे जो देश और जनता के हित में हो , बोलो अपने अधिकारों के लिए बोलो ….

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है
जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले

ऐसे में जब ज़मीर फरोश पत्रकार क़लम से हुक्मरान के इज़ार बंद डाल रहे हैं , रवीश अपने क़लम से लोकतंत्र और आज़ादी को बचाने की इबारत लिख रहे हैं .1857 से 1947 तक साम्राज्य्वादी और पूंजीवादी शासकों से भारत को आज़ाद कराने की जद्दो जेहद और जंग थी ,,,आज भारत में लोकतंत्र और संविधान को पूँजीवाद और फासीवाद से बचाने की जंग है .

 

रवीश अपनी पत्रकारिता की ज़बान में कह रहे हैं …..

चंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले

वो जो साए में हर मस्लहत के पले

ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को

मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता …….

झूठों की वाहवाई और सच्चों की जग हंसाई कराने वाले पत्रकार अपने ईमान ओ ज़मीर को बेचकर चुल्लू भर आब में डूब कर……. पेश हो रहे हैं कुछ फरेबी तख़्त नशीनों के सामने .ज़मीर फरोश पत्रकार हुक्मरान से दोस्ती को फ़ख़्र की बात समझ रहे हैं .हालाँकि यह बात हुक्मरान भी जानते हैं की कोण कितना सच्चा और देश भक्त है …. ऐसे में रवीश जांबाज़ी , दिलेरी और ईमानदारी से मज़लूम अवाम की आवाज़ बनकर देश की आबरू , लोकतंत्र , संविधान और एकता अखंडता को बचाने में मसरूफ़ हैं . और हुक्मरान से शायद यह कह रहे हैं रवीश .

लोग डरते हैं दुश्मनी से तिरी — हम तिरी दोस्ती से डरते हैं

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